Kewda Flower Benefits: यह कहानी केवड़े के फूल की है उस फूल की, जिसकी खुशबू सिर्फ़ हवा में नहीं घुलती, बल्कि इंसान के मन और सोच तक उतर जाती है। केवड़े का फूल सदियों से भारतीय जीवन-शैली का हिस्सा रहा है। पूजा-पाठ से लेकर आयुर्वेद तक, इत्र से लेकर रसोई तक हर जगह इसकी मौजूदगी बताती है कि प्रकृति ने इंसान को कितनी बड़ी सौगात दी है। लेकिन अफ़सोस, आज जब इंसान के भीतर तनाव, चिड़चिड़ापन और नफ़रत बढ़ रही है, तब कुछ लोग सुगंध की जगह ज़हर फैलाने में लगे हैं।
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केवड़े का फूल अपनी भीनी-भीनी खुशबू के लिए जाना जाता है। इसकी महक दिमाग़ को सुकून देती है, मन को शांत करती है और नकारात्मकता को दूर भगाती है। आयुर्वेद मानता है कि केवड़े की खुशबू तनाव, अनिद्रा और बेचैनी में राहत देती है। यानी यह फूल सीधे-सीधे इंसान को बेहतर इंसान बनाने में मदद करता है। अब ज़रा सोचिए, अगर कुछ कट्टरपंथी लोग भी दिन की शुरुआत केवड़े की खुशबू से करें, तो शायद उनकी सुबह गाली से नहीं, गहरी सांस से शुरू हो।
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आज के दौर में सबसे बड़ा रोग है मानसिक तनाव। हर किसी के पास शिकायत है किसी को धर्म से, किसी को भाषा से, किसी को पहनावे से। केवड़े का फूल इन सब विवादों से ऊपर है। न इसे हिंदू-मुसलमान की पहचान चाहिए, न जाति-पंथ का प्रमाणपत्र। इसकी खुशबू सबके लिए एक-सी है। लेकिन कट्टर सोच वालों को यह बात हज़म नहीं होती, क्योंकि उन्हें समाधान नहीं, टकराव चाहिए। उन्हें सुकून नहीं, शोर चाहिए।
केवड़े का फूल सिखाता है कि बिना चिल्लाए भी अपनी पहचान बनाई जा सकती है। यह फूल न तो सड़क पर नारे लगाता है, न सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलाता है, फिर भी इसकी खुशबू दूर-दूर तक फैलती है। इसके उलट, कट्टरपंथी विचारधाराएं जितना चिल्लाती हैं, उतनी ही बदबू फैलाती हैं दिमाग़ में, समाज में और रिश्तों में। अगर इन्हें सच में अपनी संस्कृति से प्यार होता, तो शायद वे केवड़े जैसे फूलों से सीख लेते।
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सेहत के लिहाज़ से केवड़ा पाचन को बेहतर बनाता है, सिरदर्द में राहत देता है और दिल-दिमाग़ को ठंडक पहुंचाता है। यानी यह शरीर और मन दोनों का इलाज है। अब सोचिए, जिन लोगों को हर वक्त गुस्सा आता है, हर बात में साज़िश दिखती है, उन्हें असल में दवा नहीं, केवड़े की खुशबू चाहिए। शायद उनकी नसों में दौड़ता ज़हर थोड़ा कम हो जाए।
केवड़े का फूल यह भी सिखाता है कि ताक़त शांति में होती है, उन्माद में नहीं। इसकी खुशबू दबाव नहीं बनाती, बल्कि धीरे-धीरे असर करती है। ठीक वैसे ही जैसे सकारात्मक सोच। लेकिन कट्टरपंथियों को तुरंत असर चाहिए तुरंत भीड़, तुरंत हंगामा, तुरंत नफ़रत। उन्हें यह समझ नहीं आता कि समाज को जोड़ने वाली चीज़ें अक्सर शांत होती हैं, और तोड़ने वाली चीज़ें हमेशा शोर मचाती हैं।
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आज ज़रूरत है कि हम केवड़े के फूल को सिर्फ़ इत्र या पूजा तक सीमित न रखें, बल्कि उसके संदेश को अपनाएं। सुगंध फैलाइए, ज़हर नहीं। सुकून दीजिए, डर नहीं। अगर ऐसा हो गया, तो शायद आने वाली पीढ़ी को यह न सीखना पड़े कि कट्टरता कैसे फैलती है, बल्कि यह समझ आए कि खुशबू कैसे फैलती है। केवड़े का फूल यही कहता है कम बोलो, अच्छा फैलाओ।
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