Devkinandan Thakur Babri Dispute Statement: जयपुर में कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने एक बार फिर अपने तीखे और स्पष्ट शब्दों से सामाजिक-धार्मिक विमर्श को नया आयाम दे दिया है। हाल ही में एक कथा के दौरान उन्होंने कहा कि ‘बिना तिलक कथा में घुसने नहीं देंगे’ यह वाक्य मात्र आस्था का आग्रह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और परंपरा के सम्मान का एक सशक्त संदेश बनकर सामने आया। उनके अनुसार, कथा केवल मनोरंजन का मंच नहीं, बल्कि एक पवित्र आध्यात्मिक स्थल है, जहां प्रवेश करने से पहले श्रद्धा और संस्कृति का सम्मान जरूरी है।
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तिलक परंपरा को लेकर देवकीनंदन ठाकुर का स्पष्ट संदेश
देवकीनंदन ठाकुर का ये बयान ऐसे समय पर आया जब जयपुर में 15 से 21 दिसंबर तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन होना है। उन्होने अपना स्पष्ट शैली का प्रयोग करते हुए साफ कहा, जो भी श्रद्धालु कथा में तिलक लगाकर नहीं आएगा, उसे कथा स्थल पर एंट्री नहीं मिलेगी।
देवकीनंदन ठाकुर ने अपने संबोधन में बाबरी विवाद का उल्लेख करते हुए भी बेहद मार्मिक और तथ्यपूर्ण बात कही। उन्होंने प्रश्न उठाया कि जब देश को मिसाइल मैन डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसा प्रेरणादायक व्यक्तित्व मिला, जो पूरी दुनिया में भारत की विज्ञान, प्रतिभा और विनम्रता की पहचान बने, तो फिर क्यों कुछ लोग बाबर बनने की जिद में हैं एक ऐसा नाम, जो इतिहास में संघर्ष, विवाद और पीड़ा से जुड़ा रहा? ठाकुर का यह संदेश केवल तुलना भर नहीं, बल्कि विचार-जागरण का प्रयास था कि समाज को अपना प्रेरणास्रोत उन लोगों में ढूंढ़ना चाहिए जिन्होंने राष्ट्र को ऊँचा उठाया, न कि उन नामों में जिनकी पहचान विभाजनकारी रही।
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अब्दुल कलाम बनाम बाबर, कथावाचक का तीखा सवाल
उन्होंने आगे कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा समावेश और करुणा पर आधारित है। यहां कथा, कीर्तन और धर्मसभा केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का माध्यम भी हैं। इसलिए इन जगहों पर प्रवेश करते समय भारतीय संस्कृति के मूल भाव श्रद्धा का पालन होना चाहिए। तिलक लगाने की परंपरा भी इसी भाव से जन्मी है। यह केवल माथे पर लगा एक चिह्न नहीं, बल्कि यह संकेत है कि व्यक्ति मन, वचन और कर्म से पवित्र भाव के साथ कथा-मंडप में आया है।
देवकीनंदन ठाकुर ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी को अपमानित करना नहीं, बल्कि उन मूल्यों की रक्षा करना है जिन पर भारतीय सभ्यता खड़ी है। उन्होंने कहा कि समाज तब ही मजबूत बनता है जब वह अपनी जड़ों, परंपराओं और संस्कारों को महत्व देता है। कथा में तिलक लगाने का आग्रह दरअसल उस आचरण का प्रतीक है, जो मनुष्य को अनुशासन, मर्यादा और आदर की राह पर ले जाता है।
कथा स्थल को आस्था और अनुशासन का पवित्र मंच बताया
बाबरी मुद्दे पर बोलते हुए उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि आखिर देश को ऐसे विवादों में उलझाए रखने की जरूरत क्यों पड़ती है, जबकि हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहां विज्ञान, तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को आगे बढ़ने की चुनौती है। उन्होंने कहा कि भारत ने सदियों से आक्रमण और संघर्ष झेले, लेकिन आज देश के सामने नई जिम्मेदारियाँ हैंएक नए भारत का निर्माण, जहां विकास, शिक्षा, विज्ञान और अध्यात्म समानांतर चलें।
बाबरी विवाद पर बोले, विवाद नहीं, प्रेरणा की जरूरत
देवकीनंदन ठाकुर के इन वक्तव्यों ने उनके अनुयायियों और श्रोताओं के बीच नई चर्चा छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर भी उनके विचार तेजी से वायरल हो रहे हैं। बहुत से लोग उनकी स्पष्टवादिता की सराहना कर रहे हैं, जबकि कुछ इसे कठोर भी बता रहे हैं। लेकिन इतना जरूर है कि ठाकुर की बातों ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है—आधुनिक भारत अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को किस रूप में आगे बढ़ाए? और क्या समाज को प्रेरणा उन लोगों से लेनी चाहिए जिन्होंने राष्ट्र की छवि बनाई या उनसे जिनके नाम विघटन से जुड़े हैं?
अंत में, देवकीनंदन ठाकुर का यही संदेश उभरकर सामने आया कि भारत को आगे बढ़ना है तो अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए, आदर्श व्यक्तित्वों से प्रेरणा लेते हुए, और सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखते हुए ही बढ़ना होगा। उनका यह बयान सिर्फ एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि नए भारत के लिए चिंतन का आमंत्रण है।
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