Meerut Kapsad Murder Case: मेरठ के कपसाड़ गांव में हुए दिल दहला देने वाले अपहरण–हत्याकांड का सच आखिरकार एक छोटी-सी फोन कॉल से सामने आ गया। आरोपी पारस सोम, जो खुद को बेहद चालाक समझ रहा था, जैसे ही दोस्त से बोला मैं बाहर निकल रहा हूं उसी पल उसकी लोकेशन ट्रेस हो गई। हरिद्वार पुलिस के सहयोग से रुड़की रेलवे स्टेशन पर दबिश पड़ी और फरारी की पूरी स्क्रिप्ट वहीं खत्म हो गई। देर रात आरोपी को मेरठ लाया गया और गांव से लेकर प्रशासन तक, हर जगह हलचल मच गई।
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बेटी के प्यार में मां की हत्या क्यों और कैसे?
यह मामला सिर्फ अपहरण का नहीं, बल्कि एक मां की नृशंस हत्या का है। सुनीता जो अपनी बेटी रूबी की सुरक्षा के लिए सामने खड़ी हुई उसी विरोध की कीमत अपनी जान देकर चुकाती है। पुलिस जांच के मुताबिक, रूबी को रजवाहे के पास से अगवा करने के बाद पारस सोम उसे पहले खतौली ले गया। शाम होते होते जब सुनीता की मौत की खबर गांव में फैल गई, तो दोनों दिल्ली की ओर भागे और एक होटल में रात गुजारी। यहां सवाल उठता है क्या यह सब अचानक हुआ या महीनों की प्लानिंग थी? पुलिस सूत्रों का कहना है कि पारस पिछले दो महीनों से इस फरारी और साथ भागने की योजना पर काम कर रहा था।
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दिल्ली से गुरुग्राम, सहारनपुर से हरिद्वार फरारी का पूरा रूट
दिल्ली में रात बिताने के बाद पारस और रूबी गुरुग्राम पहुंचे, जहां वह अपने एक दोस्त के यहां रुका। इस दौरान वह लगातार मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए कपसाड़ गांव के हालात पर नजर बनाए हुए था। जैसे-जैसे गांव का माहौल गर्म होता गया और सियासी बयानबाज़ी तेज़ हुई, पारस को लगा कि गुरुग्राम में रुकना भी सुरक्षित नहीं है। डर के साए में उसने ट्रेन पकड़ी और सहारनपुर पहुंचा। यहां टपरी गांव में उसकी बहन रहती है, जहां शुक्रवार की रात दोनों ने शरण ली। लेकिन बेचैनी कम नहीं हुई। अगले दिन पारस ने हरिद्वार जाने का प्लान बनाया और ट्रेन में बैठ गया। इसी दौरान उसने झोलाछाप राजेंद्र को फोन कर परिवार और गांव के हालात की जानकारी ली और यही कॉल उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
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आपराधिक इतिहास और खतरनाक मानसिकता
जांच में यह भी सामने आया है कि पारस सोम का आपराधिक इतिहास रहा है। दो साल पहले उसने अपने ही पिता पर चाकू से हमला किया था। यानी हिंसा उसके लिए कोई नई बात नहीं थी। पुलिस को शक है कि सुनीता की हत्या भी अचानक नहीं, बल्कि विरोध हटाने की नीयत से की गई। हालांकि आरोपी दावा कर रहा है कि हाथापाई में यह सब हुआ, लेकिन पुलिस इस बयान को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर रही।
प्रेम-प्रसंग का दावा या साजिश?
पुलिस कस्टडी में पारस ने कहा कि उसका और रूबी का तीन साल पुराना प्रेम-प्रसंग था। दोनों इंटर कॉलेज में पढ़ते थे, वहीं से नजदीकियां बढ़ीं। जब परिवार ने रूबी की शादी तय की, तो दोनों परेशान हो गए और साथ भागने का फैसला कर लिया। पारस का कहना है कि रूबी पूरी तरह राज़ी थी और यह प्लान पहले से बना हुआ था। लेकिन पुलिस की नजर में कहानी इतनी सीधी नहीं है। सवाल यह भी है कि अगर दोनों की सहमति थी, तो मां को रास्ते से हटाने के लिए फरसा क्यों उठाया गया? क्या यह गुस्से का पल था या पहले से तय हिंसा?
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रूबी का बयान सबसे अहम कड़ी
फिलहाल रूबी को आशा ज्योति केंद्र में महिला पुलिस की निगरानी में रखा गया है। उसका बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किया जाएगा और उसी के आधार पर आगे की कानूनी धाराएं तय होंगी। यह बयान तय करेगा कि मामला केवल अपहरण हत्या तक सीमित रहेगा या इसमें साजिश और गंभीर धाराएं भी जुड़ेंगी। वहीं पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल फरसा बरामद कर लिया है और पारस के साथ सुनील सोम को भी आरोपी बनाते हुए कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया है।
गांव से सिस्टम तक हर कोई हिल गया
कपसाड़ गांव, जो अब तक अपनी शांति के लिए जाना जाता था, अचानक सियासी अखाड़ा बन गया। जातीय बयान, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और प्रशासन पर दबाव सब कुछ एक साथ सामने आया। पुलिस और प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठे, लेकिन एक फोन कॉल ने दिखा दिया कि टेक्निकल सर्विलांस के आगे फरारी ज्यादा देर टिक नहीं सकती।
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बड़ा सवाल प्यार, हिंसा और जिम्मेदारी
यह केस एक बार फिर समाज के सामने बड़ा सवाल रखता है क्या प्यार के नाम पर हिंसा को सही ठहराया जा सकता है? क्या किसी की सहमति का दावा एक मां की हत्या को कम गंभीर बना देता है? और क्या समय रहते संवाद होता, तो यह खून-खराबा रोका जा सकता था? आज पारस सलाखों के पीछे है, रूबी सरकारी संरक्षण में है और एक परिवार हमेशा के लिए उजड़ चुका है। कानून अपना काम करेगा, लेकिन यह घटना समाज को आईना दिखाती है जहां रिश्तों की नाकामी, गुस्सा और अपराध मिलकर एक मां की जिंदगी छीन लेते हैं।
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