Ankita Murder Case Viral Video Political Conspiracy: उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और ऑडियो क्लिप्स ने न सिर्फ जनभावनाओं को झकझोरा है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। इन वायरल सामग्रियों को लेकर सुबोध उनियाल ने गंभीर चिंता जताते हुए इसे सुनियोजित साजिश करार देने की आशंका व्यक्त की है। उनका कहना है कि ऐसे विरोधाभासी दावे दोषियों को कानूनी लाभ पहुंचाने और जमानत का रास्ता खोलने की कोशिश हो सकते हैं।
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सोशल मीडिया पर फैल रही सामग्री पर सरकार सतर्क
कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने पत्रकारों से बातचीत में साफ कहा कि अंकिता हत्याकांड से जुड़े कुछ वीडियो और ऑडियो क्लिप्स जानबूझकर इंटरनेट मीडिया पर फैलाए जा रहे हैं। इनमें मृत्यु के कारणों को लेकर अलग-अलग और परस्पर विरोधी बयान सामने आ रहे हैं। मंत्री के अनुसार, यह मामला अत्यंत संवेदनशील है और ऐसी सामग्री यदि अदालत के संज्ञान में आती है, तो इससे पहले ही सजा पा चुके दोषियों को राहत मिल सकती है। यही वजह है कि सरकार इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नजर बनाए हुए है।
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दोहरी बयानबाजी से अपराधियों को फायदा
सुबोध उनियाल ने स्पष्ट किया कि इस केस में दोषियों को हत्या का दोषी ठहराया जा चुका है और मामला अपील की प्रक्रिया में है। ऐसे समय में सोशल मीडिया पर यह कहना कि मृत्यु आत्महत्या थी या हत्या और दोनों तरह के तर्क पेश करना कानूनी तौर पर बेहद खतरनाक हो सकता है। अदालत में यदि मृत्यु के कारणों को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा होती है, तो इसका सीधा फायदा अपराधियों को मिल सकता है। मंत्री ने आशंका जताई कि यह सब किसी रणनीति के तहत किया जा रहा हो सकता है।
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रिकॉर्डिंग की विश्वसनीयता पर सवाल
वायरल वीडियो-ऑडियो की प्रामाणिकता पर भी मंत्री ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इन क्लिप्स में न तो रिकॉर्डिंग की स्पष्ट तिथि है और न ही समय का कोई ठोस प्रमाण। बिना समय और संदर्भ के ऐसी रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक करना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास माना जा सकता है। खासतौर पर तब, जब उनमें अंकिता की मौत को आत्महत्या बताने की कोशिश की जा रही हो।
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बिना सबूत नाम उछालने पर आपत्ति
मंत्री ने यह भी कहा कि वायरल सामग्री में कुछ व्यक्तियों के नाम बार-बार लिए जा रहे हैं, जबकि उनके खिलाफ कोई ठोस और विश्वसनीय सबूत सामने नहीं रखा गया है। इस तरह नाम उछालना न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि इससे संबंधित लोगों की सामाजिक छवि को भी नुकसान पहुंच सकता है। कानून के दायरे में ऐसी प्रवृत्तियां स्वीकार्य नहीं हैं और इससे न्याय की प्रक्रिया कमजोर होती है।
सरकार का स्पष्ट रुख
सुबोध उनियाल ने दो टूक कहा कि सरकार इस मामले में किसी भी तरह की जल्दबाजी या भावनात्मक दबाव में निर्णय नहीं लेगी। अंकिता हत्याकांड ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर कर रख दिया था और जनता आज भी न्याय की उम्मीद लगाए बैठी है। सरकार का मानना है कि बिना ठोस साक्ष्य के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना अनुचित है। यदि किसी के पास कोई विश्वसनीय प्रमाण है, तो उसे विधिक प्रक्रिया के तहत जांच एजेंसियों और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
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न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करने का खतरा
मंत्री ने चेतावनी दी कि सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे अपुष्ट दावे और भावनात्मक बयान अंततः अपराधियों के पक्ष में जा सकते हैं। इससे न केवल पीड़िता को न्याय दिलाने की लड़ाई कमजोर होगी, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों में कानून के प्रति जनता का भरोसा भी डगमगा सकता है। सरकार किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहती कि भ्रामक सूचनाओं के कारण दोषियों को राहत मिले।
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जनता से संयम की अपील
अपने बयान के अंत में सुबोध उनियाल ने आम जनता और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं से अपील की कि वे अफवाहों से बचें और बिना पुष्टि की गई जानकारी साझा न करें। केवल आधिकारिक और कानूनी स्रोतों पर भरोसा करने की जरूरत है। उनका कहना है कि अंकिता भंडारी को सच्चा न्याय तभी मिलेगा, जब मामला तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर आगे बढ़ेगा, न कि वायरल क्लिप्स और अटकलों के सहारे। अंकिता हत्याकांड को लेकर फिर उठे सवालों के बीच सरकार का यह बयान साफ संकेत देता है कि वह किसी भी तरह की साजिश या भ्रामक प्रयास को हल्के में नहीं ले रही। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि वायरल सामग्री की कानूनी जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और न्यायिक प्रक्रिया को कितनी मजबूती मिलती है।
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