Iran US Israel War: मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक राजनीति को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा किया है। Iran US Israel War के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि अधिकांश मुस्लिम देश खुलकर तेहरान के समर्थन में क्यों नहीं आए। हमलों की निंदा तो कई राजधानियों से हुई, लेकिन प्रत्यक्ष सैन्य या राजनीतिक समर्थन बेहद सीमित दिखाई दिया।
Iran US Israel War में विश्लेषकों का मानना है कि यह “चुप्पी” दरअसल रणनीतिक गणित का हिस्सा है जहां धार्मिक पहचान से अधिक भू-राजनीतिक हित और सुरक्षा समीकरण अहम भूमिका निभाते हैं।
1979 के बाद से वैचारिक टकराव (Iran US Israel War)
Iran और Israel के बीच वैचारिक संघर्ष 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से गहराता गया। तेहरान ने खुद को पश्चिमी प्रभाव के खिलाफ प्रतिरोध की धुरी के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि तेल अवीव ने ईरान की क्षेत्रीय सक्रियता को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताया।
हालिया हमलों और जवाबी कार्रवाई ने इस पुराने टकराव को खुले सैन्य तनाव का रूप दे दिया है। ऐसे माहौल में कई मुस्लिम देशों ने सावधानीपूर्ण रुख अपनाया है।
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शिया-सुन्नी समीकरण और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा
Iran US Israel War में मुस्लिम देशों की दूरी के पीछे एक अहम कारण शिया-सुन्नी शक्ति संतुलन भी है। Iran शिया नेतृत्व का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जबकि Saudi Arabia सुन्नी दुनिया में प्रभावशाली भूमिका निभाता है। दोनों देशों के बीच दशकों से क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा रही है।
खाड़ी देशों को आशंका रहती है कि ईरान की बढ़ती क्षेत्रीय सक्रियता उनके सुरक्षा हितों को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि कई अरब राष्ट्र खुलकर किसी सैन्य धड़े में शामिल होने से बच रहे हैं।
मिलिटेंट संगठनों से जुड़ाव पर आरोप
ईरान पर लंबे समय से Hezbollah, Hamas और Houthi movement जैसे संगठनों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। खाड़ी देशों और पश्चिमी राष्ट्रों का मानना है कि इन समूहों की सक्रियता ने क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाई है।
हालांकि तेहरान इन आरोपों को क्षेत्रीय राजनीति का हिस्सा बताता है, लेकिन यह धारणा कई मुस्लिम सरकारों को सतर्क बनाए रखती है।
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आंतरिक चुनौतियां और आर्थिक हित
मिडिल ईस्ट के कई देश पहले से आर्थिक और राजनीतिक दबाव झेल रहे हैं। Iraq और Syria लंबे समय से अस्थिरता का सामना कर रहे हैं, जबकि Lebanon आर्थिक संकट से गुजर रहा है।
ऐसे में कोई भी सरकार खुले सैन्य समर्थन का जोखिम नहीं लेना चाहती। इसके अलावा, कई देशों के अमेरिका के साथ रक्षा और व्यापारिक समझौते भी हैं, जो उनके रुख को संतुलित बनाते हैं।

पाकिस्तान और तुर्किए का संतुलन
Pakistan ने हमलों पर चिंता जताई और संयम की अपील की, लेकिन प्रत्यक्ष समर्थन से दूरी बनाए रखी। इस्लामाबाद के लिए अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ संबंध भी महत्वपूर्ण हैं।
वहीं Turkey ने भी तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया। अंकारा ने क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता बताया है।
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मुस्लिम वर्ल्ड लीग और अन्य संगठनों की प्रतिक्रिया
Muslim World League ने सैन्य टकराव पर चिंता जताई और शांति की अपील की। हालांकि उसने भी किसी पक्ष का खुला समर्थन नहीं किया।
यह संकेत देता है कि धार्मिक एकजुटता से अधिक रणनीतिक हित प्राथमिकता बन गए हैं।
वैश्विक शक्तियों की भूमिका (Iran US Israel War)
China ने तत्काल युद्धविराम और वार्ता की अपील की है। यह दिखाता है कि संकट केवल धार्मिक आयाम तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री मार्गों और सुरक्षा समीकरणों से भी जुड़ा है।
क्या ईरान कूटनीतिक रूप से अलग-थलग?
Iran US Israel War से विशेषज्ञों का मानना है कि आक्रामक क्षेत्रीय नीति की छवि, पश्चिमी प्रतिबंध और प्रतिस्पर्धी शक्ति समीकरणों ने ईरान को इस संकट में अपेक्षाकृत अकेला कर दिया है। हालांकि कई देश हमलों की आलोचना कर रहे हैं, लेकिन वे प्रत्यक्ष सैन्य गठबंधन से दूरी बनाए रखना चाहते हैं।
Iran US Israel War से तेल बाजार की स्थिरता, रक्षा समझौते और आंतरिक राजनीतिक संतुलन ये सभी कारक मुस्लिम देशों के रुख को प्रभावित कर रहे हैं।
निष्कर्ष
Iran US Israel War के मौजूदा चरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धार्मिक पहचान से परे भू-राजनीतिक हित अधिक निर्णायक हो चुके हैं। मुस्लिम देशों की सावधानी भरी चुप्पी बताती है कि वे क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक हितों और वैश्विक संबंधों के बीच संतुलन साधना चाहते हैं।
आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास यह तय करेंगे कि यह संकट सीमित दायरे में रहता है या व्यापक क्षेत्रीय टकराव में बदलता है। फिलहाल, ईरान की कूटनीतिक तन्हाई और मुस्लिम देशों की रणनीतिक दूरी ही इस संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण कहानी बनकर उभरी है।
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