Banke Bihari Temple Darshan Time Controversy: वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत के केंद्र में है। इस बार विवाद आस्था, परंपरा और व्यवस्था के टकराव से जुड़ा है। सवाल यह है कि क्या भगवान के दर्शन का समय बढ़ाना श्रद्धालुओं की सुविधा है या भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप “कान्हा” के विश्राम के अधिकार में हस्तक्षेप। यही बहस अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है और इसने धार्मिक परंपराओं, प्रशासनिक दखल और श्रद्धालुओं की आस्था को लेकर एक नई चर्चा छेड़ दी है।

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बांके बिहारी मंदिर की पहचान केवल एक पूजा स्थल के रूप में नहीं है, बल्कि यह उस दुर्लभ परंपरा का प्रतीक है जहां भगवान को एक जीवंत बालक की तरह पूजा जाता है। यहां भगवान कृष्ण को “बाल स्वरूप” में माना जाता है, जिन्हें सजीव मानकर जगाया जाता है, सजाया जाता है, भोग लगाया जाता है और फिर विश्राम कराया जाता है। यही कारण है कि मंदिर की दिनचर्या किसी आम मंदिर जैसी नहीं बल्कि एक परिवार की तरह चलती है, जहां कान्हा के जागरण, भोजन और शयन का समय तय है। सदियों से चली आ रही इस व्यवस्था को बदलना मंदिर प्रबंधन और गोस्वामी समुदाय के लिए केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि आस्था पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।
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विवाद की जड़ उस हाई-पावर्ड कमेटी से जुड़ी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल बांके बिहारी मंदिर के कामकाज की निगरानी के लिए गठित किया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक रिटायर जज की अध्यक्षता वाली इस समिति ने मंदिर व्यवस्था में तीन बड़े फैसले किए। पहला, श्रद्धालुओं के लिए दर्शन का समय बढ़ाया गया, जिससे सितंबर महीने में करीब ढाई घंटे अतिरिक्त दर्शन की अनुमति दी गई। दूसरा, देहरी पूजा पर रोक लगा दी गई, जो गोस्वामी परंपरा का एक अहम हिस्सा मानी जाती है। तीसरा, वीआईपी पास के जरिए विशेष दर्शन को भी बंद कर दिया गया। समिति का तर्क था कि इन फैसलों से दर्शन व्यवस्था अधिक समान, पारदर्शी और श्रद्धालु हितैषी बनेगी।
लेकिन इन फैसलों के बाद मंदिर प्रबंधन और गोस्वामी समाज में असंतोष गहराता चला गया। उनका कहना है कि दर्शन का समय बढ़ाने से भगवान को विश्राम का समय नहीं मिल पा रहा है, जिससे पारंपरिक पूजा पद्धति प्रभावित हो रही है। गोस्वामी समिति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि समिति ने बिना परंपरा को समझे मनमाने फैसले लिए हैं। उनका यह भी कहना है कि भगवान बांके बिहारी कोई मूर्ति मात्र नहीं, बल्कि सजीव बालक के रूप में पूजे जाते हैं और उनके साथ व्यवहार भी उसी भावना से होना चाहिए।
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गोस्वामी समिति के अनुसार, सुबह विशेष पूजा के साथ कान्हा को जगाया जाता है, फिर श्रृंगार और भोग के बाद श्रद्धालुओं के दर्शन होते हैं। दोपहर में फिर भोग लगता है और उसके बाद भगवान को शयन के लिए विराम दिया जाता है। शाम को भी इसी तरह पूजा और दर्शन की प्रक्रिया होती है। इस पूरी व्यवस्था में हर समय का धार्मिक महत्व है। दर्शन का समय बढ़ाने से यह संतुलन बिगड़ रहा है और भगवान को लगातार दर्शन के लिए रखा जा रहा है, जो उनकी बाल स्वरूप की परंपरा के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई सोमवार, 15 दिसंबर को हुई, जहां गोस्वामी समिति की याचिका पर विस्तार से चर्चा की गई। इस दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने मंदिर व्यवस्था को लेकर कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि दर्शन का समय इस तरह बढ़ा दिया गया है कि भगवान को एक सेकंड के लिए भी आराम नहीं मिल पा रहा। उन्होंने यह भी कहा कि कहीं न कहीं भगवान का शोषण हो रहा है और अमीरों से मोटी रकम लेकर विशेष पूजा कराई जाती है, जो आस्था के मूल भाव के खिलाफ है। CJI की यह टिप्पणी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई।
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ने इस बहस को और गहरा कर दिया। एक ओर समिति का दावा है कि दर्शन समय बढ़ाने से आम श्रद्धालुओं को राहत मिलेगी और भीड़ प्रबंधन बेहतर होगा। दूसरी ओर गोस्वामी समिति इसे भगवान के अधिकारों और परंपरा पर हमला बता रही है। CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और स्पष्ट किया कि अदालत के लिए यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि आस्था से भी जुड़ा है।
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गोस्वामी समिति ने अपनी याचिका में यह भी आरोप लगाया है कि देहरी पूजा पर रोक और गोस्वामियों की नियुक्ति में मनमानी की गई है। उनका कहना है कि सदियों से चली आ रही परंपराओं में बिना संवाद के बदलाव करना धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। समिति का तर्क है कि मंदिर केवल एक सार्वजनिक स्थल नहीं बल्कि जीवंत आस्था का केंद्र है, जहां हर निर्णय बेहद संवेदनशील होना चाहिए।
इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आधुनिक व्यवस्थाओं और भीड़ नियंत्रण के नाम पर धार्मिक परंपराओं में बदलाव किया जाना चाहिए। क्या भगवान के दर्शन का समय बढ़ाना वास्तव में श्रद्धालुओं के हित में है या इससे आस्था की मूल भावना कमजोर हो रही है। बांके बिहारी मंदिर का मामला इस बहस का प्रतीक बन गया है, जहां आस्था, परंपरा और व्यवस्था आमने-सामने खड़ी नजर आ रही हैं।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह भी संकेत मिलता है कि अदालत केवल प्रशासनिक फैसलों को नहीं, बल्कि भगवान के विश्राम और परंपरा के अधिकार को भी गंभीरता से ले रही है। आने वाले समय में इस मामले पर जो भी फैसला आएगा, उसका असर केवल बांके बिहारी मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर के उन धार्मिक स्थलों पर भी पड़ेगा, जहां परंपरा और आधुनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की कोशिश चल रही है। फिलहाल, वृंदावन की गलियों से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत तक एक ही सवाल गूंज रहा है क्या कान्हा को उनके आराम का अधिकार मिल पाएगा या दर्शन की दौड़ में यह परंपरा पीछे छूट जाएगी।
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