UP BJP 2027 Strategy: उत्तर प्रदेश। 80 लोकसभा सीटें, 403 विधानसभा सीटें और देश की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर जाता है। और इसी यूपी में आज सबसे बड़ा सवाल यही है क्या बीजेपी के पास योगी आदित्यनाथ के अलावा कोई चेहरा है? या फिर पार्टी की पूरी चुनावी गाड़ी अब भी एक ही इंजन पर चल रही है?
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योगी आदित्यनाथ… एक ऐसा नाम, जो बीते आठ-नौ साल में सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि बीजेपी के लिए एक ब्रांड बन चुका है। कानून-व्यवस्था, बुलडोज़र एक्शन, हिंदुत्व का मुखर एजेंडा योगी की राजनीति ने यूपी में बीजेपी को एक स्पष्ट पहचान दी। लेकिन राजनीति में स्थायित्व का नियम यही है एक चेहरे पर टिके रहना ताकत भी है और जोखिम भी। यही वजह है कि 2027 को लेकर संघ और बीजेपी के भीतर मंथन तेज है।
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अब सवाल उठता है योगी के अलावा विकल्प कौन? नाम कई घूमते हैं। कोई खुलकर सामने नहीं आता, लेकिन सत्ता के गलियारों में चर्चाएं ज़रूर हैं। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, केंद्रीय मंत्रिमंडल से जुड़े चेहरे सबकी अपनी-अपनी सीमाएं हैं। मौर्य ओबीसी चेहरा हैं, लेकिन ज़मीनी पकड़ और प्रशासनिक स्वीकार्यता पर सवाल उठते हैं। ब्रजेश पाठक शहरी और ब्राह्मण वोट में प्रभाव रखते हैं, पर राज्यव्यापी करिश्मा अभी दूर है। यानी सच यही है कि योगी जैसा सर्वमान्य चेहरा फिलहाल बीजेपी के पास नहीं है।
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और यहीं से एंट्री होती है आरएसएस की। संघ कभी शोर नहीं करता, लेकिन शतरंज की चाल बहुत पहले चल देता है। 2027 के लिए संघ की रणनीति साफ दिख रही है सिर्फ चेहरा नहीं, संतुलन। जातीय, क्षेत्रीय और संगठनात्मक संतुलन। योगी हिंदुत्व और कानून-व्यवस्था का चेहरा हैं, लेकिन संघ जानता है कि यूपी चुनाव केवल भावनाओं से नहीं, अंकगणित से जीता जाता है। अब ज़रा जातीय समीकरण पर आइए। यूपी में ओबीसी लगभग 40 प्रतिशत, दलित करीब 21 प्रतिशत और सवर्ण करीब 20 प्रतिशत के आसपास हैं। बीजेपी अब तक गैर-यादव ओबीसी + गैर-जाटव दलित + सवर्ण समीकरण पर जीतती रही है। लेकिन सवाल यह है क्या यह समीकरण 2027 में भी उतना ही मज़बूत रहेगा?
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ओबीसी के भीतर ही सबसे दिलचस्प कहानी है लोध समाज की। कभी कल्याण सिंह बीजेपी की रीढ़ थे। आज लोध वोट बिखरा हुआ है। और यहीं से बीजेपी की एक बड़ी चाल सामने आती है यूपी बीजेपी अध्यक्ष को लेकर। बीएल वर्मा। नाम चला, चर्चा हुई। लोध चेहरा, केंद्र में मंत्री, सामाजिक आधार भी है। लेकिन बीजेपी ने आख़िरकार दांव खेला पंकज चौधरी पर। सवाल उठता है क्यों? क्या बीजेपी को लोध वोट से डर है या भरोसा नहीं?
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असल में पंकज चौधरी सिर्फ एक नाम नहीं, एक संदेश हैं। पूर्वांचल, गैर-यादव ओबीसी और संगठनात्मक अनुशासन तीनों का मेल। बीजेपी जानती है कि लोध समाज महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेला लोध चेहरा पार्टी को 2027 नहीं जिता सकता। संघ और संगठन का आकलन है कि अगर अध्यक्ष पद पर लोध चेहरा बैठा दिया गया, तो दूसरी ओबीसी जातियों में असंतुलन पैदा हो सकता है। यानी बीजेपी ने एक तरह से संदेश दिया हम जातियों को खुश नहीं करेंगे, उन्हें मैनेज करेंगे। अब विपक्ष पर नज़र डालिए। समाजवादी पार्टी जातीय जनगणना का ढोल पीट रही है। अखिलेश यादव को लग रहा है कि पिछड़ा बनाम अगड़ा की लाइन खींचकर वो 2027 का रास्ता बना लेंगे। लेकिन सवाल ये है क्या अखिलेश का पीडीए फॉर्मूला ज़मीन पर उतना असरदार है, जितना टीवी डिबेट में दिखता है?
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बीते चुनावों ने एक बात साफ कर दी यादव और मुस्लिम वोट सपा के साथ हैं, लेकिन बाकी ओबीसी पूरी तरह से शिफ्ट नहीं हुए। बीजेपी ने लाभार्थी राजनीति से, फ्री राशन और योजनाओं से उस गैप को भर दिया है। अखिलेश जातीय समीकरण की बात करते हैं, लेकिन बीजेपी सीधे पेट और सुरक्षा पर बात करती है। और कांग्रेस? यूपी में कांग्रेस अब भी प्रयोगशाला में है यहां चेहरा टेस्ट हो रहा है, वहां गठबंधन का फार्मूला। जमीन पर संगठन न के बराबर, लेकिन बयान ऐसे जैसे सत्ता बस आने ही वाली हो। अब फिर लौटते हैं बीजेपी की 2027 रणनीति पर। संघ का फोकस साफ है योगी को कमजोर नहीं करना, लेकिन पूरी पार्टी को योगी पर भी निर्भर न रहने देना। यही वजह है कि संगठनात्मक बदलाव, जिला स्तर पर कैडर एक्टिवेशन और जातीय संतुलन पर काम तेज़ है।
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योगी रहेंगे या नहीं यह सवाल बाहर जितना बड़ा है, अंदर उतना नहीं। अंदर की सोच यह है कि योगी चुनाव का चेहरा हैं, लेकिन चुनाव जीतने की मशीन संगठन है। और संघ उसी मशीन को तेल दे रहा है। लोध समाज बीजेपी का खेल बिगाड़ सकता है? जवाब सीधा है अगर अनदेखी हुई, तो हां, नुकसान हो सकता है। लेकिन बीजेपी इस जोखिम को पहचानती है। इसलिए अध्यक्ष पद भले न मिला हो, लेकिन सत्ता और संगठन में लोध समाज की हिस्सेदारी को पूरी तरह काटा नहीं गया है।
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तो कुल मिलाकर तस्वीर साफ है। योगी आज भी यूपी बीजेपी का सबसे मजबूत चेहरा हैं। उनके अलावा विकल्पों पर सोच चल रही है, लेकिन फैसला नहीं। आरएसएस 2027 को सिर्फ चुनाव नहीं, प्रयोग मानकर चल रहा है कैसे जाति, विचारधारा और संगठन को एक धागे में पिरोया जाए। और विपक्ष? वो अब भी इसी भ्रम में है कि बीजेपी अंदर से बिखर रही है। हकीकत यह है कि बीजेपी अंदर से नहीं, अंदर ही अंदर री-सेट हो रही है। यूपी की राजनीति में शोर बहुत है, लेकिन असली चालें खामोशी से चली जाती हैं। और 2027 की बिसात… अभी पूरी तरह बिछी भी नहीं है।
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