Viksit Bharat Vision| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर देश को उसके संवैधानिक कर्तव्यों की याद दिलाई है। उन्होंने कहा कि यह समय अधिकारों के साथ-साथ जिम्मेदारियों को समझने का भी है। उनका संदेश केवल औपचारिक नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक स्पष्ट आह्वान है। दरअसल, 24 जनवरी का दिन भारत के संवैधानिक इतिहास में विशेष महत्व रखता है। इसी दिन संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया था। प्रधानमंत्री ने इस ऐतिहासिक संदर्भ को वर्तमान से जोड़ते हुए नई पीढ़ी को प्रेरित किया। यह संदेश उस दौर में आया है, जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में संविधान के मूल्यों को समझना और अपनाना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।
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Viksit Bharat Vision : 24 जनवरी संविधान और राष्ट्रभाव की पहचान
24 जनवरी केवल एक तारीख नहीं है। यह भारत की सामूहिक चेतना से जुड़ा दिन है। इसी दिन संविधान सभा ने देश की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय आत्मा को स्वर दिया। जन गण मन केवल एक गीत नहीं, बल्कि एकता का प्रतीक है। वहीं वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन की भावना को जीवित रखता है। प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि इन प्रतीकों का सम्मान नागरिक कर्तव्य है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्र की पहचान केवल प्रतीकों से नहीं बनती। वह नागरिकों के आचरण, सोच और संकल्प से बनती है। यहीं से जिम्मेदारी की भावना जन्म लेती है।
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Viksit Bharat Vision: नियुक्ति पत्र केवल नौकरी नहीं, राष्ट्र निर्माण का निमंत्रण
प्रधानमंत्री ने नियुक्ति पत्र को एक विशेष दृष्टि से परिभाषित किया। उनके अनुसार यह केवल सरकारी नौकरी का दस्तावेज़ नहीं है। यह राष्ट्र निर्माण का औपचारिक निमंत्रण है। उन्होंने कहा कि नियुक्ति पत्र एक तरह से संकल्प पत्र है। यह व्यक्ति को विकसित भारत की दिशा में काम करने का अवसर देता है। यह सोच युवाओं को भूमिका और उद्देश्य दोनों देती है। इसके अलावा, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सरकारी सेवा जिम्मेदारी की कसौटी होती है। यह सेवा पारदर्शिता, ईमानदारी और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ी होती है। यही भावना एक मजबूत प्रशासन का आधार बनती है।
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Viksit Bharat Vision: विकसित भारत की परिकल्पना और युवाओं की भूमिका
प्रधानमंत्री का विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक नहीं है। यह सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विकास से भी जुड़ा है। इस लक्ष्य में युवाओं की भूमिका सबसे अहम मानी गई है। उन्होंने कहा कि आज का युवा केवल नौकरी चाहने वाला नहीं है। वह नीति, नवाचार और नेतृत्व का भागीदार है। इस बदलाव को दिशा देना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। इसी क्रम में उन्होंने संविधान को मार्गदर्शक बताया।
संविधान समान अवसर और समान जिम्मेदारी का सिद्धांत देता है। इसी संतुलन से स्थायी विकास संभव होता है।
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Viksit Bharat Vision: संविधान के प्रति कर्तव्य, भविष्य की नींव
प्रधानमंत्री ने बार-बार कर्तव्य शब्द पर जोर दिया। उनका मानना है कि अधिकार तभी सुरक्षित रहते हैं, जब कर्तव्य निभाए जाएं। यह विचार लोकतंत्र को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं है। यह देश की आत्मा और दिशा दोनों तय करता है।
इसलिए हर नागरिक का इससे भावनात्मक जुड़ाव जरूरी है। आज जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका बढ़ा रहा है, तब संवैधानिक मूल्यों का पालन हमारी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। यही सोच भारत को एक सशक्त और विकसित राष्ट्र बनाएगी।
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प्रधानमंत्री का यह संदेश केवल एक भाषण नहीं है। यह नागरिक चेतना को जागृत करने का प्रयास है। संविधान, कर्तव्य और संकल्प को जोड़ने की स्पष्ट कोशिश है 24 जनवरी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर नियुक्ति पत्र तक, हर पहलू राष्ट्र निर्माण की सोच को मजबूत करता है। यही सोच विकसित भारत की असली नींव बन सकती है।
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