BULANDSHAHR LIFE IMPRISONMENT CASE: बुलंदशहर से आई अदालत की एक तस्वीर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। एक ऐसा अपराधी, जिसे अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई, उसके चेहरे पर न पश्चाताप दिखा, न शर्म—बल्कि मुस्कान थी। यही मुस्कान आज सबसे बड़ा सवाल बन गई है। यह सिर्फ एक आरोपी की हंसी नहीं, बल्कि उस विकृत और कट्टरपंथी सोच का प्रतीक है, जो कानून, समाज और इंसानियत तीनों को चुनौती देती है।
पीड़िता के लिए अदालत का फैसला न्याय की ओर एक कदम जरूर है, लेकिन आरोपी का यह रवैया उसके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। जिस शख्स ने उसकी जिंदगी को अंधेरे में धकेला, वही शख्स सजा सुनाए जाने के बाद भी बेपरवाह नजर आया। यह दृश्य बताता है कि कुछ अपराधी सिर्फ कानून नहीं तोड़ते, बल्कि समाज की नैतिक सीमाओं को भी ठुकरा देते हैं।
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यह मामला केवल अपराध और सजा तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक खतरनाक मानसिकता काम करती दिखती है कट्टर और अमानवीय सोच, जिसमें महिला को इंसान नहीं, बल्कि वस्तु समझा जाता है। ऐसी सोच अक्सर खुद को किसी न किसी विचारधारा, वर्चस्व या झूठी ताकत के खोल में छुपा लेती है। जब अपराधी को लगता है कि वह किसी ऊपर की ताकत या सिस्टम की कमजोरियों के सहारे बच सकता है, तब कानून का डर उसके चेहरे से गायब हो जाता है।
पीड़िता का बयान कि ऐसे दरिंदों को चौराहे पर फांसी होनी चाहिए सिर्फ गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं है। यह उस असुरक्षा की चीख है, जो हर उस बेटी के मन में बैठ जाती है, जो न्याय की प्रक्रिया से गुजरती है। उम्रकैद जैसी सजा भी तब अधूरी लगने लगती है, जब दोषी के चेहरे पर पछतावे की जगह हंसी हो। यह हंसी पीड़िता के लिए दोबारा मिला मानसिक आघात है।
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परिवार का दर्द भी उतना ही गहरा है। उनका कहना है कि अगर आरोपी को सच में कानून का डर होता, तो उसका व्यवहार ऐसा न होता। यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या हमारी न्याय व्यवस्था सिर्फ सजा सुनाने तक सीमित रह जाती है, या फिर अपराधी की मानसिकता तोड़ने में भी सक्षम है। कट्टरपंथी सोच यहीं सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आती है, क्योंकि यह अपराधी को यह भ्रम देती है कि वह किसी भी सजा से ऊपर है।
कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि उम्रकैद का अर्थ आजीवन कारावास होता है, लेकिन सजा में समीक्षा या छूट की संभावनाएं पीड़ितों के मन में डर पैदा करती हैं। यही कारण है कि समाज में मृत्युदंड जैसी मांगें तेज होती हैं। हालांकि, न्याय का उद्देश्य बदला नहीं, बल्कि अपराध की पुनरावृत्ति रोकना और समाज में कानून का भय स्थापित करना है।
सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर तीखी बहस चल रही है। कुछ लोग पीड़िता के समर्थन में सख्त सजा की मांग कर रहे हैं, तो कुछ यह सवाल उठा रहे हैं कि जब कानून मौजूद हैं, तब भी अपराध क्यों नहीं रुक रहे। महिला अधिकार संगठनों का कहना है कि सिर्फ सजा बढ़ाना काफी नहीं, बल्कि कट्टर और विकृत सोच पर भी चोट करनी होगी। स्कूलों, परिवारों और समाज में संवेदनशीलता, लैंगिक सम्मान और कानून की समझ को मजबूत करना उतना ही जरूरी है।
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यह केस हमें याद दिलाता है कि न्याय सिर्फ अदालत के फैसले से पूरा नहीं होता। पीड़ित को सम्मान, सुरक्षा और मानसिक शांति देना भी उतना ही अहम है। बुलंदशहर केस में उम्रकैद का फैसला मजबूत संदेश है, लेकिन आरोपी की हंसी यह बताती है कि कट्टरपंथी सोच अभी जिंदा है। आज जरूरत है कि सिस्टम और समाज दोनों मिलकर यह साफ संदेश दें—कानून से ऊपर कोई नहीं, और महिलाओं की गरिमा से खिलवाड़ करने वालों के लिए इस समाज में कोई जगह नहीं।
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