Balochistan Insurgency in Pakistan: पाकिस्तान एक बार फिर अपनी ही बनाई आग में झुलसता नजर आ रहा है। बलूचिस्तान में खून से सना यह वीकेंड किसी एक आतंकी घटना या सीमित हिंसा का मामला नहीं था, बल्कि यह पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक सोच और सत्ता के अहंकार पर सीधा प्रहार था। एक साथ 12 इलाकों में सुनियोजित हमले यह बताने के लिए काफी हैं कि बलूचिस्तान अब केवल एक अशांत प्रांत नहीं रहा, बल्कि वह पाकिस्तान के लिए ऐसा जख्म बन चुका है जो हर दिन और गहरा होता जा रहा है।
ALSO READ: Union Budget पर BJP की मैथिली ठाकुर का समर्थन, NEET केस में त्वरित न्याय की मांग
पिछले कई दशकों से पाकिस्तान बलूचिस्तान को केवल संसाधनों की खान और सामरिक नक्शे के एक टुकड़े की तरह देखता रहा है। गैस, खनिज, बंदरगाह और अब चीन के साथ अरबों डॉलर की डील सब कुछ बलूचिस्तान की जमीन पर, लेकिन बदले में बलूच लोगों को क्या मिला? गरीबी, बेरोजगारी, सैन्य दमन और राजनीतिक हाशियाकरण। यही वह ज़मीन है, जहां से गुस्सा पैदा हुआ और यही गुस्सा अब बंदूक और बम बनकर इस्लामाबाद को चुनौती दे रहा है।

वीकेंड के दौरान जो हुआ, उसने पाकिस्तान के सुरक्षा राज्य होने के दावे की पोल खोल दी। 17 सुरक्षाकर्मी और करीब 50 नागरिकों की मौत सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, ये उस विफलता की गवाही हैं जिसमें सेना, आईएसआई और सरकार तीनों मिलकर भी अपने ही नागरिकों को सुरक्षित नहीं रख पा रहे। बाजारों का उजड़ना, सड़कों का तबाह होना और आम लोगों का घरों में कैद हो जाना यह किसी युद्धग्रस्त देश की तस्वीर लगती है, न कि एक ऐसे देश की जो खुद को परमाणु शक्ति और क्षेत्रीय ताकत बताता है।
ALSO READ: बजट 2026 में मेगा टेक्सटाइल पार्क्स, पारंपरिक क्लस्टर्स को मजबूती
इन हमलों की जिम्मेदारी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने ली और यह जिम्मेदारी महज औपचारिक बयान तक सीमित नहीं रही। आत्मघाती हमलावरों की तस्वीरें जारी कर, उनमें महिलाओं की मौजूदगी दिखाकर, BLA ने साफ संदेश दिया कि यह सिर्फ सैन्य टकराव नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक युद्ध है। पाकिस्तान की सेना जिस समाज को अपने नियंत्रण में मानकर चल रही थी, वहीं से अब महिलाएं तक हथियार उठा रही हैं। यह संकेत है कि असंतोष जड़ों तक फैल चुका है।
पाकिस्तान हमेशा से बलूच विद्रोह को ‘विदेशी साजिश’ बताकर टालता रहा है। कभी भारत पर आरोप, कभी अफगानिस्तान का नाम, कभी पश्चिमी एजेंसियों की बात। लेकिन सवाल सीधा है अगर सब कुछ बाहर की साजिश है तो बलूचिस्तान में हर कुछ साल में विद्रोह क्यों फूट पड़ता है? क्यों हर पीढ़ी में नए विद्रोही पैदा हो जाते हैं? सच्चाई यह है कि समस्या की जड़ पाकिस्तान की अपनी नीतियों में है, जहां ताकत को समाधान समझ लिया गया और संवाद को कमजोरी।
ALSO READ: आर्थिक सर्वे 2025-26, युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत बनी मानसिक संकट
बलूचिस्तान का इतिहास पाकिस्तान के लिए असहज सच है। जबरन विलय, निर्वाचित नेताओं को हटाना, सैन्य ऑपरेशन, ‘गायब कर दिए गए लोग’ और सामूहिक कब्रों के आरोप ये सब केवल मानवाधिकार रिपोर्टों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बलूच समाज की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं। जिस राज्य से न्याय की उम्मीद खत्म हो जाती है, वहां बंदूक अपने आप भाषा बन जाती है।

इन हालात में पाकिस्तान सरकार और सेना पर उठ रहे सवाल पूरी तरह जायज हैं। एक साथ 12 जगहों पर हमला, वह भी ऐसे समय में जब सुरक्षा एजेंसियां हर वक्त हाई अलर्ट का दावा करती हैं यह खुफिया तंत्र की नाकामी नहीं तो और क्या है? विपक्ष सवाल पूछ रहा है, लेकिन असल में सत्ता के गलियारों में भी डर साफ दिख रहा है। रावलपिंडी जानता है कि अगर बलूचिस्तान हाथ से निकल गया, तो पाकिस्तान की भौगोलिक और आर्थिक रीढ़ टूट जाएगी। (Balochistan Insurgency in Pakistan)
ALSO READ: बजट 2026 पर पीएम मोदी ने कही बडी बात, विकसित भारत की दिशा में रोडमैप
सबसे बड़ा झटका चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा को लग सकता है। अरबों डॉलर की परियोजनाएं, ग्वादर बंदरगाह और रणनीतिक सड़कें सब बलूचिस्तान से होकर गुजरती हैं। जब उसी जमीन पर राज्य का नियंत्रण कमजोर पड़ने लगे, तो चीन जैसे साझेदार भी सवाल पूछने लगते हैं। यही वजह है कि बलूच विद्रोह अब पाकिस्तान का सिर्फ आंतरिक मसला नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बनता जा रहा है। (Balochistan Insurgency in Pakistan)
पाकिस्तान की सबसे बड़ी भूल यह रही है कि उसने बलूच समस्या को हमेशा सिक्योरिटी इश्यू के चश्मे से देखा। हर बार जवाब में सेना भेजी गई, चेकपोस्ट बढ़ाए गए, ऑपरेशन चलाए गए, लेकिन भरोसा कभी नहीं बनाया गया। नतीजा यह हुआ कि बलूच युवा अपने भविष्य को पाकिस्तान के साथ नहीं, उसके खिलाफ देखने लगे। जब राज्य नागरिक को दुश्मन समझने लगे, तो नागरिक भी राज्य को अपना नहीं मानता। (Balochistan Insurgency in Pakistan)
ALSO READ: बजट 2026 में टैक्सपेयर्स को राहत, ITR-1 और ITR-2 की डेडलाइन 31 जुलाई तय
आज हालात ऐसे हैं कि बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बनता जा रहा है। यह कोई अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है, बल्कि दशकों की अनदेखी और दमन का नतीजा है। बलूच विद्रोही संगठनों की रणनीति में बदलाव, आत्मघाती हमले, महिलाओं की भागीदारी और एक साथ कई इलाकों में हमले ये सब संकेत हैं कि संघर्ष नया और ज्यादा खतरनाक मोड़ ले रहा है। (Balochistan Insurgency in Pakistan)
अब सवाल यह नहीं है कि पाकिस्तान बलूचिस्तान में कितने और सैनिक भेजेगा, बल्कि सवाल यह है कि क्या वह कभी बलूच लोगों को बराबरी का नागरिक मानने को तैयार होगा? क्या संसाधनों पर स्थानीय हक, राजनीतिक स्वायत्तता और सम्मानजनक संवाद की बात होगी, या फिर हर बार की तरह बंदूक ही जवाब बनेगी? इतिहास गवाह है कि ताकत से असंतोष को दबाया जा सकता है, खत्म नहीं किया जा सकता।
ALSO READ: 9वीं बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रचा इतिहास, जानिए 10 बड़े बदलाव
अगर पाकिस्तान ने अब भी सबक नहीं लिया, तो बलूचिस्तान सिर्फ एक अशांत प्रांत नहीं रहेगा, बल्कि वह पाकिस्तान की एकता, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय साख के लिए स्थायी संकट बन जाएगा। यह खून से सना वीकेंड दरअसल एक चेतावनी है एक आखिरी अलार्म। सवाल यह है कि इस्लामाबाद इसे सुनेगा या हमेशा की तरह अनसुना कर देगा।
Follow Us: YouTube| TV TODAY BHARAT LIVE | Breaking Hindi News Live | Website: Tv Today Bharat| X | FaceBook | Quora| Linkedin | tumblr | whatsapp Channel | Telegram | Balochistan Insurgency in Pakistan
