Hindu New Year vs Western New Year: जनवरी का महीना आते ही भारत के शहरों में जश्न का शोर तेज़ हो जाता है। नए साल का काउंटडाउन, केक, पार्टी, म्यूज़िक और सोशल मीडिया पर बधाइयों की बाढ़ सब कुछ अचानक यह आभास कराने लगता है कि मानो यही असली नववर्ष हो। इसके साथ ही दिसंबर के अंत में क्रिसमस का बढ़ता क्रेज, सजे हुए मॉल, सांता क्लॉज और ऑफ़र्स की चमक एक गंभीर सवाल छोड़ जाती है क्या यह सिर्फ उत्सव है, या धीरे-धीरे हमारी सांस्कृतिक स्मृति का विस्थापन?
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ग्लोबल भारत का दृष्टिकोण, विरोध नहीं, आत्ममंथन
यह बहस किसी धर्म या पर्व के विरोध की नहीं है। समस्या क्रिसमस मनाने या 1 जनवरी को जश्न करने से नहीं, बल्कि तब पैदा होती है जब एक सभ्यता अपने ही कैलेंडर, अपने ही पर्व और अपने ही नववर्ष को भूलने लगती है। ग्लोबल भारत की दृष्टि से सवाल यह है कि क्या वैश्विक सुविधा को सांस्कृतिक पहचान बना लेना विवेकपूर्ण है?
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अज्ञान से उपजता खतरा
आज करोड़ों लोग 1 जनवरी को पूरे उत्साह से नया साल मनाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि सनातन परंपरा में नया साल कब और क्यों होता है। यह अज्ञान धीरे-धीरे खतरे का रूप लेता है, क्योंकि जब स्मृति खत्म होती है, तब संस्कृति कमजोर पड़ती है—बिना किसी बाहरी हमले के, सिर्फ विस्मृति के जरिए।
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सनातन नववर्ष, प्रकृति के साथ तालमेल
सनातन परंपरा में नववर्ष पश्चिमी कैलेंडर से नहीं, बल्कि प्रकृति, सूर्य और ऋतुचक्र से तय होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को विक्रम संवत का आरंभ माना जाता है यही दिन महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, कर्नाटक में युगादी और उत्तर भारत में नवसंवत्सर के रूप में मनाया जाता है। यह नववर्ष वसंत ऋतु के आगमन, नई फसल और नए जीवन-चक्र के साथ जुड़ा है। यानी यह सिर्फ तारीख नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है समय को प्रकृति के साथ जोड़ने का दृष्टिकोण।
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आयातित नववर्ष बनाम सांस्कृतिक पहचान
जनवरी का नया साल ग्रेगोरियन कैलेंडर पर आधारित है जो प्रशासनिक और वैश्विक जरूरतों के लिए उपयोगी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक सुविधा को सांस्कृतिक पहचान बना लेना चाहिए? आधुनिकता का अर्थ अपनी परंपरा को पीछे छोड़ देना नहीं होता।
क्रिसमस का बढ़ता क्रेज और बाज़ार का प्रभाव
क्रिसमस एक धार्मिक पर्व है और उसका सम्मान होना चाहिए। भारत की सभ्यता ने हमेशा विविधताओं को जगह दी है। समस्या तब आती है जब बाज़ार, मीडिया और ग्लैमर किसी एक पर्व को इतना हावी कर देते हैं कि अपने पर्व हाशिये पर चले जाते हैं। आज बच्चे जानते हैं कि सांता क्या लाता है, पर यह नहीं जानते कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा क्यों महत्वपूर्ण है। यही असंतुलन सांस्कृतिक विस्मृति को जन्म देता है।
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संस्कृति बनाम कंज़म्प्शन
पश्चिमी नववर्ष आज उपभोक्तावादी उत्सव बन चुका है—डिस्काउंट, पार्टी, ट्रैवल और ब्रांडिंग। इसके विपरीत, सनातन नववर्ष एक साधना है, स्वच्छता, संकल्प, पूजा, शस्त्र-पूजन, ग्रंथ-पूजन और समाज से जुड़ाव। यही फर्क है संस्कृति और कंज़म्प्शन के बीच।
उभरती शक्ति और आत्मविरोध का खतरा
दुनिया भारत की ओर योग, आयुर्वेद और आध्यात्म के लिए देख रही है। ऐसे समय में अगर भारत खुद अपनी कालगणना भूल जाए, तो यह आत्मविरोध जैसा प्रतीत होता है। ग्लोबल भारत का संदेश स्पष्ट है वैश्विक बनो, लेकिन जड़ों के साथ।
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समाधान, विरोध नहीं, पुनरुद्धार
समाधान किसी पर्व का विरोध नहीं, बल्कि अपने पर्व का पुनरुद्धार है। स्कूलों, मीडिया और समाज में यह बताना ज़रूरी है कि सनातन का नया साल कब और क्यों होता है। जब विकल्प मजबूत होगा, तो आकर्षण संतुलित हो जाएगा। क्रिसमस मनाइए, जनवरी में जश्न भी कीजिए लेकिन अपनी पहचान मत भूलिए। क्योंकि जो समाज अपना कैलेंडर भूल जाता है, वह धीरे-धीरे अपना चरित्र भी खो देता है। सनातन का नया साल सिर्फ तारीख नहीं, चेतना है। और अगर चेतना जागृत रही, तो कोई भी क्रेज, कोई भी ग्लैमर सनातन के अस्तित्व के लिए खतरा नहीं बन सकता।
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