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Home - Controversial on Kathavachaks: कथा नहीं चुभी, संस्कृति खटकी, कथावाचकों पर बयान और राजनीति की नंगी भाषा

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Controversial on Kathavachaks: कथा नहीं चुभी, संस्कृति खटकी, कथावाचकों पर बयान और राजनीति की नंगी भाषा

कथावाचकों पर बयान ने राजनीति और संस्कृति की नई बहस छेड़ दी

Last updated: जनवरी 19, 2026 5:11 अपराह्न
Rajive Sharma Published जनवरी 19, 2026
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Political controversy over controversial statement on Kathavachaks in Madhya Pradesh
कथावाचकों पर दिए गए बयान ने राजनीति, आस्था और अभिव्यक्ति की मर्यादा पर बहस छेड़ दी।Edited by Tv Today Bharat Desk
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Highlights
  • आस्था, अभिव्यक्ति और मर्यादा के बीच फंसी सियासी भाषा
  • बयानबाज़ी या बहस कथाओं पर राजनीति की तेज़ धार
  • संस्कृति पर टिप्पणी से गरमाया सियासी माहौल
  • कथावाचकों को लेकर उठे सवाल, लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा
  • अपमान बनाम असहमति: सार्वजनिक भाषा की मर्यादा पर बहस

Controversial statement on Kathavachaks: देश की सार्वजनिक बहसों में कभी-कभी शब्द नहीं, सोच नंगी हो जाती है। और जब सोच नंगी होती है, तब भाषा मर्यादा छोड़कर अपमान की तलाश करने लगती है। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के चंदला से पूर्व विधायक RD Prajapati द्वारा कथावाचकों को लेकर दिया गया बयान जूते की माला पहनाकर नंगा घुमाया जाए सिर्फ एक आपत्तिजनक पंक्ति नहीं है, बल्कि उस राजनीति की पहचान है जिसमें आस्था को गाली और संस्कृति को सियासी औजार बना दिया जाता है। यह वही राजनीति है जो मंच पर माइक मिलते ही खुद को ‘जनता की आवाज़’ बताती है, लेकिन शब्दों में हिंसा और इरादों में विभाजन परोसती है। जब ऐसे बयान सार्वजनिक मंचों से दिए जाते हैं, तब सवाल केवल एक नेता या एक वाक्य का नहीं रहता, सवाल उस मानसिकता का हो जाता है जो संवाद के बजाय अपमान को हथियार मानती है।

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कथावाचक सिर्फ धर्म नहीं, समाज की स्मृति हैं

भारतीय समाज में कथा-परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं रही है। कथा गांव-गली की नैतिक पाठशाला रही है, जहां पीढ़ियों ने जीवन-मूल्य सीखे। राम को राजा से पहले मानव बनाने वाली दृष्टि हो या कृष्ण को भगवान से पहले मित्र के रूप में समझने की संवेदना यह सब कथा ने ही समाज को दिया। कथा ने ही शबरी के बेर में समानता और विदुर की झोपड़ी में गरिमा का अर्थ समझाया। ऐसे में कथावाचकों को अपमानित करने की कल्पना सिर्फ व्यक्तियों का नहीं, बल्कि समाज की स्मृति का अपमान है। जो लोग कथाओं को पिछड़ापन बताते हैं, वे भूल जाते हैं कि समाज अपनी जड़ों से कटकर आगे नहीं बढ़ता, बल्कि भटकता है।

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असहमति बनाम अपमान: लोकतंत्र की बुनियादी रेखा

लोकतंत्र में असहमति पवित्र मानी जाती है। विचारों पर बहस होनी चाहिए, आलोचना होनी चाहिए। लेकिन आलोचना और अपमान के बीच एक स्पष्ट रेखा होती है। सवाल उठाने का औजार तर्क होता है, जूते नहीं। अगर किसी को कथाओं या कथावाचकों से वैचारिक आपत्ति है, तो उसका उत्तर संवाद में है, अपमान में नहीं। जब भाषा हिंसक होती है, तो वह बहस को नहीं, समाज को नुकसान पहुंचाती है। सार्वजनिक जीवन में बैठे लोगों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे शब्दों की ताकत को समझें। क्योंकि शब्द ही या तो समाज को जोड़ते हैं, या फिर उसे लंबे समय तक जख्मी कर देते हैं।

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जगद्गुरु रामभद्राचार्य का नाम और परंपरा पर हमला

इस पूरे विवाद में जब निशाने पर Jagadguru Rambhadracharya जैसे प्रतिष्ठित कथावाचक का नाम आता है, तब मामला और गंभीर हो जाता है। यह सिर्फ एक व्यक्ति पर टिप्पणी नहीं, बल्कि उस परंपरा पर हमला है जिसने संस्कृत, वेद, दर्शन और भारतीय भाषाओं को जीवित रखा। आलोचक अक्सर पूछते हैं कि कथावाचक किस अधिकार से बोलते हैं। उत्तर सीधा है उसी अधिकार से जिससे कवि कविता लिखता है, शिक्षक पढ़ाता है और पत्रकार सवाल पूछता है। यह अधिकार संविधान देता है, और समाज से सम्मान संस्कृति के माध्यम से आता है। जिनके पास सम्मान का भाव नहीं होता, वे अधिकार को भी अपमान में बदल देते हैं।

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दोहरे मापदंड और अभिव्यक्ति की राजनीति

आज के समय में दोहरे मापदंड तेजी से सामने आ रहे हैं। एक ओर अभिव्यक्ति की आज़ादी का झंडा उठाया जाता है, दूसरी ओर आस्था और परंपरा के लिए अपमानजनक भाषा को ठहराया जाता है। सवाल यह है कि क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब किसी समुदाय, परंपरा या सांस्कृतिक प्रतीक को गाली देना है? अगर लोकतंत्र में सबकी आवाज़ की बात की जाती है, तो सम्मान भी सबके लिए समान होना चाहिए। चयनित विचारों के लिए सुरक्षा और बाकी सबके लिए अपमान यह किसी भी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती।

बयानबाज़ी किसके लिए: जनता या एल्गोरिदम?

एक अहम सवाल यह भी है कि ऐसे बयान आखिर किसके लिए दिए जाते हैं जनता के लिए या सोशल मीडिया एल्गोरिदम के लिए? क्या यह वह राजनीति नहीं बनती जा रही, जिसमें कुछ मिनटों की वायरल सुर्खियों के लिए समाज को महीनों तक ज़हरीली बहसों में झोंक दिया जाता है? शोर बिकता है, समाधान नहीं यह प्रवृत्ति आज की राजनीति की बड़ी समस्या बन चुकी है। कैमरे के सामने आग उगलना आसान है, लेकिन समाज के घावों पर मरहम रखना कठिन। दुर्भाग्य से कठिन रास्ते से ज़्यादा आसान शोर चुना जा रहा है।

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संस्कृति को सियासी अखाड़ा मत बनाइए

यह बहस किसी एक बयान या एक नेता तक सीमित नहीं है। यह उस दिशा का सवाल है जिसमें समाज को धकेला जा रहा है जहां संवाद की जगह अपशब्द और विचार की जगह वायरल क्लिप्स ले रही हैं। हर बार जब कथा को गाली दी जाती है, कहीं न कहीं एक पीढ़ी अपनी जड़ों से और दूर हो जाती है। राजनीति से यही अपेक्षा है कि वह समाज को जोड़ने का माध्यम बने, तोड़ने का नहीं। असहमति रखिए, सवाल पूछिए, बहस कीजिए लेकिन मर्यादा के साथ। क्योंकि जब जूते माला बनते हैं, तब समाज नंगा होता है। और नंगे समाज को कपड़े घृणा से नहीं, शब्दों की जिम्मेदारी से पहनाए जाते हैं।

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कथाएं रुकेंगी नहीं, राजनीति को सीखना होगा

कथावाचक मंच से उतरेंगे नहीं, क्योंकि कथा रुकेगी नहीं। राजनीति अगर सम्मान सीख ले, तो लोकतंत्र बचेगा। और अगर अपमान ही हथियार बना रहा, तो इतिहास वही करेगा जो वह हमेशा करता आया है अपमान के शोर को हाशिये पर और संस्कृति की कथा को केंद्र में रखेगा। यह समय है कि बयानबाज़ी के शोर में विवेक की आवाज़ सुनी जाए। क्योंकि देश की बहसें तभी मजबूत होंगी, जब शब्दों में मर्यादा और सोच में जिम्मेदारी होगी।

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