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अयोध्याउत्तर प्रदेशराज्य

Ayodhya Pilgrimage Economy: मोदी–योगी युग में Ayodhya की बदली हिंदुत्व तस्वीर और फलती-फूलती तीर्थयात्रा अर्थव्यवस्था

मोदी–योगी युग में अयोध्या की तीर्थयात्रा अर्थव्यवस्था कैसे आध्यात्मिकता और विकास का संगम बन रही है? नए साल की भीड़ से बदली हिंदुत्व की तस्वीर और भविष्य के संकेत पढ़ें।

Last updated: January 1, 2026 10:36 pm
KARTIK SHARMA - Sub Editor Published January 2, 2026
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Ayodhya pilgrimage economy growth in Modi–Yogi era
आस्था की भूमि Ayodhya में नए साल पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ सिर्फ भक्ति नहीं, बल्कि उस बदलते हिंदुत्व की तस्वीर है जहां आध्यात्मिकता के साथ विकास और रोजगार भी आगे बढ़ रहे हैं।TV TODAY BHARAT / Special Analysis
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Highlights
  • Ayodhya: आस्था से आगे बढ़कर अर्थव्यवस्था का नया केंद्र
  • नए साल की भीड़ और बदलता धार्मिक पर्यटन ट्रेंड
  • मोदी–योगी युग में हिंदुत्व: मंदिर, सड़क और रोजगार का संगम
  • स्थानीय लोगों की ज़िंदगी में आया आर्थिक और सामाजिक बदलाव
  • भविष्य के संकेत: भारत की तीर्थयात्रा अर्थव्यवस्था की नई दिशा

Ayodhya Pilgrimage Economy: नए साल की पहली सुबह… जब देश के बड़े शहर अभी जश्न की थकान उतार रहे थे, तब अयोध्या की गलियों में आस्था जाग रही थी। सरयू के घाटों पर दीपों की रौशनी थी, मंदिरों के बाहर लंबी कतारें थीं और चेहरों पर सिर्फ भक्ति नहीं, एक भरोसा भी था। यह भरोसा उस बदलाव का था, जिसने अयोध्या को सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि एक नई तीर्थयात्रा अर्थव्यवस्था का मॉडल बना दिया है। आज अयोध्या सिर्फ पूजा-पाठ की जगह नहीं रही, बल्कि यह उस नए हिंदुत्व की तस्वीर है, जो विकास के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है।

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Ayodhya को लंबे समय तक विवाद, राजनीति और प्रतीक्षा के चश्मे से देखा गया। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह शहर एक नई पहचान के साथ उभरा है। यह पहचान किसी एक आयोजन या एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे इकोसिस्टम की है जहां श्रद्धा, पर्यटन, रोजगार और बुनियादी ढांचे का मेल साफ दिखता है। नए साल पर उमड़ी भीड़ सिर्फ धार्मिक उत्साह का संकेत नहीं थी, बल्कि यह बताने आई थी कि भारत का धार्मिक पर्यटन अब भावनाओं से आगे बढ़कर अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बन चुका है।

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मोदी-योगी काल में हिंदुत्व की जो तस्वीर उभरी है, वह न तो केवल नारों की है और न ही सिर्फ प्रतीकों की। यह एक ऐसी सोच है, जिसमें मंदिर के साथ सड़क, आरती के साथ एयरपोर्ट और भक्ति के साथ रोजगार जुड़ा है। प्रधानमंत्री Narendra Modi के ‘विकास भी, विरासत भी’ के विचार को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने जमीन पर उतारने की कोशिश की है। अयोध्या इसका सबसे जीवंत उदाहरण बनकर सामने आई है। आज अयोध्या पहुंचना पहले जैसा कठिन नहीं रहा। बेहतर सड़कें, रेलवे स्टेशन का कायाकल्प, एयरपोर्ट की शुरुआत और शहर के भीतर सुव्यवस्थित ट्रैफिक ये सब मिलकर तीर्थयात्रियों के अनुभव को बदलते हैं। इसका सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। होटल, धर्मशाला, गेस्ट हाउस, टैक्सी सेवाएं, नाविक, फूल-माला बेचने वाले, प्रसाद की दुकानें हर स्तर पर रोजगार के नए अवसर बने हैं। यह वही अयोध्या है, जहां कभी युवाओं को काम के लिए बाहर जाना पड़ता था, और आज बाहर से लोग यहां काम की तलाश में आ रहे हैं।

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नए साल पर मंदिरों और घाटों पर उमड़ी भीड़ भविष्य के उस ट्रेंड की ओर इशारा करती है, जिसमें धार्मिक पर्यटन साल भर चलता रहेगा, न कि सिर्फ किसी खास तिथि तक सीमित रहेगा। दीपोत्सव, रामनवमी, सावन, कार्तिक पूर्णिमा और अब न्यू ईयर हर अवसर अयोध्या की अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकता है। यह भीड़ अव्यवस्था नहीं, बल्कि प्रबंधन की परीक्षा होती है, और हाल के आयोजनों में प्रशासन ने यह दिखाया है कि बड़ी संख्या को संभालना अब चुनौती नहीं, बल्कि क्षमता का प्रदर्शन बन चुका है। सवाल यही है क्या यह वही हिंदुत्व है, जिसे कभी सिर्फ आक्रामक या प्रतीकात्मक कहकर खारिज कर दिया जाता था? या फिर यह हिंदुत्व अब एक परिपक्व सामाजिक-आर्थिक मॉडल के रूप में सामने आ रहा है? अयोध्या में दिख रही तस्वीर बताती है कि आस्था को अगर नीति और नियोजन से जोड़ा जाए, तो वह सिर्फ भावनात्मक ऊर्जा नहीं रहती, बल्कि आर्थिक शक्ति बन जाती है।

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मोदी-योगी राज में हिंदुत्व की सबसे बड़ी शिफ्ट यही है। पहले मंदिर राजनीति का विषय थे, आज मंदिर विकास की धुरी बन रहे हैं। पहले आस्था और आधुनिकता को आमने-सामने खड़ा किया जाता था, आज दोनों एक-दूसरे के पूरक नजर आते हैं। राम मंदिर के दर्शन के बाद जब कोई श्रद्धालु साफ-सुथरे घाटों पर आरती देखता है, डिजिटल टिकटिंग का इस्तेमाल करता है या स्थानीय उत्पाद खरीदता है, तो वह अनजाने में ही इस नए मॉडल का हिस्सा बन जाता है। इस बदलाव का एक सामाजिक पहलू भी है। अयोध्या में बढ़ता पर्यटन स्थानीय संस्कृति और शिल्प को नया बाजार दे रहा है। हस्तशिल्प, लोककला, पारंपरिक व्यंजन ये सब अब सिर्फ स्मृति नहीं, बल्कि आजीविका के साधन बन रहे हैं। महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के जरिए जुड़ रही हैं, युवा गाइड और वॉलंटियर के रूप में काम कर रहे हैं। यह तस्वीर उस हिंदुत्व से अलग है, जिसे केवल धार्मिक ध्रुवीकरण के चश्मे से देखा जाता रहा।

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नए साल की भीड़ एक और संदेश देती है धार्मिक पर्यटन अब शहरी मध्यवर्ग और युवा पीढ़ी की पसंद बन रहा है। यह पीढ़ी मंदिर में दर्शन भी चाहती है और अच्छे इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधा भी। वह भक्ति के साथ अनुभव तलाशती है। मोदी-योगी मॉडल इसी मांग को समझता दिखता है। यही वजह है कि अयोध्या सिर्फ बुजुर्ग श्रद्धालुओं की नहीं, बल्कि युवाओं की भी यात्रा सूची में शामिल हो रही है। आलोचक यह सवाल जरूर उठाते हैं कि क्या विकास के नाम पर आस्था का व्यवसायीकरण हो रहा है। लेकिन अयोध्या की जमीनी हकीकत बताती है कि यहां संतुलन साधने की कोशिश है। धार्मिक गरिमा बनाए रखते हुए सुविधाएं बढ़ाई जा रही हैं। यह मॉडल अगर अन्य तीर्थों पर भी लागू होता है, तो भारत की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई मिल सकती है।

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अयोध्या आज एक संकेत है भविष्य का संकेत। यह संकेत बताता है कि भारत में हिंदुत्व अब केवल पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि विकास की रणनीति भी बन रहा है। मोदी-योगी काल में आस्था को हाशिये से निकालकर मुख्यधारा की योजना में लाया गया है। नए साल पर उमड़ी भीड़ महज संख्या नहीं, बल्कि उस भरोसे की गिनती है, जो लोगों ने इस मॉडल पर जताया है। अंत में सवाल यही है क्या अयोध्या सिर्फ एक शहर है, या एक प्रयोगशाला? शायद दोनों। यहां आध्यात्मिकता और विकास का संगम सिर्फ देखा नहीं जा रहा, बल्कि जिया जा रहा है। और अगर यही मॉडल आगे बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में अयोध्या सिर्फ राम की नगरी नहीं, बल्कि भारत की तीर्थयात्रा अर्थव्यवस्था की राजधानी के रूप में भी पहचानी जाएगी।

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