Gig Worker Strike India: भारत की तेजी से बढ़ती गिग इकॉनमी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। क्रिसमस और न्यू ईयर जैसे हाई-डिमांड त्योहारों के बीच देशभर के डिलीवरी वर्कर्स ने हड़ताल का ऐलान कर दिया है। इस आंदोलन का असर उन करोड़ों उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है जो रोज़मर्रा की जरूरतों से लेकर त्योहारों की खरीदारी तक के लिए ऐप-आधारित सेवाओं पर निर्भर हैं। हड़ताल का आह्वान करने वाली यूनियनों का कहना है कि गिग वर्कर्स लास्ट-माइल लॉजिस्टिक्स की रीढ़ हैं, लेकिन उनके साथ काम की शर्तें लगातार खराब होती जा रही हैं।

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हड़ताल के दायरे में फ़ूड डिलीवरी और ई-कॉमर्स दोनों शामिल हैं। यानी अगर आंदोलन व्यापक रहा, तो Swiggy, Zomato, Zepto, Blinkit, Amazon और Flipkart जैसे बड़े प्लेटफ़ॉर्म पर ऑर्डर डिले, स्लॉट कम या अस्थायी रूप से बंद होने की स्थिति बन सकती है। हालांकि, हर शहर में समान असर होगा या नहीं, यह स्थानीय भागीदारी पर निर्भर करेगा।
इस हड़ताल के पीछे मुख्य भूमिका निभा रही हैं Telangana Gig and Platform Workers Union और Indian Federation of App-Based Transport Workers। यूनियनों का कहना है कि त्योहारों के समय जब प्लेटफ़ॉर्म्स सबसे ज़्यादा कमाई करते हैं, तब डिलीवरी पार्टनर्स पर काम का दबाव बढ़ा दिया जाता है, लेकिन प्रति ऑर्डर भुगतान घटता चला गया है। लंबी शिफ्ट, अनिश्चित काम के घंटे, और इंसेंटिव-आधारित मॉडल में लगातार बदलते नियमों के कारण वास्तविक आय का अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है।
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वर्कर्स का आरोप है कि अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी जैसे 10 मिनट में ऑर्डर पहुँचाने के मॉडल सुरक्षा से समझौता कराते हैं। सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ता है, लेकिन बीमा कवरेज और सुरक्षा उपकरण पर्याप्त नहीं हैं। इसके साथ ही, प्लेटफ़ॉर्म द्वारा बिना स्पष्ट कारण बताए अकाउंट सस्पेंड या ब्लॉक कर देना रोज़गार की अनिश्चितता को और बढ़ा देता है। कई वर्कर्स बताते हैं कि अपील की प्रक्रिया जटिल है और निर्णय पारदर्शी नहीं होते।
मांगों की सूची लंबी है, लेकिन उसका मूल एक ही है गरिमा और सुरक्षा। गिग वर्कर्स चाहते हैं कि भुगतान संरचना पारदर्शी हो, जो वास्तविक काम के घंटों, दूरी, ईंधन और रखरखाव जैसी लागतों को सही तरह से दर्शाए। वे यह भी चाहते हैं कि काम मिलने की न्यूनतम गारंटी हो, ताकि “ऑनलाइन रहने” के बावजूद खाली बैठने की मजबूरी न रहे। अनिवार्य आराम, हीट-रेन प्रोटेक्शन, हेलमेट-जैकेट जैसे सुरक्षा उपकरण, और बेहतर दुर्घटना बीमा को वे बुनियादी अधिकार मानते हैं।
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यह बहस केवल वेतन तक सीमित नहीं है, यह गिग इकॉनमी के भविष्य से जुड़ी है। भारत में लाखों युवा और प्रवासी कामगार ऐप-आधारित काम को रोज़गार का जरिया मान चुके हैं। प्लेटफ़ॉर्म्स उन्हें पार्टनर कहते हैं, लेकिन यूनियनों का तर्क है कि जब नियम, एल्गोरिदम और दंड एकतरफा तय होते हैं, तो पार्टनरशिप का दावा खोखला हो जाता है। इसी वजह से सोशल सिक्योरिटी जैसे पेंशन, हेल्थ इंश्योरेंस और मातृत्व लाभ को लेकर भी दबाव बढ़ रहा है।
उपभोक्ताओं के लिए सवाल यह है कि क्या सच में त्योहारों पर ऑर्डर ठप होंगे? ज़मीनी हकीकत यह है कि असर शहर-दर-शहर अलग हो सकता है। कुछ जगहों पर आंशिक सेवाएं चलती रह सकती हैं, तो कहीं पीक स्लॉट्स में डिलीवरी सीमित हो सकती है। प्लेटफ़ॉर्म्स अक्सर वैकल्पिक इंसेंटिव या अस्थायी व्यवस्थाओं से संचालन बनाए रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन व्यापक भागीदारी होने पर देरी और कैंसिलेशन की संभावना बढ़ जाती है।
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नीति-निर्माताओं के लिए यह चेतावनी है कि गिग इकॉनमी को अनदेखा करना अब मुमकिन नहीं। केंद्र और राज्यों में गिग वर्कर्स के लिए कानूनों पर चर्चा चल रही है, लेकिन ज़मीन पर असर धीमा है। यूनियनों की मांग है कि सरकारें न्यूनतम मानक तय करें—भुगतान, सुरक्षा और शिकायत निवारण के लिए ताकि प्लेटफ़ॉर्म प्रतिस्पर्धा के नाम पर वर्कर्स की सुरक्षा से समझौता न करें।
अंततः, यह टकराव एक संतुलन की मांग है तेज़, सस्ती और सुविधाजनक डिलीवरी बनाम सुरक्षित, सम्मानजनक और टिकाऊ रोज़गार। अगर बातचीत के ज़रिये समाधान नहीं निकला, तो आने वाले समय में ऐसी हड़तालें बढ़ सकती हैं। आज का बड़ा सवाल यही है क्या गिग इकॉनमी केवल ऐप्स की रफ्तार से चलेगी, या उन हाथों की सुरक्षा और अधिकारों के साथ, जो हर ऑर्डर को आपके दरवाज़े तक पहुंचाते हैं?
