Mohans Bhagwat Chhoti Khatu Maryada Mahotsav: राजस्थान के नागौर जिले में स्थित ऐतिहासिक धार्मिक स्थल छोटी खाटू में आयोजित मर्यादा महोत्सव इस वर्ष एक साधारण धार्मिक आयोजन न रहकर सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय चिंतन का प्रभावशाली मंच बनकर उभरा। इस भव्य आयोजन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की उपस्थिति ने कार्यक्रम को ऐतिहासिक और विचारप्रधान स्वरूप प्रदान किया।
मर्यादा महोत्सव ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय परंपराएं केवल आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे समाज को दिशा देने और राष्ट्र को जोड़ने की सामर्थ्य भी रखती हैं। हजारों श्रद्धालुओं की सहभागिता ने इस आयोजन को जन-आंदोलन जैसा स्वरूप दे दिया।
श्रद्धा, संस्कृति और परंपरा का भव्य संगम
मर्यादा महोत्सव के दौरान आयोजन स्थल पर श्रद्धा और संस्कृति का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। देश के विभिन्न राज्यों से आए संत-महात्मा, धर्माचार्य, सामाजिक कार्यकर्ता, स्वयंसेवक और आम श्रद्धालु इस कार्यक्रम का हिस्सा बने। वैदिक मंत्रोच्चार, भक्ति संगीत, लोक कला और पारंपरिक वेशभूषा ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
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कार्यक्रम स्थल पर भारतीय सभ्यता और संस्कृति की जीवंत झलक साफ दिखाई दे रही थी। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक था, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव का संदेश भी दे रहा था। स्थानीय लोगों के लिए यह अवसर गर्व और प्रेरणा का स्रोत बना।
मर्यादा ही समाज और राष्ट्र की असली शक्ति
अपने विचारोत्तेजक संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि मर्यादा केवल धार्मिक अनुशासन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली जीवन शैली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस समाज में मर्यादा, अनुशासन और आत्मसंयम होता है, वही समाज दीर्घकाल तक मजबूत बना रहता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल आधार त्याग, सेवा, अनुशासन और सामूहिक चेतना है। इन्हीं मूल्यों ने भारत को हजारों वर्षों तक एक सूत्र में बांधे रखा है। मर्यादा का पालन व्यक्ति के चरित्र को मजबूत करता है और समाज को दिशा देता है।
भारतीय संस्कृति की वैश्विक प्रासंगिकता
अपने संबोधन में RSS प्रमुख ने यह भी कहा कि आज पूरा विश्व भारत की ओर आशा की दृष्टि से देख रहा है। उन्होंने बताया कि वसुधैव कुटुम्बकम, सहिष्णुता और समरसता जैसे भारतीय मूल्य आज वैश्विक समस्याओं के समाधान की क्षमता रखते हैं।
मोहन भागवत ने युवाओं से आग्रह किया कि वे आधुनिकता को अपनाएं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कभी दूर न हों। उनका कहना था कि तकनीक और परंपरा का संतुलन ही भारत की असली शक्ति है, जो आने वाले समय में विश्व को नई दिशा दे सकता है।
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सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता पर जोर
RSS प्रमुख ने समाज में बढ़ते वैचारिक और सामाजिक विभाजन पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जाति, भाषा, क्षेत्र और संप्रदाय के भेद से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मर्यादा महोत्सव जैसे आयोजन समाज में संवाद, सौहार्द और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देते हैं। ऐसे कार्यक्रम लोगों को जोड़ने और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने का कार्य करते हैं।
स्वयंसेवक और युवा शक्ति, राष्ट्र निर्माण की धुरी
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि संघ का कार्य केवल संगठन निर्माण तक सीमित नहीं है। यह समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा, सहयोग और संस्कार पहुंचाने का माध्यम है। उन्होंने युवाओं को विशेष संदेश देते हुए कहा कि यदि युवा शक्ति चरित्रवान, अनुशासित और मर्यादित होगी, तो कोई भी ताकत राष्ट्र को कमजोर नहीं कर सकती। उन्होंने नशा, हिंसा और नकारात्मक सोच से दूर रहकर राष्ट्रहित में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
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आयोजन का दूरगामी सामाजिक प्रभाव
मर्यादा महोत्सव का प्रभाव केवल आयोजन स्थल तक सीमित नहीं रहा। पूरे क्षेत्र में सामाजिक सौहार्द, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय भावना को नई ऊर्जा मिली। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित जनसमूह ने राष्ट्रहित, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण का संकल्प लिया।स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं ने इस आयोजन को आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक प्रेरणा का केंद्र बताया। आयोजन समिति के अनुसार भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रम समाज को जोड़ने, सकारात्मक सोच विकसित करने और सांस्कृतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का कार्य करते रहेंगे। छोटी खाटू में आयोजित मर्यादा महोत्सव ने यह सिद्ध किया कि भारतीय परंपराएं आज भी समाज और राष्ट्र को दिशा देने में सक्षम हैं। मोहन भागवत का संबोधन मर्यादा, समरसता और राष्ट्रबोध का स्पष्ट संदेश बनकर उभरा, जो आने वाले समय में सामाजिक चेतना को और मजबूत करेगा।
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