Pakistan Prime Ministers military conflict: पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में एक विचित्र, और लगभग विडंबनापूर्ण पैटर्न दिखाई देता है। वहां के प्रधानमंत्री, चुनाव जीतकर जनता की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन अपना कार्यकाल पूरा करने में लगभग कभी सफल नहीं होते। यह केवल वर्तमान समय के इमरान खान का मामला नहीं है, बल्कि उनसे पहले आने वाले कई प्रधानमंत्रियों के साथ यही हुआ। शाहिद खाकान अब्बासी, बेनज़ीर भुट्टो, नवाज़ शरीफ़, यहां तक कि पाकिस्तान के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो भी इससे नहीं बच सके। प्रधानमंत्री का पद पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शक्ति का प्रतीक है। लेकिन इतिहास बताता है कि इस पद की किस्मत सैन्य सत्ता की इच्छा पर निर्भर रहती है।
शाहिद खाकान अब्बासी ‘अकाउंटेबिलिटी’ या चुनिंदा कार्रवाई?
जुलाई 2019 में शाहिद खाकान अब्बासी को LNG कॉन्ट्रैक्ट केस में गिरफ्तार किया गया। उस समय इमरान खान विपक्ष के खिलाफ अपने “अकाउंटेबिलिटी ड्राइव” पर तेज़ी से काम कर रहे थे। अब्बासी पर आरोप था कि उन्होंने 2013 में एक गैस आयात अनुबंध में देश को आर्थिक नुकसान पहुंचाया। परन्तु विपक्ष और कई विश्लेषकों के अनुसार, यह कार्रवाई कानून की तुलना में राजनीति से अधिक प्रेरित थी। कई समीक्षकों ने इसे कानूनी कार्रवाई की बजाय राजनीतिक बदले की कार्यवाही कहा। सरकार ने इसे जवाबदेही बताया जबकि विपक्ष ने इसे प्रताड़ना करार दिया।
‘दुनिया की सबसे ख़तरनाक नौकरियों में एक’ क्यों?
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद को अक्सर “दुनिया की सबसे जोखिमभरी राजनीतिक नौकरी” कहा जाता है।
क्योंकि,
- ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो गिरफ्तार, फिर फांसी
- बेनज़ीर भुट्टो दो बार बर्खास्त, फिर हत्या
- नवाज़ शरीफ़ पद से हटाए गए, निर्वासित, जेल
- शाहिद खाकान अब्बासी गिरफ्तार
- इमरान खान जेल में, लगभग अलग-थलग
यह एक ऐसा चक्र है जिसमें गिरफ्तारी, मुकदमे, निरस्तीकरण और दबाव – सत्ता के बदलते रोल के साथ घूमते रहते हैं।
इमरान खान का अकेलापन, रहस्य, भय और विरोध
इमरान खान इस समय जेल में हैं, और रिपोर्टों के अनुसार उन्हें मुलाकातों से वंचित रखा जा रहा है। उनके समर्थकों का आरोप है कि उन्हें आइसोलेशन में रखा जा रहा है, जबकि सच्चाई छिपाई जा रही है।सरकार उनके स्वास्थ्य को लेकर आश्वस्त करती है — जबकि परिवार और पार्टी नेता कहते हैं कि कुछ अपरिवर्तनीय छिपाया जा रहा है। यही अंतर पाकिस्तान में गहरी सार्वजनिक शंका का आधार बना सड़कों पर आंदोलन हुआ, देश में रेड अलर्ट घोषित हुआ, इस्लामाबाद और रावलपिंडी में सुरक्षा कड़ी की गई। रावलपिंडी जहां सेना का प्रभाव सबसे मजबूत और इस्लामाबाद जहां लोकतांत्रिक सत्ता स्थित इन दोनों का टकराव जैविक रूप से पाकिस्तान के शक्ति-संरचना का प्रतीक है।
सेना बनाम प्रधानमंत्री, पाकिस्तान का वास्तविक ‘पावर-सेंटर’
पाकिस्तान की शक्ति-व्यवस्था में सेना सिर्फ सहयोगी संस्था नहीं, बल्कि कई बार सर्वोच्च शक्ति के रूप में उभरती है।
- 1977: जनरल ज़िया-उल-हक़ — ज़ुल्फ़िकार भुट्टो को हटाते हैं
- 1999: जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ — नवाज़ शरीफ़ को हटाते हैं
- वर्तमान: जनरल आसिम मुनीर के साथ इमरान खान का टकराव
सेना प्रमुख केवल सैन्य कमांडर नहीं, बल्कि पाकिस्तान की राजनीतिक दिशा के प्रमुख निर्णायक भी रहते हैं। इमरान खान की गिरफ्तारी केवल कानूनी औपचारिकता नहीं बल्कि, सेना के साथ उनके सार्वजनिक टकराव का परिणाम भी मानी जा रही है।
इमरान बनाम मुनीर: एक व्यक्तिगत-राजनीतिक संघर्ष
इमरान खान, जो अपने शुरुआती दौर में सेना के साथ करीबी संबंध बनाए हुए थे, बाद में टकराव की राह पर चले गए। उन्होंने मुनीर को ISI प्रमुख के पद से हटाया और उनकी तरक्की रोकने का प्रयास किया।
मुनीर ने इसे सेना की सत्ता के खिलाफ चुनौती के रूप में देखा। कई पाकिस्तानी नागरिक, विशेष रूप से खान के समर्थक, इसे ‘पंजाबी-प्रभुत्व वाली सेना बनाम पश्तून नेता’ के संघर्ष के रूप में देखते हैं।
पाकिस्तान की शक्ति-संरचना,
- सेना मुख्यतः पंजाबी
- जनता का भावनात्मक नेतृत्व पश्तून और शहरी वर्गों में इमरान खान
यह जातीय-सत्ता का तनाव राजनीतिक संघर्ष को और घना कर देता है।
अंत में प्रश्न वही, लोकतंत्र या नियंत्रित लोकतंत्र?
आज पाकिस्तान आर्थिक संकट से गुजर रहा है — महंगाई, विदेशी कर्ज़, IMF की शर्तें जनता परेशान है। ऐसे समय में एक और प्रधानमंत्री सत्ता से बाहर किया गया, जेल गया, और जनता सड़क पर उतर आई। यह प्रश्न बार-बार उठ रहा है, क्या पाकिस्तान में जनता प्रधानमंत्री चुनती है, या सेना उन्हें हटाती है?
अतीत बताता है सैन्य सत्ता ने बार-बार लोकतांत्रिक नेतृत्व को सीमित किया है। भविष्य के लिए अनिश्चितता बनी हुई है। क्या पाकिस्तान कभी सिविलियन शक्तियों के नेतृत्व में स्थिर लोकतंत्र बन पाएगा? या यह चक्र चुनाव, टकराव, गिरफ्तारी फिर दुहराया जाएगा?
