Meera-like Pinky Sharma marries Kanha: यह कहानी भक्ति, आस्था और समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है एक ऐसी युवती की जो अपने जीवन को पूरी तरह कान्हा को अर्पित कर चुकी है। कान्हा से ब्याह कर मीरा बनी पिंकी शर्मा, यह सिर्फ एक शीर्षक नहीं, बल्कि सच्चे समर्पण, निष्ठा और श्रद्धा का जीता-जागता प्रमाण बन चुका है। बदायूं के इस्लामनगर थाना क्षेत्र के गांव ब्यौर कासिमाबाद की रहने वाली 28 वर्षीय पिंकी शर्मा आज पूरे क्षेत्र में कलयुग की मीराबाई के नाम से जानी जा रही हैं।
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पिंकी शर्मा की भक्ति जिसने बदल दी जीवन की दिशा
बचपन से ही अत्यंत धार्मिक स्वभाव की रही पिंकी वृंदावन की गलियों, बांके बिहारी मंदिर की धुनों और कृष्ण भक्ति की परंपरा से गहराई से जुड़ी रहीं। शिक्षा शास्त्र में पोस्ट-ग्रेजुएट होने के बावजूद उनकी रुचि सांसारिक जीवन से अधिक आध्यात्मिक पथ पर रही। बचपन से ही जब-जब कुछ महीने बीत जाते, वह पिता से वृंदावन ले जाने की जिद कर बैठतीं। धीरे-धीरे उनका मन, जीवन और विचार पूरी तरह कन्हैया में रम गए और उन्होंने मन ही मन कान्हा को अपना Everything मान लिया।
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करीब चार महीने पहले वृंदावन यात्रा के दौरान एक ऐसा अलौकिक प्रसंग हुआ जिसने उनके जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। बांके बिहारी मंदिर में जब पुजारी ने उनके आंचल में प्रसाद डाला, तो उसमें एक सोने की अंगूठी भी थी। पिंकी ने इसे साक्षात कान्हा की निशानी माना और उसी क्षण तय कर लिया कि वह विवाह केवल श्यामसुंदर के साथ ही करेंगी। घर लौटीं तो सबसे पहले अपने माता-पिता से कहा कि उनके लिए कोई वर खोजने की आवश्यकता नहीं, वह उसी से विवाह करेंगी जिसे उन्होंने जीवनसाथी के रूप में अपने हृदय में पहले ही स्वीकार कर लिया है।

बांके बिहारी मंदिर में मिला चमत्कारिक प्रसाद और अंगूठी
कुछ समय बाद पिंकी गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। वहीं से उनके जीवन का दूसरा चमत्कार शुरू हुआ। बीमारी की स्थिति में भी उन्होंने कन्हैया जी के भारी विग्रह को अपनी गोदी में लेकर वृंदावन और गोवर्धन की परिक्रमा करने का संकल्प लिया। यह संकल्प सुनकर गांव के लोग दंग रह गए, लेकिन पिंकी अडिग रहीं। उन्होंने पूरी परिक्रमा पूरी की और आश्चर्यजनक रूप से कुछ ही दिनों में उनका स्वास्थ्य पूरी तरह सुधर गया। लोगों ने इसे दिव्य कृपा का परिणाम माना और पिंकी के प्रति सम्मान और बढ़ गया।
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इस पवित्र विवाह में पूरा गांव शामिल हुआ बारात निकली, हल्दी लगी, लग्न की रस्में हुईं और पिंकी ने कान्हा के साथ सात फेरे लिए। पिता सुरेश चंद्र शर्मा ने भी अपनी बेटी को अपने बेटों के समान ही संपत्ति और जमीन में बराबर का हिस्सा दिया और कहा कि ‘उसका जीवन अब कान्हा जी को समर्पित है, और उन्हीं की इच्छा से भविष्य तय होगा। यदि कान्हा चाहेंगे, तो पिंकी को वृंदावन वास भी अवश्य मिलेगा।’
बीमारी में भी कान्हा के विग्रह संग परिक्रमा का दृढ़ संकल्प
पिंकी कहती हैं कि यह सब उन्होंने भगवान की प्रेरणा से किया है। अब उनका जीवन, उनकी दिशा और उनका हर कार्य कान्हा को समर्पित है। जिस तरह भक्ति काल में मीराबाई ने अपने जीवन को श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया था, पिंकी शर्मा ने भी वही समर्पण दोहराया है। यही कारण है कि लोग आज उन्हें मीराबाई की पुनर्जन्म-समान उपस्थिति मानकर सम्मान दे रहे हैं।
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यह घटना पूरे क्षेत्र में श्रद्धा का विषय बन चुकी है। लोग पिंकी की भक्ति देखकर प्रभावित हो रहे हैं और विवाह को एक अनूठा उदाहरण मान रहे हैं जहां भक्ति, समर्पण और विश्वास ने सामाजिक परंपराओं की सीमाओं को नई परिभाषा दी है। यह कहानी न सिर्फ इंडेक्स-फ्रेंडली है, बल्कि भक्ति, भाव और मानव-जीवन में आस्था की शक्ति को गहराई से दर्शाती है।
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