Prem Kumar Bihar Speaker: बिहार विधानसभा की राजनीति में एक अहम अध्याय जुड़ गया है। गया टाउन से नौ बार के भाजपा विधायक प्रेम कुमार का बिहार विधानसभा अध्यक्ष बनना सिर्फ एक संवैधानिक पद पर नियुक्ति नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीतिक यात्रा, जेपी आंदोलन की विरासत और सामाजिक संतुलन की राजनीति का भी प्रतीक है। प्रेम कुमार का नाम जैसे ही स्पीकर पद के लिए सामने आया, एनडीए के भीतर भाजपा और जद(यू) के बीच खींचतान की अटकलों पर विराम लग गया। वे इस पद के लिए नामांकन करने वाले एकमात्र विधायक बने, जिससे उनका निर्विरोध निर्वाचन तय हो गया।
नामांकन के बाद प्रेम कुमार ने कहा कि वे एनडीए नेतृत्व के आभारी हैं और अपने 35 वर्षों के विधायी अनुभव के सहारे सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश करेंगे। उन्होंने इसे लोकतंत्र की खूबसूरती बताया कि कई दावेदारों के बावजूद उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई। उनके इस बयान से यह साफ झलकता है कि वे अध्यक्ष पद को सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि सदन की गरिमा और संतुलन बनाए रखने का माध्यम मानते हैं।
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70 वर्षीय प्रेम कुमार भाजपा के उन वरिष्ठ नेताओं में से हैं, जिनकी राजनीतिक यात्रा 1974 के ऐतिहासिक जेपी आंदोलन से शुरू हुई थी। उस दौर में बिहार की राजनीति में एक ऐसा समूह उभरा था, जिसने आगे चलकर राज्य और देश की राजनीति को दिशा दी। इस समूह में स्वर्गीय सुशील कुमार मोदी, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष नंद किशोर यादव और पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे जैसे नाम शामिल थे। आज प्रेम कुमार ही इस पीढ़ी के ऐसे नेता हैं, जो सक्रिय राजनीति में बने हुए हैं। सुशील मोदी का पिछले साल निधन हो चुका है, नंद किशोर यादव ने हाल के विधानसभा चुनाव नहीं लड़े और अश्विनी चौबे लोकसभा टिकट न मिलने के बाद राजनीतिक रूप से शांत हैं। ऐसे में प्रेम कुमार को स्पीकर बनाना भाजपा के लिए अपने वरिष्ठ नेता को सम्मान देने जैसा कदम माना जा रहा है।
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि प्रेम कुमार का चयन केवल उनकी वरिष्ठता के कारण नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन के लिहाज से भी अहम है। वे अत्यंत पिछड़ा वर्ग यानी ईबीसी के चंद्रवंशी समुदाय से आते हैं। बिहार की राजनीति में सामाजिक समीकरण बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं और ऐसे में ईबीसी समुदाय से आने वाले अनुभवी नेता को विधानसभा अध्यक्ष बनाना एक संदेश भी देता है।
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शैक्षणिक दृष्टि से भी प्रेम कुमार की पहचान मजबूत है। वे इतिहास में पीएचडी हैं। गया जैसे ऐतिहासिक शहर से आने वाले प्रेम कुमार का अकादमिक झुकाव और राजनीतिक अनुभव उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाता है। उन्होंने 1990 में पहली बार गया टाउन से विधायक का चुनाव जीता था और तब से लगातार इसी सीट से जीत दर्ज करते आ रहे हैं। तीन दशकों से अधिक समय तक एक ही सीट पर जनता का भरोसा बनाए रखना आसान नहीं होता, लेकिन प्रेम कुमार इसमें सफल रहे हैं।
सरकार में उनकी भूमिका भी काफी अहम रही है। वर्ष 2005 से वे लगातार मंत्री रहे और उन्होंने लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण, शहरी विकास, कृषि, पर्यावरण एवं वन जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले। इन विभागों में काम करते हुए उन्होंने जमीनी स्तर पर विकास से जुड़ी नीतियों को लागू करने का अनुभव हासिल किया। यही प्रशासनिक अनुभव अब विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनके काम आएगा।
प्रेम कुमार के करीबी लोग उन्हें एक सुलभ और जमीन से जुड़े नेता के रूप में बताते हैं। उनके सहयोगी शत्रुघ्न भदानी के अनुसार, प्रेम कुमार अपने परिवार के पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जो राजनीति में आए। उनका पारिवारिक背景 बेहद साधारण रहा है। विधायक बनने से तीन साल पहले उन्होंने अपने चार दोस्तों के साथ मिलकर एक दवा का व्यवसाय शुरू किया था। लेकिन जैसे ही वे विधायक बने, उन्होंने उस व्यवसाय में अपनी हिस्सेदारी छोड़ दी। यह उनके सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उनके भाई ने कुछ समय तक गया में इलेक्ट्रिकल सामान की दुकान चलाई, जबकि उनके बेटे प्रेम सागर भाजपा में सक्रिय हैं।
राजनीतिक सफर में प्रेम कुमार को विपक्ष की भूमिका निभाने का भी अनुभव है। वर्ष 2015 से 2017 तक, जब नीतीश कुमार महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री थे, तब प्रेम कुमार ने बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभाई। इस दौरान उन्होंने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए और सदन में विपक्ष की आवाज को मजबूती से रखा। बाद में नीतीश कुमार के एनडीए में लौटने के साथ राजनीतिक समीकरण बदले, लेकिन प्रेम कुमार की भूमिका और अनुभव की अहमियत बनी रही।
हाल के विधानसभा चुनावों में भी प्रेम कुमार ने अपनी राजनीतिक ताकत साबित की। गया टाउन सीट पर उन्होंने कांग्रेस के ओंकार नाथ को 11 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। यह जीत बताती है कि उम्र और लंबे राजनीतिक सफर के बावजूद उनकी पकड़ अपने क्षेत्र में अब भी मजबूत है।
विधानसभा अध्यक्ष बनने के साथ ही प्रेम कुमार बिहार के उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने नेता प्रतिपक्ष और स्पीकर दोनों की भूमिका निभाई है। उनसे पहले नंद किशोर यादव और वर्तमान उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ही ऐसे नेता रहे हैं, जिन्हें यह अनुभव मिला है। यह उपलब्धि उनके राजनीतिक कद को और ऊंचा करती है।
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कुल मिलाकर, प्रेम कुमार का बिहार विधानसभा अध्यक्ष बनना कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह जेपी आंदोलन की विरासत को सम्मान देने जैसा है, यह भाजपा के एक वरिष्ठ और अनुभवी नेता को उचित स्थान देने का संकेत है, और यह बिहार की सामाजिक व राजनीतिक संतुलन की राजनीति को भी दर्शाता है। एक ऐसे नेता के हाथ में सदन की कमान जाना, जो सत्ता और विपक्ष दोनों की भूमिका निभा चुका हो, बिहार की संसदीय परंपराओं के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
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