Surajkund International Crafts Mela 2026: हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की उपस्थिति में माननीय सी. पी. राधाकृष्णन ने 39वां सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प महोत्सव का उद्घाटन फरीदाबाद में किया। गणतंत्र दिवस समारोहों और पद्म पुरस्कार 2026 की पृष्ठभूमि में आयोजित इस महोत्सव का उद्देश्य शिल्पकारों को मंच देना और आत्मनिर्भर भारत की सोच को आगे बढ़ाना है। पहले दो वाक्यों में खिलाड़ियों के सम्मान और राष्ट्रीय आयोजनों के संदर्भ के साथ कार्यक्रम की व्यापकता रेखांकित की गई।
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हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान का राष्ट्रीय मंच
खास बात यह है कि सूरजकुंड महोत्सव वर्षों से भारत की लोककला, हस्तशिल्प और पारंपरिक कौशल का प्रतीक रहा है। इस संस्करण में देश-विदेश से आए शिल्पकारों की भागीदारी ने सांस्कृतिक विविधता को और समृद्ध किया। वहीं दूसरी ओर, राज्यों के पवेलियन, थीम-आधारित प्रदर्शनी और लाइव डेमो ने दर्शकों को शिल्प की बारीकियों से जोड़ा।
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इसके अलावा, आयोजन का फोकस स्थानीय कारीगरों की आय बढ़ाने, मार्केट-लिंकेज मजबूत करने और डिज़ाइन इनोवेशन को बढ़ावा देने पर रहा। इससे न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है, बल्कि पारंपरिक हुनर की नई पीढ़ी भी तैयार होती है।
आत्मनिर्भर भारत की सोच को मजबूती
इसी क्रम में, उद्घाटन अवसर पर आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना पर ज़ोर दिया गया। शिल्प, हथकरघा और हस्तकला जैसे सेक्टर रोजगार सृजन के बड़े स्रोत हैं। साथ ही, डिजिटल पेमेंट, ई-कॉमर्स और GI-टैग जैसी पहलों से कारीगरों को सीधे बाज़ार तक पहुंच मिलती है।
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खास बात यह है कि महोत्सव में कौशल उन्नयन, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात संभावनाओं पर संवाद भी हुआ। इससे शिल्प को केवल प्रदर्शनी तक सीमित न रखकर स्थायी आजीविका मॉडल में बदला जा सकता है।
मुख्यमंत्री का संदेश, परंपरा और प्रगति का संतुलन (Surajkund International Crafts Mela 2026)
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि हरियाणा सरकार शिल्पकारों के साथ खड़ी है। वहीं दूसरी ओर, बुनियादी ढांचे, पर्यटन और कनेक्टिविटी में सुधार से ऐसे आयोजनों की पहुंच बढ़ी है। इसके अलावा, युवाओं को पारंपरिक शिल्प से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण और स्टार्ट-अप सहयोग जैसे कदम भी अहम बताए गए। साथ ही, राज्य में आयोजित सांस्कृतिक आयोजनों से स्थानीय रोजगार, होटल पर्यटन और सेवा क्षेत्र को गति मिलती है जो समग्र विकास के लिए जरूरी है।
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अंतरराष्ट्रीय सहभागिता और सांस्कृतिक कूटनीति
खास बात यह है कि सूरजकुंड महोत्सव अंतरराष्ट्रीय सहभागिता का सशक्त मंच बन चुका है। विभिन्न देशों के शिल्पकारों की मौजूदगी से सांस्कृतिक संवाद बढ़ता है और भारतीय शिल्प की वैश्विक पहचान मजबूत होती है। इसी क्रम में, फ्यूज़न डिज़ाइन, समकालीन उपयोग और टिकाऊ सामग्री पर भी ध्यान आकर्षित हुआ। वहीं दूसरी ओर, पर्यावरण-अनुकूल स्टॉल, वेस्ट-मैनेजमेंट और लोकल सोर्सिंग जैसे कदम आयोजन को जिम्मेदार और आधुनिक बनाते हैं।
दर्शकों के लिए अनुभव और सुविधाएं (Surajkund International Crafts Mela 2026)
इसके अलावा, दर्शकों के लिए थीम आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लोकसंगीत, पारंपरिक व्यंजन और क्राफ्ट-वर्कशॉप्स आकर्षण का केंद्र रहीं। टिकटिंग, सुरक्षा, पार्किंग और सूचना-डेस्क जैसी व्यवस्थाओं को बेहतर बनाकर विज़िटर-एक्सपीरियंस को सहज रखा गया। खास बात यह है कि परिवारों, छात्रों और पर्यटकों तीनों वर्गों के लिए सीखने और आनंद का संतुलित अनुभव तैयार किया गया।

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कुल मिलाकर, 39वां सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि कारीगरों की आजीविका, सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक आत्मनिर्भरता का संगम है। इसी क्रम में, सरकार-समाज-बाज़ार की साझेदारी से शिल्प को स्थायी विकास की धारा में आगे बढ़ाने की दिशा स्पष्ट होती है।
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सूरजकुंड मेले का इतिहास (Surajkund International Crafts Mela 2026)
सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेले की शुरुआत वर्ष 1987 में हरियाणा सरकार की पहल पर की गई थी, जिसका उद्देश्य देश की लुप्तप्राय लोककला और पारंपरिक हस्तशिल्प को एक स्थायी मंच देना था। अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित ऐतिहासिक सूरजकुंड परिसर में आरंभ हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे राष्ट्रीय पहचान से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक उत्सव बन गया।
हर वर्ष किसी एक भारतीय राज्य को थीम स्टेट और किसी देश क्षेत्र को पार्टनर के रूप में शामिल करने की परंपरा ने मेले को वैश्विक स्वरूप दिया। खास बात यह है कि तीन दशकों से अधिक के सफर में यह मेला केवल खरीद बिक्री तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय शिल्प, लोकसंगीत, नृत्य, खानपान और सांस्कृतिक कूटनीति का मजबूत प्रतीक बनकर उभरा है। (Surajkund International Crafts Mela 2026)
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