Bangladesh Women Against Extremism Politics: बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। लंबे समय तक कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने वाली शेख हसीना** के बाद अब राजनीतिक मंच पर चार महिला चेहरे तेजी से उभर रहे हैं, जो सीधे तौर पर कट्टरपंथी राजनीति को चुनौती दे रहे हैं। आने वाले चुनावों में इन महिलाओं की सक्रियता ने यह संकेत दे दिया है कि बांग्लादेश की सियासत सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विचारधारात्मक टकराव का मैदान बनेगी।
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शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद यह माना जा रहा था कि कट्टरपंथी दलों को खुला मैदान मिल जाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग दिख रही है। बांग्लादेश में चार महिला नेताओं ने न सिर्फ मोर्चा खोला है, बल्कि चुनावी रणनीति, उम्मीदवार चयन और वैचारिक बहस के स्तर पर भी कट्टरपंथियों की घेराबंदी शुरू कर दी है।
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सबसे पहला नाम जुबैदा रहमान का है। वे बीएनपी के कार्यवाहक नेता तारिक रहमान की पत्नी हैं और पर्दे के पीछे रहकर पार्टी की रणनीति को नया आकार दे रही हैं। टिकट वितरण से लेकर कैंपेन डिजाइन तक, जुबैदा की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है। उनकी पहल पर Bangladesh Nationalist Party ने इस बार 10 महिला उम्मीदवार मैदान में उतारी हैं, जिसे सीधे तौर पर कट्टरपंथी राजनीति के खिलाफ सॉफ्ट लेकिन असरदार संदेश माना जा रहा है।
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दूसरा बड़ा चेहरा तस्नीम जारा का है, जिन्हें एनसीपी की फायरब्रांड नेता कहा जाता है। जब एनसीपी और Jamaat-e-Islami के गठबंधन की घोषणा हुई, तो तस्नीम ने खुलकर बगावत कर दी। उन्होंने साफ कहा कि कट्टरपंथ के साथ कोई समझौता नहीं होगा। चर्चा है कि वे ढाका की हाई-प्रोफाइल सीट से जमात के अमीर के खिलाफ चुनावी मैदान में उतर सकती हैं, जिससे मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है।
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तीसरा नाम ताजनुभा जबीन का है, जो तस्नीम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। एनसीपी की इस नेता ने शेख हसीना के तख्तापलट के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। ताजनुभा का फोकस शहरी युवा और प्रगतिशील मतदाताओं पर है। माना जा रहा है कि वे ढाका की किसी चर्चित सीट से चुनाव लड़कर कट्टरपंथी वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश करेंगी।
चौथा और सबसे रहस्यमयी नाम जाइमा रहमान का है। तारिक रहमान की बेटी जाइमा को “मिस्ट्री गर्ल” कहा जाता है। लंदन से लॉ की पढ़ाई कर चुकी जाइमा भले ही सीधे चुनाव न लड़ें, लेकिन कैंपेनिंग की कमान उनके हाथ में है। सोशल मीडिया के जरिए वे युवा मतदाताओं, खासकर पहली बार वोट करने वालों को साधने में जुटी हैं।
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कुल मिलाकर, बांग्लादेश का यह चुनाव सिर्फ पार्टियों की लड़ाई नहीं रह गया है। यह कट्टरपंथ बनाम लोकतांत्रिक और प्रगतिशील राजनीति की जंग बनता दिख रहा है। शेख हसीना जो भूमिका पहले निभाती थीं, अब वही जिम्मेदारी इन चार महिलाओं के कंधों पर दिखाई दे रही है। अगर इनका प्रभाव जमीनी स्तर तक पहुंचता है, तो कट्टरपंथियों की सियासत के लिए यह चुनाव वाकई निर्णायक साबित हो सकता है।
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