Border 2 Box Office : हिंदी सिनेमा में कुछ फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं होतीं, बल्कि भावनाओं की पहचान बन जाती हैं। बॉर्डर ऐसी ही एक फिल्म है, जिसने देशभक्त, बलिदान और सैनिकों की जिंदादिली को अमर कर दिया। अब जब बॉर्डर 2 सिनेमा में आई है, तो दर्शकों के साथ-साथ इंडस्ट्री की निगाहें भी इस पर टिकी हैं। यह फिल्म सिर्फ सीक्वल नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी का विस्तार है।
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अचानक उपजा विचार, लेकिन सोच पूरी तरह पुख्ता
फिल्म के निर्देशक अनुराग सिंह का कहना है कि ‘बॉर्डर 2’ में किसी योजना का हिस्सा नहीं था। दरअसल, एक दिन के निर्माता भूषण कुमार से किसी और फिल्म पर बातचीत हो रही थी। इसी दौरान उन्होंने अचानक कहा कि अगर आप ये कर सकते हैं तो ‘बॉर्डर’ भी कर सकते हैं। हालांकि, इस प्रस्ताव ने निर्देशित को चौंका दिया। क्योंकि ‘बॉर्डर’ जैसी आइकॉनिक फिल्म को आगे बढ़ाना आसान नहीं था। इसके पीछे एक तय आर्किटेक्चरल ढांचा था, जिससे ज़रा-सी भी दर्शकों को निराश कर सकती थी।
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तय फार्मूला और सीमित स्वतंत्रता
अनुराग सिंह मानते हैं कि हर निर्देशक अपनी पहचान के अनुसार फिल्म बनाना चाहता है। लेकिन ‘बॉर्डर’ के मामले में ऐसा संभव नहीं था।
उन्होंने साफ कहा कि इस फिल्म में ‘ज़्यादा इधर-उधर जाने की गुंजाइश नहीं थी।’ यानी कहानी, भावनाएं और देशभक्ति की तीव्रता पहले से तय थी। इसलिए निर्देशन के दौरान संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। फिर भी, भरोसे और समर्थन ने इस डर को धीरे-धीरे आत्मविश्वास में बदल दिया।
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निर्माता का भरोसा बना सबसे बड़ी ताकत
भूषण कुमार ने निर्देशक को पूरा भरोसा दिलाया कि बजट, कलाकार और तकनीकी ज़रूरतों में कोई कमी नहीं होगी। अनुराग सिंह के अनुसार, यह भरोसा सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहा। बल्कि हर स्तर पर निर्माता उनके साथ खड़े रहे। इसी कारण, फिल्म की योजना से लेकर ज़मीनी क्रियान्वयन तक एक स्पष्ट दिशा बनी रही।
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‘गदर 2’ की सफलता से मिली रफ्तार
भूषण कुमार बताते हैं कि ‘बॉर्डर 2’ को लेकर चर्चा पहले से चल रही थी। हालांकि, गदर 2 की रिकॉर्डतोड़ सफलता के बाद यह विचार और मजबूत हुआ। उन्हें लगा कि जब दर्शक बड़े ब्रांड को दोबारा जमाने के लिए तैयार होते हैं, तो ‘बॉर्डर’ जैसी विशाल पहचान को नए दौर में लाना जरूरी है। यहीं से इस प्रोजेक्ट को ठोस रूप मिला।
जेपी दत्ता की विरासत और नई टीम
फिल्म के मूल निर्माता जेपी दत्ता और निधि दत्ता कई वर्षों से ‘बॉर्डर 2’ पर विचार कर रहे थे। हालाँकि, स्वास्थ्य अनुसंधान से लेकर निदेशक तक नहीं कर सके। इसके बाद एक ऐसे निर्देशक की तलाश शुरू हुई, जो विरासत का सम्मान भी करे और नई सोच भी ला सके। कई सार्जेंट की बातचीत के बाद अनुराग सिंह को यह जिम्मेदारी सौंपी गई।
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कास्टिंग में संतुलन और स्टार पावर
भूषण कुमार ने साफ कहा कि सनी देओल के बिना ‘बॉर्डर 2’ मुमकिन ही नहीं थी। उनकी मौजूदगी वाली फिल्म की आत्मा मानी गई। इसके साथ ही, फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों के किरदार के लिए दिलजीत दोसांझ को चुना गया। वहीं, वरुण धवन और अहान शेट्टी की एंट्री से नई पीढ़ी का काम भी मजबूत हुआ।
लंबा शूट, लेकिन तय समय पर पूरा
फिल्म की शूटिंग लगभग 140 दिनों तक चली। इतने लंबे शेड्यूल के बावजूद टीम ने समयसीमा का पालन किया। अनुराग सिंह मानते हैं कि कई निर्देशक ऐसी परिस्थितियों में देरी की बात करते। लेकिन यहां मजबूत प्लानिंग और टीमवर्क ने असंभव को संभव बनाया।
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‘संदेसे आते हैं’ को दोबारा जीवित करने की चुनौती
‘बॉर्डर’ का नाम आते ही ‘संदेसे आते हैं’ गीत याद आ जाता है। भूषण कुमार मानते हैं कि ऐसे अमर गीत को फिर से पेश करना साहस का काम है।टीम ने तय किया कि गीत की आत्मा से कोई समझौता नहीं होगा। इसलिए मूल आवाज़ों को बनाए रखते हुए, नई पीढ़ी के गायकों को भी जोड़ा गया।
संगीत और भावनाओं का सटीक संतुलन
गीतकार मनोज मुंतशिर और संगीतकार मिथुन ने इस पुनर्रचना में अहम भूमिका निभाई। अनुराग सिंह के अनुसार, अगर एक भी तत्व गलत होता, तो गीत का असर टूट जाता। लेकिन टीम ने हर स्तर पर बनने से काम किया।
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बॉक्स ऑफिस पर शानदार शुरुआत
23 जनवरी को रिलीज हुई ‘बॉर्डर 2’ ने पहले दिन ही ज़बरदस्त ओपनिंग दर्ज की। ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श के मुताबिक, फिल्म ने भारत में लगभग 32.10 करोड़ रुपये की नेट कमाई की। यह आंकड़ा 2026 की अब तक की सबसे बड़ी ओपनिंग में शामिल है। हालांकि, कुछ इलाकों में मौसम ने असर डाला, फिर भी मुंह से शब्द की उम्मीदें और बढ़ेंगी।
1971 के युद्ध की कहानी, नए दृष्टिकोण के साथ
फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध की सच्ची घटनाओं से प्रेरित है। इसमें थलसेना, नौसेना और वायुसेना के संयुक्त पराक्रम को दिखाया गया है।
‘बॉर्डर 2’ एक बार फिर दिखाती है कि देश की रक्षा सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि एकजुटता से होती है।
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भरोसा और रचनात्मक आज़ादी बनी सफलता की कुंजी
अंत में, भूत और भविष्य को जोड़ती यह फिल्म एक मजबूत संदेश देती है। निर्देशक और निर्माता दोनों मानते हैं कि भरोसा और रचनात्मक स्वतंत्रता के बिना ऐसी फिल्म संभव नहीं थी। इसी तालमेल ने ‘बॉर्डर 2’ को सिर्फ सीक्वल नहीं, बल्कि एक सम्मानजनक विस्तार बना दिया।
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