China Territorial Expansion Strategy: चीन की विदेश नीति इन दिनों किसी शतरंज के खिलाड़ी जैसी लगती है एक हाथ में शांति का मोहरा, दूसरे हाथ में इतिहास और सुरक्षा के नाम पर सीमा बदलने की चाल। अमेरिका के रक्षा मंत्रालय यानी Pentagon की 2025 की ताज़ा रिपोर्ट ने इसी दोहरेपन पर से पर्दा उठाया है। रिपोर्ट कहती है कि बीजिंग एक तरफ भारत के साथ तनाव कम करने की बात करता है, तो दूसरी तरफ चुपचाप अपने दावे ऐसे मजबूत करता है जैसे दुनिया का नक्शा कोई ड्राफ्ट हो जब मन किया, एडिट कर दिया। सवाल सिर्फ भारत का नहीं है, सवाल यह है कि चीन की नजर आखिर किन-किन जमीनों पर है और क्यों?
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भारत और China के बीच 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा कोई नई कहानी नहीं, लेकिन अरुणाचल प्रदेश को लेकर बीजिंग का राग पुराना होकर भी बेसुरा ही है। Arunachal Pradesh को चीन दक्षिणी तिब्बत बताता है, मानो नाम बदल देने से जमीन भी बदल जाए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे India का अभिन्न हिस्सा मानता है, लेकिन चीन के लिए इतिहास एक ऐसा औजार है जिसे जरूरत के हिसाब से खींचा-तान दिया जाता है। तवांग जैसे इलाकों पर दावा कर बीजिंग यह संकेत देता है कि उसके लिए यह मुद्दा Taiwan या दक्षिण चीन सागर जितना ही अहम है। कटाक्ष यह है कि बातचीत की मेज पर शांति की चाय चलती है और सीमा पर शक की आग सुलगती रहती है।
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चीन की दोस्ती की परिभाषा भी कम दिलचस्प नहीं। दुनिया के सामने Russia और चीन की साझेदारी पश्चिम के खिलाफ एक मजबूत धुरी की तरह दिखाई जाती है, लेकिन पर्दे के पीछे इतिहास के पुराने पन्ने पलटे जा रहे हैं। 2023 में चीन के नए सरकारी नक्शों में रूसी शहरों को चीनी नामों से दिखाया गया जैसे Vladivostok तो मॉस्को में भौंहें तन गईं। उस्सुरी और अमूर नदियों के संगम पर एक द्वीप को पूरी तरह चीनी दिखाना भी कोई तकनीकी गलती नहीं थी, बल्कि 2008 की संधि को नजरअंदाज करने का संकेत था। 4,200 किलोमीटर लंबी रूस-चीन सीमा पर 1960 के दशक की गोलीबारी याद दिलाती है कि यह रिश्ता जितना दोस्ताना दिखता है, उतना सरल नहीं।
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साइबेरिया की कहानी तो और भी दिलचस्प है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि चीन रूसी सीमा के पास कृषि भूमि खरीद रहा है, कहीं लंबी लीज़ पर ले रहा है। तर्क दिया जाता है निवेश है, सहयोग है। जानकार कटाक्ष करते हैं आज खेत, कल झंडा। बीजिंग यहां भी इतिहास का सहारा लेता है, कहता है कि किंग राजवंश के दौर में ये इलाके चीन का हिस्सा थे। मतलब यह कि अगर 150 साल पुराना इतिहास मान्य है, तो दुनिया के आधे नक्शे पर फिर से बहस शुरू हो जानी चाहिए।
दक्षिण चीन सागर में चीन की चालें किसी से छुपी नहीं हैं। Philippines के Pag-asa यानी Thitu Island पर नजर गड़ाए बीजिंग ने अंतरराष्ट्रीय अदालत के 2016 के फैसले को भी ठेंगा दिखाया। अदालत ने चीन के ज्यादातर दावों को खारिज किया, लेकिन बीजिंग ने मानो कहा फैसला कागज पर रखिए, हम समुद्र में अपना काम करेंगे। नतीजा यह हुआ कि कृत्रिम द्वीप बने, सैन्य ढांचे खड़े हुए और जहाजों की आवाजाही बढ़ी। South China Sea अब व्यापार मार्ग कम और शक्ति प्रदर्शन का मंच ज्यादा बनता जा रहा है।
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सबसे संवेदनशील मोर्चा ताइवान का है, जहां चीन का रुख किसी भी तरह की अस्पष्टता से दूर, सीधा और सख्त है। बीजिंग साफ कहता है कि ताइवान चीन का हिस्सा है और उसे किसी भी कीमत पर वापस लाया जाएगा। हाल के वर्षों में ताइवान के आसपास बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास हुए हैं। पेंटागन की रिपोर्ट के मुताबिक चीन की सेना यानी People’s Liberation Army जबरन एकीकरण के कई विकल्पों पर काम कर रही है समुद्री हमला, मिसाइल स्ट्राइक, नाकाबंदी। 2024 के अभ्यासों में तो ऐसे सीनारियो भी शामिल थे, जिनमें अमेरिकी सेनाओं को निशाना बनाने की कल्पना की गई। 1,500 से 2,000 समुद्री मील तक मार करने की क्षमता दिखाकर संदेश साफ था यह सिर्फ ताइवान के लिए चेतावनी नहीं, पूरे क्षेत्र के लिए शक्ति प्रदर्शन है।
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इन तमाम उदाहरणों को जोड़ें तो एक तस्वीर उभरती है चीन की रणनीति सिर्फ रक्षा नहीं, बल्कि विस्तार की है, जिसे वह इतिहास, सुरक्षा और संप्रभुता के शब्दों में पैक करता है। कटाक्ष यह है कि बीजिंग जहां भी दावा करता है, वहां इतिहास अचानक जाग जाता है; जहां नहीं करता, वहां इतिहास गहरी नींद में रहता है। भारत, रूस, फिलीपींस या ताइवान हर जगह कहानी अलग दिखती है, लेकिन स्क्रिप्ट वही है। दुनिया के लिए चुनौती यह है कि क्या इस शतरंज की बिसात पर नियम वही चलेंगे जो अंतरराष्ट्रीय कानून कहता है, या फिर नक्शे वही मान्य होंगे जो सबसे ताकतवर खिलाड़ी छाप दे? यही सवाल आज वैश्विक राजनीति के केंद्र में है, और इसका जवाब सिर्फ बयानों से नहीं, संतुलित और सामूहिक रणनीति से ही निकलेगा।
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