Processed food cancer risk: प्रिजर्वेटिव वाले प्रोसेस्ड फूड्स ज़्यादा खाने से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है यह लाइन सिर्फ एक वॉर्निंग नहीं, बाल्की आज के फास्ट लाइफस्टाइल का सबसे बड़ा हेल्थ अलार्म है। आज हम जो खा रहे हैं, वो सिर्फ भूख मिटाने की ज़रूरत नहीं रहा, बाल्की धीरे-धीरे हमारी बॉडी के सिस्टम पर असर डालने लगा है। चिप्स, पैकेज्ड स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स, फ्रोजन फूड्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स, बेकरी आइटम्स, सॉसेज, सलामी, और रेडी-टू-ईट मील्स… यह सब सुनने में आसान लगता है, लेकिन इनके अंदर छुपा केमिकल ट्रुथ काफी खतरनाक हो सकता है।
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प्रोसेस्ड फूड का मतलब सिर्फ पैकेट फूड नहीं होता
जब किसी भी नैचुरल फ़ूड को उसकी असली शेप से दूर ले जाकर उसमें प्रिजर्वेटिव, आर्टिफिशियल कलर, फ़्लेवर बढ़ाने वाला, स्टेबलाइज़र और केमिकल मिलाए जाते हैं, तब वो प्रोसेस्ड फ़ूड बैन हो जाता है। इनका मुख्य लक्ष्य होता है शेल्फ़ लाइफ़ बढ़ाना, टेस्ट बढ़ाना और प्रोडक्ट को ज़्यादा टाइम तक फ्रेश दिखाना। लेकिन यही प्रिजर्वेटिव शरीर के लिए साइलेंट रिस्क बन जाते हैं। कैंसर रिस्क और प्रोसेस्ड फ़ूड का कनेक्शन साइंटिफ़िक स्टडीज़ में बार-बार सामने आया है। कई ग्लोबल रिसर्च ये बताती हैं कि जो लोग रेगुलर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फ़ूड खाते हैं, उनमें कैंसर का रिस्क ज़्यादा होता है स्पेशल कोलोरेक्टल कैंसर, पेट का कैंसर और ब्रेस्ट कैंसर का। इसका कारण है प्रिजर्वेटिव जैसे नाइट्राइट, नाइट्रेट, आर्टिफिशियल स्वीटनर और हाई सोडियम कंटेंट जो बॉडी के सेल्स को डैमेज कर सकते हैं।
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नाइट्राइट और नाइट्रेट अक्सर प्रोसेस्ड मीट में मिलते हैं जैसे सॉसेज, बेकन, हॉट डॉग। जब ये बॉडी के अंदर जाते हैं, तो ये कार्सिनोजेनिक कंपाउंड में कन्वर्ट हो सकते हैं। ये कंपाउंड DNA को डैमेज करते हैं, जो आगे चलकर कैंसर सेल्स को जान दे सकते हैं। ये प्रोसेस धीरे होता है, इसलिए लोग समझ नहीं पाते कि असल प्रॉब्लम कहाँ से शुरू हुई।
हाई शुगर और रिफाइंड कार्ब्स भी प्रोसेस्ड फूड का एक बड़ा हिस्सा हैं
सॉफ्ट ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स, पैकेज्ड जूस और बेकरी प्रोडक्ट्स में शुगर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। ज़्यादा शुगर से इंसुलिन रेजिस्टेंस होता है, क्रोनिक इन्फ्लेमेशन बढ़ती है, और मोटापे का रिस्क होता है। और मोटापा खुद कैंसर के रिस्क का एक बड़ा फैक्टर माना जाता है। मतलब शुगर सिर्फ वज़न नहीं बढ़ा रही, बालकी कैंसर के लिए माहौल तैयार कर रही है।
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प्रिजर्वेटिव्स बॉडी के नेचुरल डिफेंस सिस्टम को भी कमजोर कर देते हैं। लिवर और किडनी का काम होता है टॉक्सिन्स को फिल्टर करना, लेकिन जब रोज़ाना केमिकल लोड ज़्यादा हो जाता है, तो ये ऑर्गन्स ओवरवर्क हो जाते हैं। नतीजा – टॉक्सिन्स बॉडी में जमा होने लगते हैं, इम्यूनिटी कमजोर होती है और सेल्स के रिपेयर मैकेनिज्म धीमे हो जाते हैं। जब सेल रिपेयर सही से नहीं होता, तब कैंसर का रिस्क और बढ़ जाता है।
बच्चों और जवानों के लिए यह रिस्क और ज़्यादा सीरियस
आज के टाइम में बच्चे चिप्स, चॉकलेट, इंस्टेंट नूडल्स और पैकेज्ड स्नैक्स पर ज़्यादा डिपेंडेंट हो रहे हैं। उनकी बॉडी अभी डेवलप हो रही है, और अगर शुरुआत से ही केमिकल एक्सपोज़र ज़्यादा हो, तो लॉन्ग-टर्म हेल्थ कॉन्सीक्वेंस और भी डेंजरस हो सकते हैं। कम उम्र में अनहेल्दी डाइट फ्यूचर में कैंसर और लाइफस्टाइल डिजीज का बेस बन सकती है।
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मार्केटिंग का ट्रैप भी समझना ज़रूरी है।
‘लो फैट’, ‘शुगर फ्री’, ‘डाइट फ्रेंडली’ जैसे लेबल देखकर लोग कन्फ्यूज हो जाते हैं। लेकिन जब इंग्रीडिएंट लिस्ट पढ़ी जाती है, तो वहां आर्टिफिशियल स्वीटनर, इमल्सीफायर और प्रिजर्वेटिव भरे होते हैं। प्रोडक्ट हेल्दी दिखाया जाता है, लेकिन असल में बॉडी के लिए नुकसानदायक होता है। इसलिए सिर्फ फ्रंट लेबल पर भरोसा करना सबसे बड़ी गलती है।
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ऐसे रखें ध्यान,वरना जा सकती है जान
प्रोसेस्ड फूड को पूरी तरह छोड़ना मुश्किल हो सकता है, लेकिन उसकी क्वांटिटी कम करना बिल्कुल पॉसिबल है। फ्रेश फ्रूट्स, वेजिटेबल्स, होल ग्रेन, घर का बना खाना और सीजनल डाइट को प्रायोरिटी देना सबसे इफेक्टिव स्टेप है। घर का खाना न सिर्फ सेफ होता है, बल्कि बॉडी को नेचुरल न्यूट्रिएंट्स देता है जो कैंसर से लड़ने में मदद करते हैं।
अवेयरनेस ही सबसे बड़ा वेपन है
जब तक लोग यह नहीं समझेंगे कि डेली खाने की चॉइस फ्यूचर हेल्थ को डिसाइड करती हैं, तब तक प्रॉब्लम सॉल्व नहीं होगी। प्रोसेस्ड फ़ूड एक दिन में कैंसर नहीं देता, लेकिन रोज़-रोज़ थोड़ा-थोड़ा डैमेज करता रहता है। और जब डैमेज लिमिट क्रॉस कर जाता है, तब बीमारी सामने आती है।
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आखिर में एक सिंपल बात याद
जो फ़ूड जितना ज़्यादा नैचुरल, फ्रेश और सिंपल होगा, उतना ही बॉडी के लिए सेफ़ होगा। और जो फ़ूड जितना ज़्यादा पैकेज्ड, कलरफ़ुल और लॉन्ग-लास्टिंग होगा, उतना ही ज़्यादा रिस्क लेकर आता है। आज की कन्वीनियंस कल की कैंसर रिस्क बन सकता है। इसलिए स्मार्ट चॉइस आज ही ज़रूरी है। यह सिर्फ़ एक हेल्थ मैसेज नहीं, बाल्की लाइफ़स्टाइल वॉर्निंग है। प्रोसेस्ड फ़ूड कैंसर रिस्क को इग्नोर करना मतलब फ्यूचर हेल्थ से कॉम्प्रोमाइज़ करना। आज प्लेट पर जो है, वही कल बॉडी के रिजल्ट दिखता है।
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