Bhariwa Metal Craft of Madhya Pradesh: मध्यप्रदेश की पारंपरिक भरेवा धातु शिल्प कला ने आखिरकार वह राष्ट्रीय पहचान हासिल कर ली है, जिसकी वह दशकों से हकदार थी। नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बैतूल जिले के भरेवा शिल्पकार बलदेव वाघमारे को राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार से सम्मानित किया, और यह सम्मान सिर्फ एक कलाकार को नहीं, बल्कि एक पूरी विरासत को मिला है। भरेवा धातु शिल्प को हाल ही मिला GI टैग इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय कला अब वैश्विक मंच पर अपनी जगह मजबूती से बना रही है।
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भरेवा स्थानीय बोली का एक सरल शब्द, जिसका अर्थ है ‘भरने वाले’ लेकिन उनका काम बिल्कुल साधारण नहीं। ये कारीगर गोंड जनजाति की एक उप-जाति से आते हैं और धातु ढलाई की कला इनके खून में दौड़ती है। यह सिर्फ कौशल नहीं, पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। गोंड आदिवासी जीवन, उनकी मान्यताएं, उनकी पूजा-पद्धतियां सब इस कला में गहराई से घुली हुई हैं। भरेवा धातु शिल्प केवल सजावट नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुशासन है जो देवताओं, परंपराओं, विश्वास और सामुदायिक कहानी को धातु की ठोस शक्ल देता है।
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इन कारीगरों की दुनिया दिखने में छोटी जरूर है, लेकिन कल्पना और परंपरा की दृष्टि से बेहद विशाल। भगवान शिव-पार्वती की प्रतीकात्मक छवियां हों या ठाकुर देव के अद्भुत घोड़े हर रचना में वर्षों का अनुभव, आध्यात्मिकता और कारीगरी की चमक दिखाई देती है। गहनों की बात करें तो भरेवा समुदाय के विवाह बिना इनकी बनाई अंगूठियों, कटारों और कलाईबंदों के पूरे नहीं होते। कई कलाकृतियां तो सीधे अंतरराष्ट्रीय शिल्प बाजार में अपनी पहचान बना चुकी हैं मोर आकार के दीपक, घंटियां, दर्पण फ्रेम और बैलगाड़ियां विदेशी खरीदारों के लिए भी अनोखे आकर्षण का केंद्र हैं।
लेकिन इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि यह कला बची कैसे? जवाब है—बैतूल के टिगरिया गांव का एक नाम, बलदेव वाघमारे। जहां बाकी शिल्प परंपराएं वक्त के साथ खत्म होती गईं, वहीं बलदेव ने इस धरोहर को न सिर्फ जिंदा रखा, बल्कि इसे नए कारीगरों की पीढ़ी भी दी। उनकी मेहनत से टिगरिया एक “शिल्प ग्राम” बन गया है, जहां आज कई भरेवा परिवार इस अनोखी कला का अभ्यास कर रहे हैं।
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बलदेव वाघमारे सिर्फ शिल्पकार नहीं, बल्कि अपनी विरासत के प्रहरी हैं। उन्होंने यह हुनर अपने पिता से सीखा, और अब वह इस कला को नई प्रतिष्ठा दिला रहे हैं। जब राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित होने के बाद उनके गांव में जश्न की हवा फैली, तो यह जीत एक कलाकार की कम, बल्कि उस पूरी संस्कृति की लगी जिसे अक्सर मुख्यधारा नजरअंदाज करती आई है। आज, जब मशीनें कला को चुनौती दे रही हैं, ऐसे में भरेवा धातु शिल्प जैसे कौशल का जीवित रहना सिर्फ गर्व की बात नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है। टिगरिया का यह छोटा-सा गांव हमें याद दिलाता है कि बड़ी विरासतें हमेशा बड़े शहरों में नहीं जन्म लेतीं कभी-कभी वे मिट्टी के छोटे घरों में, देवताओं की छोटी मूर्तियों के बीच, और कारीगरों के कठोर हाथों की गर्मी में पलती-बढ़ती हैं।
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