Paush Purnima Magh Mela Prayagraj: तीर्थराज प्रयागराज एक बार फिर सनातन परंपरा, श्रद्धा और भक्ति के विराट संगम का साक्षी बना। माघ मेले के शुभारंभ के साथ ही प्रथम स्नान पर्व पौष पूर्णिमा के अवसर पर पवित्र त्रिवेणी संगम में आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा, जिसने पूरे संगम क्षेत्र को भक्ति-भाव से सराबोर कर दिया। तड़के भोर से ही श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया और सूर्य उदय के साथ ही संगम तट हर-हर गंगे और जय मां गंगा के जयघोष से गूंज उठा।
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पौष पूर्णिमा का स्नान हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान करने से जीवन के पाप कटते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसी आस्था के चलते उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचे। संगम तट पर हर आयु वर्ग के लोग बुजुर्ग, महिलाएं, युवा और बच्चे श्रद्धा के साथ पवित्र जल में डुबकी लगाते नजर आए।

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इस अवसर पर माघ मेले का विधिवत शुभारंभ भी हुआ। मेले में पहुंचे पूज्य साधु-संतों, धर्माचार्यों, सभी अखाड़ों और कल्पवासियों का भव्य स्वागत किया गया। अखाड़ों के संतों की उपस्थिति ने मेले की आध्यात्मिक गरिमा को और ऊंचा कर दिया। कल्पवासी अपने तंबुओं में वैदिक मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और ध्यान-साधना में लीन दिखाई दिए। माघ मेला केवल स्नान का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और साधना का भी प्रतीक है।
श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए। संगम क्षेत्र में स्वच्छता, पेयजल, चिकित्सा, प्रकाश व्यवस्था और यातायात प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया। सुरक्षा के पुख्ता प्रबंधों के बीच स्नान पर्व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। जगह-जगह स्वयंसेवक और प्रशासनिक कर्मी श्रद्धालुओं की सहायता करते दिखे। घाटों की नियमित सफाई और मार्गों की सुचारु व्यवस्था ने श्रद्धालुओं को सहज अनुभव प्रदान किया।
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पौष पूर्णिमा के स्नान के साथ ही माघ मेले की आध्यात्मिक गतिविधियां और तेज हो गईं। दिनभर प्रवचन, सत्संग, हवन-यज्ञ और भजन-कीर्तन का आयोजन चलता रहा। शाम होते-होते संगम तट पर दीपों की जगमगाहट ने अद्भुत दृश्य रचा। गंगा आरती के समय वातावरण श्रद्धा और शांति से भर उठा। श्रद्धालुओं ने मां गंगा, मां यमुना और मां सरस्वती से सुख-समृद्धि, शांति और कल्याण की कामना की।
माघ मेला भारतीय संस्कृति की जीवंत परंपरा है, जहां आस्था के साथ-साथ सामाजिक समरसता भी देखने को मिलती है। यहां विभिन्न क्षेत्रों और पृष्ठभूमि से आए लोग एक ही धारा में स्नान कर समानता और एकता का संदेश देते हैं। यह मेला सदियों से भारतीय जनजीवन को जोड़ता आ रहा है और आज भी इसकी प्रासंगिकता उतनी ही गहरी है।
इस पावन अवसर पर प्रदेशवासियों और सभी श्रद्धालुओं को माघ मेले के शुभारंभ एवं पौष पूर्णिमा की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी गईं। तीर्थराज प्रयाग पधारे सभी साधु-संतों, अखाड़ों और कल्पवासियों का अभिनंदन करते हुए यही प्रार्थना की गई कि मां गंगा, मां यमुना और मां सरस्वती सभी के मनोरथ पूर्ण करें और देश-प्रदेश में सुख, शांति और समृद्धि का संचार हो।
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पौष पूर्णिमा के इस दिव्य स्नान पर्व ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि प्रयागराज केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है जहां आस्था, संस्कृति और परंपरा त्रिवेणी की तरह एक होकर बहती हैं।
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