Dehradun Rishikesh Antim Sanskar Razai Gadda Case: उत्तराखंड के देहरादून के रानी पोखरी इलाके से एक ऐसा शॉकिंग केस सामने आया है, जिसने सिर्फ कानून व्यवस्था पर ही नहीं बल्कि लोगों की आस्था और संवेदना पर भी गहरा प्रहार किया है। ये वो कहानी है जहां मौत के बाद भी लालच ज़िंदा निकला और श्रद्धा को बाज़ार बना दिया गया।
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अंतिम संस्कार के बाद का काला सच
पुलिस के मुताबिक, जब किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार होता था और उसके परिजन ऋषिकेश के पूर्णानंद घाट के पास पीपल के पेड़ के नीचे रजाई, गद्दा और बिस्तर छोड़ कर चले जाते थे, तो यहीं से इस घिनोनी कहानी की शुरुआत होती थी। परंपरा के अनुसार, अंतिम क्रिया के बाद कुछ चीजों को छोड़ देना एक संवेदनशील और धार्मिक विश्वास से जुड़ा होता है। लेकिन कुछ लोगों ने इसी विश्वास को कमाई का ज़रिया बना लिया।
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पीपल के नीचे से दुकान तक का सफर
आरोप है कि तीन लोग रोज़ाना या मौके देखकर यहाँ छोड़ गए रजाई-गद्दे उठाते थे। पहले उन्हें साफ किया जाता है, फिर देहरादून और आस-पास के इलाकों की कुछ दुकानों तक पहुँचाया जाता है। यहीं से इन चीज़ों को दुबारा बेचा जाता है, बिना इस बात की परवाह किए कि ये चीज़ें किसी की आखिरी यात्रा से जुड़ी हुई हैं। सोचिए, जिन रजाईयों पर किसी परिवार ने आखिरी बार अपने-अपने को रखा हो, जिन गद्दों पर आखिरी संस्कार से पहले के पल गुज़रे हों, वही चीज़ें पैसों के लिए बाज़ार में सजा दी जा रही थीं।
लोकल लोगों का शक और पुलिस एक्शन
लोकल रहने वालों को जब लगातार ये चीज़ें गायब होती दिखीं, तो शक गहरा गया। कुछ लोगों ने चुपचाप नज़र रखनी शुरू की और जब सच सामने आया, तो सीधी पुलिस को शिकायत दी गई। शिकायत मिलते ही पुलिस ने तुरंत एक्शन लिया और तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का कहना है कि ये लोग काफी समय से इस काम में लगे हुए थे और इन्होंने धार्मिक आस्था का खुले आम अपमान किया है।
सिर्फ जुर्म नहीं, आस्था पर चोट
यह मामला सिर्फ चोरी या गैर-कानूनी बिक्री का नहीं है। यहां बात लोगों की उन भावनाओं की है जो मौत के बाद भी अपनों के लिए सम्मान और शांति चाहते हैं। अंतिम संस्कार के बाद छोड़ी गई चीजें किसी भी सामान की तरह नहीं होतीं, बाल्की उनसे जुड़ा होता है दुख, यादें और श्रद्धा। इसी वजह से इस केस में धार्मिक भावनाओं को आहत पहुंचाने की बात भी सामने आई है। कई लोगों का कहना है कि ऐसे लोग सिर्फ कानून के नहीं, समाज के भी दोषी हैं।
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बाजार में बिकती श्रद्धा?
इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है क्या सब कुछ बिक सकता है? क्या पैसे के लिए इतनी नीचे गिरा जा सकता है कि मौत से जुड़ी चीज़ों को भी प्रॉफिट आइटम बना दिया जाए? आज अगर रजाई-गद्दे बाइक, तो कल और क्या? लोकल लोग इस बात से भी गुस्से में हैं कि दुकान वालों ने बिना पूछे, बिना जाने, इन चीज़ों को खरीदा। क्या उन्हें शक नहीं हुआ? या फिर सस्ते दाम के लालच ने सब कुछ अनदेखा कर दिया?
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पुलिस की वॉर्निंग और उम्र की जांच
पुलिस ने कहा है कि इस मामले की गहराई से जांच की जा रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि कौन-कौन सी दुकान तक ये चीज़ें पहुंचती हैं और क्या इस नेटवर्क में और लोग शामिल हैं। साथ ही, पुलिस ने लोगों से अपील की है कि ऐसी धार्मिक जगहों के आस-पास अगर कोई भी संदिग्ध एक्टिविटी दिखे, तो तुरंत सूचना दें।
समाज के लिए एक सख्त सबक
यह घटना हमें सिर्फ गुस्सा नहीं दिलाती, बाल्की हमें सोचने पर मजबूर करती है। समाज को तय करना होगा कि आस्था और परंपराओं का सम्मान कैसे किया जाए। अंतिम संस्कार जैसे पवित्र क्रिया के बाद जो चीजें छोड़ी जाती हैं, उनकी सुरक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है। देहरादून से सामने आया ये केस एक वॉर्निंग है अगर हम चुप रहें, तो लालच और भी पवित्र चीज़ों को निगल लेगा। आज ज़रूरत है सख़्त कानून, जागरूक लोग और एक ऐसे समाज की, जो श्रद्धा को बाज़ार न बनने दे।
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