India Russia oil imports: भारत के India Russia oil imports को लेकर एक बार फिर बहस तेज है। 2022 के बाद रूस भारत के बड़े कच्चा तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हुआ, लेकिन अमेरिका के प्रतिबंधों और डोनाल्ड ट्रंप के बयानों के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या भारत रूसी तेल आयात कम या बंद कर सकता है। सरकार का कहना है कि 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, जबकि विशेषज्ञ इसे आसान फैसला नहीं मानते।
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भारत-रूस तेल संबंध पृष्ठभूमि (India Russia oil imports)
भारत और रूस के रिश्ते दशकों पुराने हैं। रक्षा और रणनीतिक सहयोग के साथ-साथ ऊर्जा क्षेत्र में भी दोनों देशों की साझेदारी रही है। हालांकि, 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों से रूसी कच्चा तेल छूट पर उपलब्ध हुआ और भारत ने इसे बड़े पैमाने पर खरीदा। नतीजतन, आयात 2025 के मध्य में 20 लाख बैरल प्रतिदिन से ऊपर तक पहुंच गया। इसके अलावा, यह तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए तकनीकी रूप से भी अनुकूल रहा, जिससे लागत कम हुई और ईंधन कीमतों पर दबाव घटा।
अमेरिकी दबाव और ट्रंप के दावे
वहीं दूसरी ओर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में दावा किया कि भारत रूसी तेल खरीद कम करेगा। व्हाइट हाउस ने यह भी संकेत दिया कि भारत अमेरिकी और वेनेजुएला के तेल विकल्पों पर विचार कर सकता है। हालांकि, भारत सरकार ने किसी आधिकारिक प्रतिबंध या पूर्ण कटौती की पुष्टि नहीं की है। विदेश मंत्रालय का साफ कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही सभी फैसले होंगे।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा की मजबूरी (India Russia oil imports)
भारत अपनी कुल कच्चा तेल जरूरत का करीब 88% आयात करता है। ऐसे में किसी एक बड़े सप्लायर से अचानक दूरी बनाना जोखिम भरा हो सकता है। खास बात यह है कि रूसी ‘यूराल्स’ ग्रेड तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त है, जबकि अमेरिकी शेल ऑयल हल्का होता है और उसे ब्लेंडिंग की जरूरत पड़ती है, जिससे लागत बढ़ती है। इसी क्रम में विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल आर्थिक नहीं, बल्कि तकनीकी कारणों से भी रूस से तेल आयात पूरी तरह बंद करना मुश्किल है।
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क्या भारत ने विकल्प तैयार किए हैं?
इसके अलावा, भारत ने बीते दो वर्षों में अपने कच्चा तेल आपूर्तिकर्ताओं की संख्या बढ़ाई है। पहले जहां 27 देशों से आयात होता था, अब यह संख्या 40 से अधिक हो गई है। अमेरिका, ब्राजील, गुयाना और पश्चिम अफ्रीका के देश इसमें शामिल हैं। हालांकि, इतनी बड़ी मात्रा—लगभग 17 लाख बैरल प्रतिदिन को तुरंत दूसरे स्रोतों से पूरा करना आसान नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका के पास फिलहाल इतनी निर्यात क्षमता नहीं है कि वह रूस की जगह पूरी तरह ले सके।
वेनेजुएला विकल्प, कितना व्यावहारिक?
साथ ही, वेनेजुएला से तेल आयात पर भी चर्चा है। भारत पहले भी वहां से तेल खरीदता रहा है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इसमें रुकावट आती रही है। अगर भविष्य में अनुमति मिलती है, तो कुछ मात्रा में आपूर्ति संभव है, मगर यह भी रूस की भरपाई नहीं कर पाएगी।
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रूस के लिए भारत का महत्व (India Russia oil imports)
रूस की ओर से भी संकेत मिले हैं कि भारत अगर कुछ हद तक विविधीकरण करता है तो रिश्तों पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा। मॉस्को समझता है कि नई दिल्ली भू-राजनीतिक दबावों के बीच संतुलन साध रही है। रक्षा, उर्वरक और ऊर्जा निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग जारी रहने की संभावना है।
विशेषज्ञों की राय ? (India Russia oil imports)
ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि रूस से अचानक दूरी बनाने पर भारत में ईंधन कीमतों में उछाल आ सकता है। इसके अलावा, रूस अपना तेल अन्य बाजारों खासकर चीन को बेच सकता है, जिससे वैश्विक तेल व्यापार में अस्थिरता बढ़ेगी। ऐसे में अमेरिका का यह तर्क भी कमजोर पड़ता है कि भारत की खरीद से रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था को सीधा फायदा हो रहा है।
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क्या भारत रूस से तेल आयात पूरी तरह काट सकता है?
खास बात यह है कि भारत के लिए रूस से कच्चा तेल आयात पूरी तरह बंद करना फिलहाल न तो आसान है और न ही व्यावहारिक। संभव है कि भारत धीरे-धीरे आयात में कटौती करे और नए स्रोत जोड़े, लेकिन अचानक फैसला ऊर्जा सुरक्षा के लिए जोखिम भरा होगा। भारत की नीति हमेशा संतुलित रही है चाहे अमेरिका हो या रूस। आने वाले समय में भी रणनीति यही होगी कि अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच देश की आर्थिक और ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता दी जाए।
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