Hindu Unity Message by Mohan Bhagwat: : वृन्दावन से उठा हिंदू एकता का महासंदेश, मोहन भागवत का राष्ट्र निर्माण पर बड़ा आह्वान धर्मनगरी वृंदावन से हिंदू धर्म को लेकर एक ऐसी आवाज उठी है, जो सिर्फ़ एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय की सामाजिक और राष्ट्रीय दिशा को रेखांकित करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने वृंदावन की पावन धरती पर आयोजित सुदामा कुटी शताब्दी महोत्सव के शुभारंभ के अवसर पर हिंदू एकता, राष्ट्र निर्माण और भारत के भविष्य के बारे में बहुत ही स्पष्ट और गूढ़ संदेश दिया। यह कार्यक्रम सिर्फ़ एक उत्सव नहीं, बल्कि विचारों, संस्कारों और संकल्पों का संगम बनकर उभरा।

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सुदामा कुटी से उठा एक बड़ा विचार
सुदामा कुटी शताब्दी महोत्सव का उद्घाटन वैदिक मंत्रोच्चार और दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है। उनका यह कथन सिर्फ़ धार्मिक पहचान की बात नहीं करता, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति और जीवन शैली की एक व्यापक परिभाषा प्रस्तुत करता है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बाहरी नज़रिया हमें जातियों, वर्गों और बंटवारे में बंटा हुआ दिखाता है, लेकिन भारत की आत्मा एक है।
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भागवत ने कहा कि हिंदू समाज को अपने मतभेदों से ऊपर उठकर एक होना होगा। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि जाति, पंथ और भाषा के नाम पर बंटवारा भारतीय समाज की कमज़ोरी नहीं, बल्कि हमारी ताकत को कमज़ोर करने की कोशिश है। अगर हम इस जाल में फंस गए, तो देश की एनर्जी खत्म हो जाएगी।
हिंदू एकता ही राष्ट्रनिर्माण का मूल है
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने हिंदू एकता को आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत बताया। उन्होंने कहा कि अगर हिंदू समाज संगठित हो गया, तो अगले 20 से 30 सालों में भारत को विश्व गुरु बनने से कोई ताकत नहीं रोक सकती। उनका यह बयान सिर्फ़ भावुकता भरा नहीं है, बल्कि एक लंबे समय का राष्ट्रीय नज़रिया सामने रखता है। भागवत ने यह भी साफ़ किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्य मकसद देश सेवा है। संघ का काम सत्ता, पद या पब्लिसिटी के लिए नहीं, बल्कि समाज को जगाना है। उन्होंने कहा कि संघ लगातार “कुमतुब प्रबोधन” के ज़रिए समाज को जोड़ने का काम कर रहा है ताकि हर व्यक्ति देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझ सके।
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पूर्वजों का बलिदान और सनातन की गूंज
अपने भाषण में संघ प्रमुख ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अनगिनत बलिदान दिए हैं। उन्हीं बलिदानों की वजह से सनातन धर्म आज ज़िंदा है और इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई देती है। उन्होंने कहा कि आज दुनिया भर में लोग भारतीय दर्शन, योग, अध्यात्म और जीवन मूल्यों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
भागवत ने कहा कि सनातन सिर्फ़ पूजा का तरीका नहीं, बल्कि जीने का एक तरीका है। यही वजह है कि भारत की सभ्यता हज़ारों सालों के हमलों और चुनौतियों के बावजूद बची रही। उन्होंने यह भी कहा कि आज उस आत्मविश्वास को फिर से जगाने की ज़रूरत है जो हमारे समाज की पहचान है।
शक्ति जागरण और भक्ति का संतुलन
मोहन भागवत ने अपने भाषण में शक्ति और भक्ति के संतुलन पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि शक्ति जागरण का काम हम सबकी ज़िम्मेदारी है, जबकि भक्ति का काम संत समाज के ज़रिए होता है। इसी बैलेंस की वजह से संघ ऐसे आध्यात्मिक आयोजनों में हिस्सा लेता है। उन्होंने कहा कि जब समाज में शक्ति और भक्ति दोनों साथ-साथ चलते हैं, तो राष्ट्र मज़बूत बनता है। सिर्फ़ आध्यात्मिकता या सिर्फ़ शक्ति, दोनों ही अधूरे हैं। भारत की परंपरा इन दोनों को साथ लेकर चलने की रही है।
संतों का सान्निध्य, परंपरा का सम्मान
इस मौके पर संघ प्रमुख ने सुदामा कुटी महंत सुदीक्षक दास महाराज मणि, ऋषि साध्वी ऋतंभरा, मलूक पीठाधीश्वर राजेंद्र दास महाराज समेत कई संतों की मौजूदगी में दीप जलाया। संतों की मौजूदगी ने आयोजन को आध्यात्मिक ऊंचाई दी और यह संदेश दिया कि राष्ट्र निर्माण में संत समाज की भूमिका हमेशा से अहम रही है।
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संतों और संघ के इस साझा मंच ने यह साफ़ कर दिया कि धर्म और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। जब धर्म जागृत होता है, तो राष्ट्र मज़बूत होता है। वृंदावन में उत्सव का महापर्व कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संत, संघ कार्यकर्ता और भक्त मौजूद थे। पूरे वृंदावन में आध्यात्मिक और उत्सव जैसा माहौल देखा गया। सुदामा कुटी परिसर भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारों से गूंज उठा। भक्तों के चेहरों पर उत्साह और गर्व साफ दिख रहा था। यह आयोजन न केवल शताब्दी समारोह बन गया, बल्कि वैचारिक चेतना का भी उत्सव बन गया। मोहन भागवत का संदेश साफ था कि अगर भारत को विश्व गुरु बनाना है, तो हिंदू समाज को अपनी एकता, संस्कृति और आत्मविश्वास को पहचानना होगा।
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संदेश जो सिर्फ वृंदावन तक सीमित नहीं
वृंदावन से यह संदेश सिर्फ एक शहर या एक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह संदेश पूरे देश के लिए है कि भारत की ताकत उसकी एकता, उसकी प्राचीन परंपरा और उसके सांस्कृतिक मूल्यों में है। मोहन भागवत का यह भाषण आने वाले सालों में सामाजिक और राष्ट्रीय बहस का केंद्र बनने की क्षमता रखता है। आज जब दुनिया अस्थिरता, संघर्ष और पहचान के संकट से जूझ रही है, वृंदावन का यह संदेश भारत को एकता, सद्भाव और देश सेवा की उसकी असली भावना की याद दिलाता है। यही संदेश इस घटना को एक आम घटना से ऐतिहासिक पल बनाता है।
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