India US trade Agreement 2026: India US trade Agreement 2026 के बाद भारत ने अपनी आयात नीति में एक बड़ा और रणनीतिक बदलाव करने का फैसला किया है। अब तक सोना और चांदी जैसे कीमती धातुओं के लिए बड़े पैमाने पर संयुक्त अरब अमीरात पर निर्भर रहने वाला भारत अब अमेरिका से आयात बढ़ाने की तैयारी में है। यह कदम केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि आर्थिक संतुलन और दीर्घकालिक रणनीति से जुड़ा हुआ है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह फैसला दोनों देशों के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते के तहत लिया गया है। इसका उद्देश्य आयात बास्केट में विविधता लाना, घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और अमेरिका के साथ व्यापार संतुलन सुधारना है।
UAE पर निर्भरता कम करने का फैसला
United Arab Emirates लंबे समय से भारत के लिए सोना-चांदी का प्रमुख स्रोत रहा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में शामिल है, और ज्वेलरी उद्योग देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। हालांकि, वैश्विक बाजार में बदलती परिस्थितियों और व्यापार संतुलन को ध्यान में रखते हुए भारत ने आयात स्रोतों में बदलाव का निर्णय लिया है। इससे न केवल एक देश पर निर्भरता कम होगी, बल्कि बेहतर कीमत और गुणवत्ता सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी।
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अमेरिका बनेगा नया प्रमुख साझेदार (India US trade Agreement 2026)
United States वैश्विक कीमती धातु व्यापार का बड़ा केंद्र है। वहां से कच्चे, रिफाइंड और स्क्रैप रूप में भारी मात्रा में सोना-चांदी निर्यात किया जाता है। अधिकारियों के अनुसार, अमेरिका से आयात बढ़ाने से भारत को प्रतिस्पर्धी कीमतों का लाभ मिलेगा। इससे घरेलू बाजार में सोना-चांदी की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों में स्थिरता आने की संभावना है।

घरेलू बाजार पर संभावित असर
भारत में सोने की मांग विशेष रूप से त्योहारों और विवाह सीजन में बढ़ जाती है। आयात स्रोतों में विविधता आने से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि India US trade Agreement 2026 से कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव कम हो सकता है। रत्न एवं आभूषण उद्योग, जो बड़े पैमाने पर निर्यात करता है, इस कदम से और अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकता है। इससे छोटे व्यापारियों और कारीगरों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है। India US trade Agreement 2026 केवल कीमती धातुओं तक सीमित नहीं है। कृषि क्षेत्र में भी इसका असर दिखाई देगा। भारत अमेरिका को लगभग 2.8 अरब डॉलर का कृषि निर्यात करता है, जबकि वहां से 1.5 अरब डॉलर का आयात करता है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका से आयात होने वाले कृषि उत्पादों को सख्त बायो-सिक्योरिटी मानकों का पालन करना होगा। जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) खाद्य पदार्थों की अनुमति नहीं दी जाएगी। इससे भारतीय किसानों के हित सुरक्षित रहेंगे।
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डेटा सेंटर उद्योग के लिए बड़ा अवसर
India US trade Agreement 2026 का एक अहम पहलू तकनीकी क्षेत्र से जुड़ा है। पहले एंटरप्राइज GPU सर्वर पर 20-28% तक आयात शुल्क लगता था। अब शुल्क दरों को तर्कसंगत बनाया गया है, जिससे GPU-रेडी डेटा सेंटर स्थापित करने की लागत में लगभग 14% तक कमी आ सकती है। यह कदम भारत को वैश्विक डेटा सेंटर हब के रूप में उभरने में मदद कर सकता है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार से निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
टैरिफ में कटौती से निर्यात को बढ़ावा
2024 में अमेरिका को भारत का कुल निर्यात 86.35 अरब डॉलर रहा। India US trade Agreement 2026 समझौते के तहत 30.94 अरब डॉलर मूल्य के निर्यात पर प्रभावी शुल्क को 50% से घटाकर 18% कर दिया गया है। इसके अलावा, 10.03 अरब डॉलर के उत्पादों पर शुल्क को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। India US trade Agreement 2026 से कपड़ा, चमड़ा, फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी और रत्न-आभूषण क्षेत्रों को सीधा लाभ मिलेगा। टैरिफ में कटौती से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करने का अवसर मिलेगा। छोटे उद्योगों के लिए निर्यात के नए रास्ते खुलेंगे, जिससे रोजगार सृजन में भी वृद्धि हो सकती है। यह समझौता तकनीकी सहयोग और निवेश प्रवाह को भी बढ़ावा देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है।
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दीर्घकालिक रणनीतिक महत्व
India US trade agreement 2026 केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। सोना-चांदी के आयात में बदलाव से लेकर तकनीकी सहयोग और टैरिफ कटौती तक, यह समझौता व्यापक प्रभाव डाल सकता है। UAE पर निर्भरता कम करने और अमेरिका के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने का यह फैसला भारत की वैश्विक व्यापार नीति में नई दिशा तय करता है। आने वाले वर्षों में इसका असर घरेलू कीमतों, निर्यात वृद्धि और निवेश प्रवाह में स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है। यह समझौता भारत की आर्थिक कूटनीति को और अधिक सशक्त बनाता है और वैश्विक बाजार में उसकी स्थिति को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकता है।
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