Congress RSS Al Qaeda Controversy: देश की राजनीति में बयानबाज़ी कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब शब्दों की सीमा टूटती है और तुलना ऐसी संस्थाओं से की जाती है जिनका सीधा संबंध आतंकवाद से है, तब सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं, राष्ट्रीय संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का भी बन जाता है। हालिया विवाद इसी बिंदु पर आकर टिक गया है, जहां कांग्रेस सांसद के एक बयान ने सियासी तापमान को अचानक बढ़ा दिया। इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में हैं वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, जिनके एक सोशल मीडिया पोस्ट से बहस की चिंगारी भड़की। लेकिन आग में घी तब पड़ा जब कांग्रेस के लोकसभा सांसद मणिक्कम टैगोर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना सीधे अल कायदा जैसे आतंकी संगठन से कर दी।
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क्या राजनीतिक विरोध में इतनी दूर जाना जरूरी है?
मणिक्कम टैगोर ने कहा कि RSS और अल कायदा का काम “एक जैसा” है क्योंकि दोनों नफरत फैलाते हैं। यह बयान सुनने में भले ही एक राजनीतिक हमला लगे, लेकिन सवाल यह है क्या वैचारिक असहमति को आतंकवाद से जोड़ना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा हो सकता है? और अगर ऐसा है, तो फिर राजनीति और उकसावे में फर्क कहां रह जाता है?
RSS, चाहे उसके विचारों से कोई सहमत हो या असहमत, एक पंजीकृत सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। दूसरी ओर अल कायदा एक अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क है, जिसने हजारों निर्दोष लोगों की जान ली है। इन दोनों की तुलना करना क्या सिर्फ बयानबाज़ी है या जानबूझकर किया गया उकसावा?
बीजेपी का पलटवार कांग्रेस नेतृत्व से जवाब की मांग
इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। बीजेपी प्रवक्ता नलिन कोहली ने इसे निंदनीय और शर्मनाक बताया और कांग्रेस नेतृत्व से सीधा सवाल किया, क्या राहुल गांधी और सोनिया गांधी इस तुलना से सहमत हैं? बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस नेता लगातार ऐसे बयान देते हैं, जिनका उद्देश्य बहस नहीं बल्कि विभाजन पैदा करना होता है। सवाल यह भी उठता है कि अगर यह व्यक्तिगत बयान था, तो कांग्रेस पार्टी ने अब तक इससे दूरी क्यों नहीं बनाई?
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दिग्विजय सिंह का मूल बयान और भ्रम की राजनीति
इस पूरे विवाद की शुरुआत दिग्विजय सिंह के उस पोस्ट से हुई, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी की एक पुरानी तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि RSS का एक जमीनी कार्यकर्ता मेहनत करते-करते मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री बना। बाद में दिग्विजय सिंह ने सफाई दी कि वे RSS की विचारधारा के विरोधी हैं और उनके बयान को गलत संदर्भ में पेश किया गया। लेकिन यहां भी सवाल उठता है, अगर बयान गलत तरीके से पेश हुआ, तो कांग्रेस के भीतर इसे स्पष्ट करने में इतनी देर क्यों लगी? और क्या बार-बार “गलत समझा गया” कहना अब एक राजनीतिक रणनीति बन चुका है?
कांग्रेस के भीतर ही मतभेद, लेकिन सार्वजनिक चुप्पी क्यों?
इस विवाद ने कांग्रेस के अंदरूनी मतभेदों को भी उजागर कर दिया है। कुछ नेता मानते हैं कि ऐसे बयान पार्टी को नुकसान पहुंचाते हैं, जबकि कुछ इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बता रहे हैं। लेकिन जनता यह पूछ रही है क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब किसी संगठन को आतंकी कह देना भी है? और अगर ऐसा है, तो पार्टी की आधिकारिक लाइन क्या है? दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस ने अब तक मणिक्कम टैगोर के बयान पर कोई औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की। क्या यह मौन सहमति है या रणनीतिक चुप्पी?
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पहले भी हो चुकी हैं ऐसी तुलना, सबक क्यों नहीं लिया गया?
यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र सिद्धारमैया ने RSS की तुलना तालिबान से की थी। उस समय भी बयान पर भारी विवाद हुआ और कानूनी हस्तक्षेप के बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। तो सवाल साफ है जब पहले ऐसे बयानों का राजनीतिक और कानूनी नुकसान हो चुका है, तब कांग्रेस बार-बार वही गलती क्यों दोहरा रही है?
चुनावी माहौल और शब्दों की कीमत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव नजदीक आते ही बयान और ज्यादा तीखे हो जाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि ऐसे बयान समर्थकों को भले ही जोश दें, लेकिन मध्यम वर्ग और तटस्थ मतदाताओं को असहज भी कर सकते हैं। आज की राजनीति सिर्फ सोशल मीडिया ट्रेंड से नहीं चलती, बल्कि विश्वसनीयता से चलती है। और जब किसी पार्टी के नेता बार-बार अतिवादी तुलना करते हैं, तो सवाल पार्टी की परिपक्वता पर भी उठते हैं।
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सवाल कांग्रेस से, जवाब किसके पास? इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राजनीति में शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते वे संदेश, इरादा और दिशा तय करते हैं। कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या वह इन बयानों से खुद को अलग करेगी या फिर इन्हें राजनीतिक हथियार मानकर आगे बढ़ेगी? और सबसे अहम सवाल क्या वैचारिक लड़ाई जीतने के लिए लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखना सही रणनीति है? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में कांग्रेस की सियासी दिशा तय करेंगे।
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