Why auspicious work is prohibited during Kharmas: हिंदू धर्म और भारतीय पंचांग में खरमास का विशेष महत्व माना गया है। यह वह समय होता है जब सूर्य देव एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में शुभ और मांगलिक कार्य करना वर्जित माना जाता है। आम जनमानस के बीच यह सवाल अक्सर उठता है कि आखिर खरमास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण जैसे संस्कार क्यों नहीं किए जाते और इसके पीछे क्या धार्मिक व ज्योतिषीय कारण हैं।
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब सूर्य देव धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं, तब उस काल को खरमास कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान सूर्य की गति मंद हो जाती है और देवताओं के लिए यह विश्राम काल जैसा होता है। सूर्य को ऊर्जा, तेज और जीवन शक्ति का प्रतीक माना गया है। जब सूर्य कमजोर अवस्था में होते हैं, तब नए कार्यों की शुरुआत से सकारात्मक फल नहीं मिलते—ऐसी धारणा शास्त्रों में मिलती है। इसी कारण शुभ कार्यों को इस अवधि में टालने की परंपरा बनी।
ज्योतिषीय दृष्टि से देखा जाए तो सूर्य का संक्रमण काल अशुभ प्रभाव वाला माना जाता है। विवाह और अन्य संस्कारों के लिए जिन ग्रहों की अनुकूलता आवश्यक होती है, वह खरमास के दौरान कमजोर मानी जाती है। यही वजह है कि इस समय कोई भी शुभ मुहूर्त नहीं निकलता। पंडितों और ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, बिना मुहूर्त किए गए मांगलिक कार्य जीवन में बाधा, कलह या विलंब का कारण बन सकते हैं।
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पौराणिक कथाओं में भी खरमास का उल्लेख मिलता है। एक मान्यता के अनुसार इस समय देवता योग निद्रा में रहते हैं, इसलिए विवाह जैसे संस्कारों के साक्षी नहीं बनते। जब देवताओं की उपस्थिति नहीं मानी जाती, तब विवाह को पूर्ण फलदायी नहीं समझा जाता। यही कारण है कि समाज में पीढ़ियों से यह परंपरा चली आ रही है कि खरमास में केवल धार्मिक साधना, व्रत, जप और दान-पुण्य जैसे कार्य ही किए जाएं।
हालांकि, खरमास को पूरी तरह नकारात्मक समय भी नहीं माना जाता। इस अवधि को आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक उन्नति के लिए श्रेष्ठ बताया गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि खरमास में किया गया दान, जैसे अन्नदान, वस्त्रदान और जरूरतमंदों की सेवा, कई गुना पुण्य फल देता है। यही वजह है कि इस समय साधु-संत और धर्मगुरु तप, जप और भक्ति पर विशेष जोर देते हैं।
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आधुनिक समय में कुछ लोग इन मान्यताओं को परंपरा से जोड़कर देखते हैं, जबकि कुछ लोग वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसे सांस्कृतिक विरासत मानते हैं। फिर भी, आज भी देश के बड़े हिस्से में खरमास के दौरान विवाह और शुभ कार्य टाल दिए जाते हैं। यह न केवल आस्था का विषय है, बल्कि सामाजिक सामंजस्य और धार्मिक अनुशासन का भी प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से खरमास को संयम और साधना का काल कहा गया है, न कि नए शुभ आरंभ का।
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