Indus Waters Treaty: 26 जनवरी 2026 के गणतंत्र दिवस पर घोषित पद्म पुरस्कार 2026 की सूची में खेल जगत से विजय अमृतराज (टेनिस) जैसे खिलाड़ियों के नाम भी शामिल रहे। इसी बीच Indus Waters Treaty (सिंधु जल संधि) को लेकर पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मंचों पर चिंता जताई, और भारत ने 27 जनवरी 2026 को UN में जवाब देते हुए कहा कि पानी धमकी से नहीं, समझौते की प्रक्रिया और दस्तावेज़ी नियमों से संचालित होता है। भारत का तर्क यह रहा कि यदि आपत्ति है तो तकनीकी तंत्र के तहत तथ्य और डेटा के साथ बात हो; बयानबाज़ी से न तो समाधान निकलता है, न भरोसा बनता है। वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस मुद्दे को मानवीय संकट के फ्रेम में उठाया, लेकिन भारत ने प्रक्रिया आधारित जवाब देकर यह संकेत दिया कि संधि का रास्ता टेक्निकल टेबल से होकर ही जाएगा।

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क्या है ताजा घटनाक्रम
पिछले कुछ दिनों में पाकिस्तान ने UN से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय जल-नीति कार्यक्रम में यह कहा कि भारत के कदमों से उसके लिए “अभूतपूर्व संकट” बन रहा है। इसके अलावा, UN Security Council की बहस में पाकिस्तान के प्रतिनिधि ने Indus Waters Treaty का भी संदर्भ लिया। इसके जवाब में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने कहा कि संधि के 65 वर्षों में भरोसा बार-बार चोटिल हुआ है, और किसी भी मुद्दे पर बात नियमों की भाषा में ही आगे बढ़ेगी।
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भारत ने UN में क्या कहा बटन नहीं, प्रक्रिया
भारत के तर्क का मूल संदेश यह था कि सिंधु बेसिन का जल-प्रबंधन किसी एक बयान, प्रेस कॉन्फ्रेंस या भावनात्मक अपील से तय नहीं होता।
साथ ही भारत ने यह भी रेखांकित किया कि संधि का ढांचा कानूनी-तकनीकी है, और विवाद आपत्ति की स्थिति में रास्ता भी वही है बैठकें, निरीक्षण, डेटा साझा करने की प्रक्रियाएं और स्थापित संस्थागत तंत्र। इसी क्रम में, भारत की लाइन यह रही कि यदि किसी परियोजना, जल प्रवाह या संचालन पर सवाल हैं, तो “क्लेम” के साथ डाटा, डिजाइन और टाइमलाइन रखी जाए तभी निष्पक्ष तकनीकी चर्चा संभव है।

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तकनीकी बातचीत बनाम राजनीतिक शोर
पाकिस्तान की तरफ से तर्क यह रखा गया कि संधि राजनीतिक व्यवस्था नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय संधि है और इसे एकतरफा बदला स्थगित नहीं किया जा सकता। वहीं दूसरी ओर, भारत का जोर इस बात पर रहा कि संधि के लंबे इतिहास में विश्वास का संकट सिर्फ पानी तक सीमित नहीं रहा, और सुरक्षा व सीमापार हिंसा जैसे मुद्दों से समग्र माहौल प्रभावित होता है। खास बात यह है कि इस दौर की बहस में जलवायु परिवर्तन, बढ़ती मांग और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर सुरक्षा” जैसे पहलुओं का उल्लेख भी सामने आया है यानी विवाद अब केवल “कितना पानी” तक नहीं, बल्कि कैसे मैनेज हो तक फैल रहा है।
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Indus Waters Treaty का बेसिक फ्रेम
संधि (1960) के तहत सिंधु नदी तंत्र के पानी के उपयोग वितरण के नियम तय हैं और यह दस्तावेज़ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। इसी वजह से, जब भी कोई पक्ष आरोप लगाता है, तो जवाब भी अक्सर “व्याख्या, क्लॉज, और प्रक्रिया” के आधार पर आता है क्योंकि संधि की प्रकृति ही तकनीकी है।
शिकायत नहीं, डेटा की डिमांड
अब सवाल यह है कि आगे रास्ता क्या है। भारत के UN रुख से संकेत यही निकलता है कि यदि पाकिस्तान को आपत्ति है, तो वह स्थापित तंत्र के तहत ठोस सामग्री और तकनीकी बिंदुओं के साथ आए। वहीं पाकिस्तान का जोर यह रहेगा कि संधि की स्थिति और उसके प्रभावों पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान बना रहे। इस बीच, भारत के लिए घरेलू जल-सुरक्षा, ऊर्जा जरूरतें, और मौसम के उतार-चढ़ाव भी नीति-निर्माण के अहम कारक हैं लेकिन इन सबके साथ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का संतुलन रखना भी उतना ही जरूरी है। यही वजह है कि आधिकारिक बयान आमतौर पर प्रक्रिया पर टिके रहते हैं, उत्तेजना पर नहीं।
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UN मंच पर इस बहस का साफ संदेश यही है सिंधु का पानी धमकी से नहीं, दस्तावेज़ और नियमों से बहता है। भारत ने जोर देकर कहा कि अगर बात करनी है तो तकनीकी प्रक्रिया में आइए; और अगर आरोप हैं तो डेटा के साथ आइए। वहीं पाकिस्तान ने इसे तात्कालिक जल-सुरक्षा चिंता के रूप में पेश किया। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि दोनों पक्ष संवाद को “राजनीतिक बयान” से निकालकर “तकनीकी समाधान” की ओर कितना ले जाते हैं।
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