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राष्ट्रीय

Supreme Court Christian: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, धार्मिक परेड में भाग लेने से इनकार करने पर ईसाई आर्मी ऑफिसर की बर्खास्तगी बरकरार

व्यक्तिगत आस्था से ऊपर सैन्य अनुशासन, यही सर्वोच्च न्यायालय का संदेश

Last updated: November 26, 2025 3:07 am
KARTIK SHARMA - Sub Editor Published November 25, 2025
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Supreme Court of India building with national emblem, symbolizing judicial ruling on Indian Army officer dismissal case.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा — सेना में व्यक्तिगत धार्मिक आपत्ति अनुशासन से ऊपर नहीं हो सकतीSource: Supreme Court Judgment Proceedings & Case References
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Highlights
  • धर्म से पहले कर्तव्य, आर्मी में अनुशासन सर्वोपरि
  • सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश, यूनिफॉर्म में सब बराबर
  • व्यक्तिगत विश्वास नहीं तोड़ेगा सैन्य परंपरा का ढांचा
  • धर्मनीय सेना का सिद्धांत, विविधता में एकता
  • सैनिक की पहचान धर्म से नहीं, राष्ट्र सेवा से होती है

Supreme Court Christian Army officer dismissal: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसका प्रभाव भारतीय सेना की आंतरिक अनुशासन प्रणाली और सशस्त्र बलों में धार्मिक गतिविधियों से संबंधित नियमों की व्याख्या पर गहरा पड़ेगा। मामला है ईसाई पृष्ठभूमि के आर्मी ऑफिसर सैमुअल कमलेसन का, जिन्होंने अपनी यूनिट में होने वाली साप्ताहिक धार्मिक परेड में भाग लेने से इनकार किया था। इस आधार पर उन्हें सेवामुक्त कर दिया गया। कमलेसन ने इस कार्रवाई को धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार (Article 25) और व्यक्तिगत अंतरात्मा की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया और पहले दिल्ली हाई कोर्ट तथा बाद में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सशस्त्र बलों के अनुशासन और एकरूपता को धार्मिक आपत्ति के नाम पर भंग नहीं किया जा सकता।

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धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सैन्य अनुशासन

भारत का संविधान धर्म के पालन और प्रचार की पूर्ण स्वतंत्रता देता है, लेकिन जब बात सशस्त्र बलों की आती है, तो नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित होती हैं। कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि सेना केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि अनुशासन, समानता और आदेशों के पालन पर आधारित एक संस्थान है। सैनिक अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं का एक हिस्सा यूनिफॉर्म पहनते ही छोड़ देता है यह सैन्य व्यवस्था का मूल सिद्धांत है। सैमुअल कमलेसन का तर्क था कि धार्मिक परेड एक धार्मिक अनुष्ठान है, इसलिए उसे इसमें भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि इन परेडों का उद्देश्य धार्मिक भेदभाव को बढ़ाना नहीं, बल्कि यूनिट में आध्यात्मिक मनोबल, सामूहिकता और मानसिक अनुशासन बनाए रखना है। कोर्ट ने कहा कि यह सैन्य परंपरा भारत के सशस्त्र बलों में लंबे समय से प्रचलित है और इसे कोई व्यक्तिगत सैनिक अपने धर्म के आधार पर अस्वीकार नहीं कर सकता।

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कोर्ट के निर्णय की तर्कशक्ति

भारत के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा:

सेना में धार्मिक विभिन्नता के बावजूद ग्रुप एक्टिविटीज को यूनिट रिचुअल की तरह देखा जाता है

ये अनुष्ठान धार्मिक आत्म-प्रचार नहीं, बल्कि सामूहिक अनुशासन का प्रतीक होते हैं

सैनिकों के कर्तव्य और सैन्य शपथ व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं से ऊपर हैं

यहां अदालत ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया, व्यक्तिगत धार्मिक विश्वासों का अधिकार मान्य है, लेकिन जहां वे सैन्य अनुशासन से टकराते हैं, वहां अनुशासन सर्वोपरि होगा।

धर्मनिरपेक्ष सेना की अवधारणा

भारतीय सेना स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहती है। सेना की यूनिटों में अलग-अलग धर्मों के जवान और अधिकारी होते हैं। धार्मिक परेड या “सरब धर्म प्रार्थना” जैसी गतिविधियां अंतरधार्मिक भावनाओं को प्रोत्साहित करती हैं। इनमें किसी एक धर्म का प्रचार पूरी तरह प्रतिबंधित है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से इस अवधारणा को और मजबूती मिलती है कि सेना धार्मिक विविधता को सम्मान देते हुए भी अपने प्राथमिक उद्देश्य एकजुटता और राष्ट्र सुरक्षा पर केंद्रित रहती है।

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आगे का असर

यह फैसला आने वाले समय में कई उदाहरणों में मार्गदर्शक सिद्ध होगा। अगर कोई सैनिक धार्मिक आधार पर कोई आदेश मानने से इनकार करता है या सामूहिक यूनिट गतिविधियों से बाहर रहना चाहता है तो कमलेसन केस का निर्णय नजीर की तरह इस्तेमाल होगा। सेना में किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास इस हद तक मान्य रहेंगे, जब तक वे समूह अनुशासन, मनोबल और परिचालन क्षमता को प्रभावित न करें। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बताता है कि जब आप भारतीय सेना का हिस्सा होते हैं, तो आप सिर्फ एक नागरिक नहीं रहते आप राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के अंग बन जाते हैं। वहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक चयन की तुलना में सामूहिक अनुशासन, समानता और आदेश सर्वोपरि होते हैं।

यह निर्णय स्पष्ट संकेत देता है

सेना में धर्म के आधार पर भेद नहीं, लेकिन अनुशासन के आधार पर समान नियम लागू होंगे एक सैनिक की पहचान पहले एक आर्मी पर्सनल के रूप में है, उसके बाद ईसाई, हिंदू, मुस्लिम या सिख के रूप में इस फैसले ने संविधान की भावना और सैन्य अनुशासन दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया है। यह बताता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी संरचनाएं अपनी विशिष्ट विशेषताओं के कारण कुछ नागरिक स्वतंत्रताओं पर नियंत्रण रख सकती हैं और यह नियंत्रण संविधान के तहत वैध है।

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