Rohit Sharma fearless mindset: भारतीय क्रिकेट के सबसे अनुभवी और सफल बल्लेबाजों में शामिल होने वाले रोहित शर्मा ने हाल ही में अपने संन्यासी और वैज्ञानिक से जुड़े कुछ अहम खुलासे पर खुलकर बात की। उन्होंने स्वीकार किया कि 2019 आईसीसी पुरुष क्रिकेट विश्व कप के लिए उनका सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि सोच बदलने वाला अनुभव था। इंग्लैंड और वेल्स ने उस विश्व कप में रिकॉर्ड तोड़ रन बनाए, लेकिन टीम इंडिया खिताब जीतने से चूक गई। उनके अंदर एक बड़ा सवाल पैदा हुआ- अगर टीम में कोई वकील नहीं है, तो व्यक्तिगत वकील का मतलब क्या है? रोहित शर्मा ने टी20 वर्ल्ड कप के लिए कप्तान रोहित शर्मा का रोडमैप बताया, जिसमें उन्होंने बताया कि 2019 के बाद उनका आत्मविश्वास, सोच और जिम्मेदारी बिल्कुल बदल गई।
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2019 वर्ल्ड कप, जब रन बने, लेकिन खुशी अधूरी रह गई
2019 विश्व कप में रोहित शर्मा का बल्ला आग उगल रहा था। शतक पर शतक लगे, रिकॉर्ड बने और आंकड़े इतिहास में दर्ज हो गए। इसके बावजूद भारत ट्रॉफी जीतने में नाकाम रहा। रोहित के मुताबिक, यही वो पल था जिसने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। उन्होंने कहा कि उस टूर्नामेंट के बाद उन्होंने खुद से सवाल किया ‘इन रनों का क्या फायदा, अगर टीम विश्व कप नहीं जीत पाई?’ आंकड़ों में नाम दर्ज होना अच्छा लगता है, लेकिन कप्तान और खिलाड़ी के तौर पर उन्हें उससे संतुष्टि नहीं मिली। यहीं से उन्होंने तय किया कि आगे वह सिर्फ रन बनाने के लिए नहीं, बल्कि टीम को जिताने के लिए खेलेंगे।
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2020 से शुरू हुआ सोच का बदलाव, 2022-23 में दिखा असर
रोहित शर्मा ने बताया कि 2020 से उन्होंने क्रिकेट को देखने का नजरिया बदलना शुरू किया। उन्होंने डर से बाहर निकलकर खेलने का फैसला किया—बिना इस चिंता के कि 40 के स्कोर पर आउट हो गए या 90 के आसपास विकेट गिर गया। उनके मुताबिक, यह बदलाव एक दिन में नहीं आया। 2020 से 2022 तक उन्होंने इस नई सोच को अपनाने और उसमें ढलने में समय लिया। अंततः 2022 और 2023 में उन्होंने इसे पूरी तरह अपने खेल में उतार दिया। अब उनका फोकस व्यक्तिगत आंकड़ों से ज्यादा प्रभावशाली पारियों और मैच जिताने वाले योगदान पर था। उनके लिए खुशी वही थी, जिसमें टीम की जीत शामिल हो।
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ICC ट्रॉफी का लंबा इंतजार और हार का डर
रोहित शर्मा ने भारत के लंबे ICC ट्रॉफी सूखे पर भी ईमानदारी से बात की। 2011 विश्व कप के बाद भारत ने 2024 तक कोई ICC विश्व कप नहीं जीता यानी 13 साल का इंतज़ार। अगर 2013 चैंपियंस ट्रॉफी को शामिल करें, तब भी यह सूखा 11 साल लंबा रहा। रोहित ने कहा कि टीम लगातार सही चीज़ें कर रही थी, मेहनत में कोई कमी नहीं थी, लेकिन फिर भी कुछ अधूरा था। उनके अनुसार, शायद कहीं न कहीं हार का डर टीम के भीतर घर कर गया था। यह डर खिलाड़ियों को खुलकर खेलने से रोक रहा था।
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खिलाड़ियों को आज़ादी और स्पष्ट भूमिका देने का मॉडल
इस डर को दूर करने के लिए रोहित शर्मा ने कप्तान के रूप में एक स्पष्ट रास्ता चुना खिलाड़ियों को आज़ादी, भरोसा और साफ भूमिका देना। उन्होंने बताया कि वह खिलाड़ियों से व्यक्तिगत बातचीत करते थे, उन्हें साफ शब्दों में बताते थे कि टीम उनसे क्या उम्मीद करती है। रोहित का मानना है कि जब खिलाड़ी को यह भरोसा होता है कि कप्तान और कोच उसके साथ खड़े हैं, तो वह मैदान पर निडर होकर फैसले लेता है। उसे यह डर नहीं रहता कि एक असफलता उसके करियर पर सवाल खड़े कर देगी। यही भरोसा बड़े मैचों में फर्क पैदा करता है।
2024 टी20 विश्व कप जीत, सोच की जीत
रोहित शर्मा की यही सोच आखिरकार 2024 टी20 विश्व कप में रंग लाई। भारत ने लंबा इंतज़ार खत्म किया और ICC ट्रॉफी दोबारा अपने नाम की। रोहित के लिए यह जीत सिर्फ एक खिताब नहीं थी, बल्कि उस विचारधारा की जीत थी, जिसे उन्होंने 2019 के बाद अपनाया था। उन्होंने कहा कि जब खिलाड़ी निडर होकर खेलते हैं, जिम्मेदारी को बोझ नहीं बल्कि मौका मानते हैं, तब टीम असाधारण प्रदर्शन करती है। 2024 की जीत ने यह साबित कर दिया कि क्रिकेट में सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि मानसिक आज़ादी भी उतनी ही जरूरी है। रोहित शर्मा की कहानी सिर्फ क्रिकेट की नहीं, बल्कि नेतृत्व और आत्ममंथन की भी है। 2019 विश्व कप की निराशा ने उन्हें बेहतर खिलाड़ी और कप्तान बनाया। डर से आज़ादी, व्यक्तिगत आंकड़ों से ऊपर टीम की जीत और खिलाड़ियों पर भरोसा यही वो सूत्र हैं, जिन्होंने भारत को 2024 में दोबारा विश्व विजेता बनाया। यह सीख सिर्फ खेल तक सीमित नहीं, बल्कि हर उस क्षेत्र में लागू होती है, जहां टीमवर्क और नेतृत्व अहम भूमिका निभाते हैं।
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