Vibhishana Temple Rajasthan: राजस्थान के कोटा जिले के ऐतिहासिक कस्बे Kaithoon में स्थित विभीषण मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं और पौराणिक कथाओं के कारण देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। मान्यता है कि यह मंदिर करीब 5000 साल पुराना है और दुनिया में भगवान राम के भक्त तथा रावण के भाई Vibhishana को समर्पित इकलौता मंदिर माना जाता है। हर साल यहां धुलेंडी के मौके पर लगने वाला विभीषण मेला स्थानीय संस्कृति और आस्था का बड़ा केंद्र बन जाता है।
इस वर्ष भी परंपरा के अनुसार मेले का आयोजन भव्य तरीके से किया गया। राजस्थान सरकार के मंत्री Madan Dilawar ने मेले का उद्घाटन किया और परंपरागत रूप से हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया गया। यह मेला पिछले कई दशकों से यहां आयोजित किया जा रहा है और हर साल हजारों श्रद्धालु इसमें भाग लेने पहुंचते हैं।
देव विमान शोभायात्रा से होती है मेले की शुरुआत
Vibhishana Mela की शुरुआत आसपास के मंदिरों से निकलने वाली देव विमान शोभायात्रा से होती है। विभिन्न मंदिरों से देव प्रतिमाओं को सजे-धजे विमानों में बैठाकर जुलूस के रूप में मेला स्थल तक लाया जाता है। श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों, भजन-कीर्तन और धार्मिक नारों के साथ इस शोभायात्रा में शामिल होते हैं।
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Vibhishana Mela स्थल पर पहुंचने के बाद विभीषण मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद धार्मिक अनुष्ठानों और आतिशबाजी के बीच हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है। इस परंपरा को देखने के लिए दूर-दूर से लोग कैथून पहुंचते हैं।
होलिका दहन के बाद क्यों जलाया जाता है हिरण्यकश्यप का पुतला?
Vibhishana Mela की सबसे खास परंपरा यह है कि यहां होलिका दहन के अगले दिन हिरण्यकश्यप का पुतला जलाया जाता है। यह परंपरा प्राचीन पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है।
कथा के अनुसार, जब होलिका अग्नि में जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बच गए, तब उनके पिता Hiranyakashipu क्रोधित हो उठे। उन्होंने प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया, लेकिन तभी भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया और अपने भक्त की रक्षा की। इसी घटना की स्मृति में कैथून में धुलेंडी के दिन हिरण्यकश्यप का पुतला दहन करने की परंपरा निभाई जाती है।

5000 साल पुराना माना जाता है मंदिर
स्थानीय लोगों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर हजारों वर्षों पुराना है। माना जाता है कि यह दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां विभीषण की पूजा की जाती है।
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मंदिर (Vibhishana Temple Rajasthan) का वर्तमान स्वरूप हालांकि बाद के समय में विकसित हुआ। इतिहासकारों के अनुसार इसका पुनर्निर्माण 18वीं शताब्दी में हुआ था। उस समय कोटा रियासत के शासक Umed Singh I ने 1770 से 1821 के बीच मंदिर के निर्माण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शिव और हनुमान से जुड़ी है मंदिर की कथा
इस मंदिर (Vibhishana Temple Rajasthan) से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। मान्यता है कि भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद Shiva ने मृत्युलोक की यात्रा करने की इच्छा व्यक्त की।
तब विभीषण ने भगवान शिव और Hanuman को कांवड़ में बैठाकर यात्रा कराने का संकल्प लिया। शिव ने एक शर्त रखी कि जहां भी कांवड़ का कोई हिस्सा जमीन को छुएगा, यात्रा वहीं समाप्त हो जाएगी।
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कहा जाता है कि यात्रा के दौरान विभीषण का पैर कैथून में धरती पर पड़ गया और उसी क्षण यात्रा समाप्त हो गई। इसके बाद जहां-जहां कांवड़ के अन्य हिस्से गिरे, वहां मंदिर स्थापित किए गए।
तीन स्थानों से जुड़ी है कथा
मान्यता के अनुसार कांवड़ का एक सिरा कोटा के रंगबाड़ी क्षेत्र में गिरा, जहां बाद में हनुमान मंदिर स्थापित हुआ। दूसरा हिस्सा चौरचौमा नामक स्थान पर गिरा, जहां शिव मंदिर बनाया गया। वहीं जिस स्थान पर विभीषण का पैर पड़ा, वहां यह विभीषण मंदिर स्थापित किया गया। इस तरह कैथून, रंगबाड़ी और चौरचौमा तीनों स्थान इस पौराणिक कथा से जुड़े हुए माने जाते हैं।

प्रतिमा का सिर्फ ऊपरी हिस्सा ही दिखाई देता है
Vibhishana Temple Rajasthan की सबसे अनोखी बात यहां स्थापित प्रतिमा है। मंदिर में लगी प्रतिमा का केवल धड़ से ऊपर का हिस्सा ही दिखाई देता है, जबकि नीचे का भाग भूमि के भीतर माना जाता है।
यही कारण है कि यह प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाती है। लोग दूर-दूर से यहां दर्शन करने आते हैं और इस अनोखी प्रतिमा को देखने के लिए उत्सुक रहते हैं।
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मेले का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
Vibhishana Mela के उद्घाटन के दौरान मंत्री मदन दिलावर ने कहा कि विभीषण एक ऐसे पात्र हैं जिन्होंने धर्म के पक्ष में खड़े होकर अपने ही भाई रावण का साथ छोड़ दिया था। उन्होंने इसे सत्य और धर्म की जीत का प्रतीक बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मेले भारतीय संस्कृति की पहचान हैं। ये आयोजन न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करते हैं बल्कि समाज में आपसी मेलजोल और सांस्कृतिक एकता को भी बढ़ावा देते हैं।
हर साल आयोजित होने वाला विभीषण मेला इसी परंपरा और आस्था का प्रतीक बन चुका है, जो इतिहास, पौराणिक मान्यताओं और लोक संस्कृति को एक साथ जोड़ता है।
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