Kumar Vishwas Rajnath Singh Lok Sabha story: भारतीय राजनीति में कुछ किस्से ऐसे होते हैं जो समय के साथ सिर्फ बयान नहीं रहते, बल्कि व्यवस्था, सत्ता और व्यवहार की असल तस्वीर दिखा देते हैं। ऐसा ही एक किस्सा हाल ही में मशहूर कवि और वक्ता Kumar Vishwas ने साझा किया, जिसमें उन्होंने लोकसभा के भीतर का एक पुराना लेकिन बेहद अर्थपूर्ण दृश्य याद किया। यह किस्सा उस समय का है जब संसद के भीतर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहस चल रही थी और अचानक एक टिप्पणी ने पूरे माहौल को गरमा दिया।
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कुमार विश्वास के मुताबिक, बहस के दौरान जब एक सांसद ने सत्ता पक्ष की ओर से टिप्पणी करते हुए कहा बैठ जाओ तो यह सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा पर सवाल खड़े करने वाला लहजा था। इसी पल पर तत्कालीन वरिष्ठ नेता Rajnath Singh का गुस्सा फूट पड़ा। कुमार विश्वास बताते हैं कि राजनाथ सिंह ने उस क्षण जिस दृढ़ता और आत्मसम्मान के साथ प्रतिक्रिया दी, उसने पूरे सदन को एक स्पष्ट संदेश दिया—संसद में किसी का अपमान स्वीकार्य नहीं है।
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यह घटना केवल व्यक्तिगत टकराव की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस संस्कार की याद दिलाती है, जहां विचारों की टकराहट हो सकती है, लेकिन गरिमा नहीं टूटनी चाहिए। कुमार विश्वास ने इस किस्से को सुनाते हुए कहा कि संसद केवल बहस का मंच नहीं, बल्कि अनुशासन, मर्यादा और परंपरा का प्रतीक भी है। जब कोई “बैठ जाओ” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो वह न सिर्फ सामने बैठे व्यक्ति को, बल्कि पूरी संसदीय परंपरा को छोटा करता है।
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राजनाथ सिंह की प्रतिक्रिया को कुमार विश्वास ने एक अनुभवी नेता की परिपक्वता बताया। उनका कहना था कि सत्ता में रहने के बावजूद अगर कोई नेता अपमान के खिलाफ खड़ा होता है, तो वह लोकतंत्र को मजबूत करता है। यह गुस्सा आक्रामक नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान से उपजा हुआ था एक ऐसा संदेश कि संसद में हर सदस्य बराबर है, चाहे वह सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का।
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कुमार विश्वास का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब संसद की कार्यवाही अक्सर हंगामे, नारेबाजी और आरोप-प्रत्यारोप की वजह से सुर्खियों में रहती है। ऐसे में यह किस्सा राजनीति की उस पुरानी स्कूल सोच की याद दिलाता है, जहां शब्दों का वजन समझा जाता था और मर्यादा को प्राथमिकता दी जाती थी। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर भी यह बयान तेजी से वायरल हुआ और लोगों ने इसे आज की राजनीति के लिए एक सीख बताया।
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विश्लेषकों का मानना है कि कुमार विश्वास द्वारा सुनाया गया यह प्रसंग केवल एक नेता के गुस्से की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताता है कि सत्ता में संयम और विरोध में सम्मान कैसे लोकतंत्र को जीवित रखते हैं। जब वरिष्ठ नेता खुद उदाहरण पेश करते हैं, तो नई पीढ़ी के राजनेताओं के लिए भी एक मानक तय होता है।
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अंततः यह किस्सा हमें याद दिलाता है कि संसद की गरिमा केवल नियमों से नहीं, बल्कि नेताओं के आचरण से बनती है। बैठ जाओ जैसे शब्द क्षणिक हो सकते हैं, लेकिन उनके जवाब में दिया गया आत्मसम्मान-भरा प्रतिरोध लोकतंत्र के इतिहास में लंबे समय तक गूंजता है। यही कारण है कि कुमार विश्वास का यह बयान आज सिर्फ एक स्मृति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शिष्टाचार पर एक जरूरी टिप्पणी बन गया है।
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