Indus Waters Treaty: Map highlighting the Indus River system with India and Pakistan, alongside symbolic flags of the United States, Russia and China representing international treaty precedents|PHOTO AI
Indus Waters Treaty पर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद एक बार फिर वैश्विक चर्चा का विषय बना हुआ है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को अस्थायी रूप से निलंबित करने का निर्णय लिया, जिसके बाद पाकिस्तान ने इसका विरोध दर्ज कराया।
हालांकि भारत का तर्क है कि जब National Security, International Law, Water Dispute, Terrorism, Strategic Interest जैसे गंभीर मुद्दे सामने हों, तब किसी भी देश को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने का अधिकार है। यही दलील दुनिया की कई बड़ी शक्तियां भी अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय समझौतों के संदर्भ में दे चुकी हैं।
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आतंकवाद पर चुप, समझौते पर शोर
Indus Waters Treaty को लेकर पाकिस्तान लगातार भारत पर आरोप लगा रहा है कि नई दिल्ली इस समझौते का पालन नहीं कर रही है। दूसरी ओर भारत का कहना है कि पाकिस्तान दशकों से सीमा पार आतंकवाद को रोकने में विफल रहा है।
Security Policy, Cross Border Terrorism, Diplomacy, Global Politics, Bilateral Relations जैसे मुद्दों पर भारत का मानना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते की सफलता दोनों पक्षों की जिम्मेदारी पर निर्भर करती है। यदि एक पक्ष लगातार सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करे, तो दूसरा पक्ष अपनी रणनीति की समीक्षा कर सकता है।
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सिंधु जल समझौता क्या है?
Indus Waters Treaty वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ था। इसके तहत रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का अधिकांश उपयोग भारत को तथा सिंधु, झेलम और चेनाब का प्रमुख उपयोग पाकिस्तान को दिया गया। River System, Water Sharing, World Bank, International Agreement, South Asia की दृष्टि से यह दुनिया के सबसे चर्चित जल समझौतों में गिना जाता है। भारत ने समय-समय पर यह भी कहा है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की परिस्थितियों में इस समझौते की समीक्षा आवश्यक हो सकती है।
अमेरिका ने भी राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी
Indus Waters Treaty पर भारत जिस सिद्धांत की बात करता है, उसका एक उदाहरण अमेरिका भी है। वर्ष 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर निकाल लिया। JCPOA, Nuclear Deal, United States, Foreign Policy, Sanctions से जुड़े इस फैसले का तर्क यह था कि समझौता अमेरिका और उसके सहयोगियों की सुरक्षा चिंताओं का पर्याप्त समाधान नहीं करता। अमेरिका ने इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के अनुरूप नहीं माना और समझौते से अलग होने का निर्णय लिया।
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रूस और INF संधि का मामला
Indus Waters Treaty पर बहस के दौरान रूस और अमेरिका के बीच हुई INF संधि का उदाहरण भी सामने आता है। वर्ष 1987 की यह संधि मध्यम दूरी की परमाणु मिसाइलों पर प्रतिबंध लगाने के लिए बनी थी। बाद में दोनों देशों ने एक-दूसरे पर उल्लंघन के आरोप लगाए। INF Treaty, Russia, Missile System, NATO, Arms Control से जुड़े विवाद के बीच अमेरिका 2019 में संधि से हट गया और उसके बाद रूस ने भी अपनी प्रतिबद्धताओं को समाप्त कर दिया। दोनों देशों ने बदलते सुरक्षा माहौल को इसका आधार बताया।
चीन ने UNCLOS के फैसले को नहीं माना
Indus Waters Treaty पर भारत के समर्थक विशेषज्ञ चीन का उदाहरण भी देते हैं। दक्षिण चीन सागर विवाद में 2016 में अंतरराष्ट्रीय पंचाट ने फिलीपींस के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन चीन ने उसे स्वीकार नहीं किया। UNCLOS, South China Sea, Arbitration, Sovereignty, Maritime Rights जैसे मुद्दों पर चीन का कहना था कि संबंधित ट्रिब्यूनल को इस विवाद पर फैसला देने का अधिकार ही नहीं था। इसके बाद भी चीन ने अपने दावे और गतिविधियां जारी रखीं।
भारत का कानूनी और रणनीतिक पक्ष
Indus Waters Treaty को लेकर भारत के कई रक्षा एवं रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में केवल कानूनी प्रावधान ही निर्णायक नहीं होते। Strategic Affairs, National Interest, Security Doctrine, International Relations, Defence Policy जैसे पहलुओं को भी बराबर महत्व दिया जाता है। पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल पी.आर. शंकर सहित कई विशेषज्ञ सार्वजनिक मंचों पर यह राय रख चुके हैं कि जब राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रत्यक्ष खतरा हो, तब देश अपने हितों के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार रखते हैं।
पाकिस्तान किन विकल्पों का सहारा ले सकता है?
Indus Waters Treaty के संदर्भ में पाकिस्तान विश्व बैंक या अन्य अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंचों का रुख कर सकता है। हालांकि ऐसे मामलों में अंतिम परिणाम केवल कानूनी दलीलों से तय नहीं होते। International Court, Arbitration, Global Diplomacy, Treaty Law, Water Conflict जैसे विषयों में राजनीतिक परिस्थितियां, सुरक्षा चिंताएं और दोनों देशों का व्यवहार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए यह मामला केवल जल बंटवारे का नहीं बल्कि व्यापक रणनीतिक और सुरक्षा विमर्श का भी हिस्सा बन चुका है।
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भारत और पाकिस्तान के बीच जारी विवाद
Indus Waters Treaty पर भारत और पाकिस्तान के बीच जारी विवाद केवल एक जल समझौते का विवाद नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का भी प्रश्न है। अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों के उदाहरण यह दिखाते हैं कि जब किसी सरकार को लगता है कि उसकी सुरक्षा या रणनीतिक प्राथमिकताएं प्रभावित हो रही हैं, तो वह अंतरराष्ट्रीय समझौतों की समीक्षा या उनसे अलग होने का रास्ता चुन सकती है। हालांकि प्रत्येक मामला अपनी कानूनी और तथ्यात्मक परिस्थितियों के आधार पर अलग होता है।
भारत का पक्ष भी इसी व्यापक संदर्भ में राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़ी चिंताओं पर आधारित है, जबकि अंतिम कानूनी और कूटनीतिक परिणाम संबंधित अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं और दोनों देशों के भविष्य के रुख पर निर्भर करेंगे।
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