High-Fat Diet and Liver Cancer Risk: आज की भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल में जंक फूड, ऑयली खाना और हाई-फैट डाइट हम सबकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। बर्गर, पिज्जा, डीप-फ्राइड स्नैक्स और शुगरी ड्रिंक्स को हम सिर्फ टेस्ट के लिए चुनते हैं, लेकिन अब साइंस ने इस आदत का एक ऐसा सच सामने रखा है जो हिला देने वाला है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के रिसर्चर्स की एक नई स्टडी के मुताबिक, हाई-फैट डाइट का लंबा समय तक इस्तेमाल लिवर सेल्स को “स्ट्रेस-सर्वाइवल मोड” में ढकेल देता है, जो आखिर में लिवर कैंसर के रिस्क को काफी ज्यादा बढ़ा देता है।

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इस रिसर्च के मुताबिक, जब लिवर को बार-बार फैटी फूड का लोड झेलना पड़ता है, तो लिवर के मैच्योर सेल्स, जिन्हें अपनी एक खास ज़िम्मेदारी होती है, धीरे-धीरे अपनी स्पेशलिटी खो देते हैं। ये सेल्स, जिन्हें हेपेटोसाइट्स कहा जाता है, नॉर्मल तौर पर मेटाबॉलिज्म, डिटॉक्सिफिकेशन और प्रोटीन प्रोडक्शन जैसे कामों के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। लेकिन हाई-फैट डाइट के लगातार प्रेशर में ये सेल्स अपना असली काम छोड़ कर एक प्रिमिटिव, स्टेम-सेल जैसी हालत में चले जाते हैं। ये एक तरह का सर्वाइवल मैकेनिज्म होता है, जिससे सेल्स स्ट्रेस में भी ज़िंदा रह सकें, लेकिन इसकी कीमत पूरा लिवर चुकाता है।
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जब हेपेटोसाइट्स अपनी पहचान खो देते हैं, तो लिवर की नॉर्मल फंक्शनिंग कमज़ोर हो जाती है। यह वही स्टेज होती है जहाँ से फैटी लिवर डिज़ीज़ शुरू होती है, फिर इन्फ्लेमेशन, फिर स्कारिंग और आखिर में कैंसर तक का सफ़र तय होता है। स्टडी ने पहली बार साफ़ तौर पर दिखाया है कि फैटी लिवर डिज़ीज़ और लिवर कैंसर के बीच का बायोलॉजिकल कनेक्शन क्या है। यह सिर्फ़ कोइंसिडेंस नहीं है, बाल्की एक स्लो और साइलेंट प्रोसेस है जो सालों तक चलता रहता है।
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रिसर्चर्स ने इस पुअर प्रोसेस को समझने के लिए सिंगल-सेल RNA सीक्वेंसिंग का इस्तेमाल किया। इस टेक्नीक से उन्होंने माउस मॉडल्स में हर एक लिवर सेल की जीन एक्टिविटी को ट्रैक किया। जैसे-जैसे चूहों को हाई-फैट डाइट दी गई, उनके लिवर में पहले इन्फ्लेमेशन हुआ, फिर फाइब्रोसिस आया और आखिर में कैंसर हो गया। इस दौरान एक खतरनाक पैटर्न सामने आया। शुरुआत में ही ऐसे जीन एक्टिव हो गए जो सेल सर्वाइवल और अनकंट्रोल्ड ग्रोथ को प्रमोट करते हैं, जबकी मेटाबॉलिज्म और प्रोटीन सेक्रेशन से जुड़े जीन धीरे-धीरे बंद होने लगे। स्टडी के आखिर तक लगभग सारे चूहे जो हाई-फैट डाइट पर थे, उनमें लिवर कैंसर हो चुका था। ये रिजल्ट इस बात का स्ट्रॉन्ग सिग्नल है कि अगर डाइट और लाइफस्टाइल पर टाइम रहते कंट्रोल न किया गया, तो लिवर डिजीज सिर्फ फैटी लिवर तक सिमित नहीं रहेगी, बालकी कैंसर तक पहुंच सकती है। ये कोई अचानक होने वाली बीमारी नहीं है, बाल्की एक साइलेंट ट्रांसफॉर्मेशन है जो अंदर ही अंदर चलता रहता है।
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इस रिसर्च का एक और ज़रूरी हिस्सा ये था कि साइंटिस्ट्स ने कुछ खास ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर्स आइडेंटिफाई किए, जो लिवर सेल्स को इस स्ट्रेस-सर्वाइवल मोड में पुश करते हैं। अच्छी खबर ये है कि इनमें से कुछ फैक्टर्स को टारगेट करने वाली दवाएं पहले से ही डेवलपमेंट फेज में हैं या क्लिनिकल ट्रायल्स में इस्तेमाल हो रही हैं, खासकर सीवियर फैटी लिवर डिजीज के पेशेंट्स के लिए। मतलब फ्यूचर में ऐसे ट्रीटमेंट्स मुमकिन हो सकते हैं जो सिर्फ सिम्टम्स नहीं, बाल्की डिजीज के रूट कॉज पर काम करें। सिर्फ एनिमल मॉडल्स ही नहीं, बाल्की ह्यूमन लिवर सैंपल्स का एनालिसिस भी इस स्टडी का हिस्सा था। इंसानों में भी वही जेनेटिक पैटर्न देखा गया। जिन लोगों के लिवर सेल्स में सर्वाइवल से जुड़े जीन ज़्यादा एक्टिव थे और नॉर्मल लिवर फंक्शन वाले जीन कम, उनमें कैंसर डेवलप होने के बाद के नतीजे काफी खराब रहे। यह पता लगाना भी मुश्किल है कि लिवर कैंसर सिर्फ एक स्टेज पर नहीं, बल्कि पहले से चल रहे सेलुलर बदलावों का नतीजा होता है।
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रिसर्चर्स का मानना है कि चूहों में यह प्रोसेस लगभग एक साल में पूरा हो जाता है, लेकिन इंसानों में यह दशकों तक रह सकता है। यह ड्यूरेशन डाइट, मोटापा, शराब पीना और वायरल इन्फेक्शन जैसे फैक्टर्स पर निर्भर करता है। इसी वजह से फैटी लिवर डिजीज को अक्सर लोग सीरियस नहीं लेते, क्योंकि शुरू में कोई सीरियस सिम्टम नहीं दिखता। लेकिन अंदर ही अंदर लिवर सेल्स अपनी असली पहचान छोड़कर कैंसर-फ्रेंडली माहौल बना रहे होते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस प्रोसेस को रिवर्स किया जा सकता है? रिसर्चर्स का अगला फोकस इसी पर है। फ्यूचर स्टडीज़ में यह देखा जाएगा कि अगर डाइट सुधारी जाए, वेट-लॉस ट्रीटमेंट के लिए जाएं या लाइफस्टाइल में बदलाव किए जाएं, तो क्या लिवर सेल्स वापस अपनी नॉर्मल स्टेट में आ सकते हैं और कैंसर का रिस्क कम हो सकता है। अगर ऐसा होता है, तो लाखों लोगों के लिए उम्मीद की एक नई रोशनी होगी।
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इस खराब पढ़ाई का सबसे बड़ा मैसेज बिल्कुल सीधा है। हाई-फैट डाइट सिर्फ वज़न बढ़ने या कोलेस्ट्रॉल का मुद्दा नहीं है, बाल्की ये आपके लिवर को धीरे-धीरे एक ऐसी राह पर ले जा सकती है जहाँ से वापस आना मुश्किल हो जाता है। आज जो खाना हम कभी-कभी बोलकर इग्नोर कर देते हैं, वही कल को एक बड़ी बीमारी की नींव बन सकता है। इस समय खुद पर कंट्रोल, बैलेंस्ड डाइट और हेल्दी लाइफस्टाइल ही सबसे बड़ा प्रोटेक्शन है। ये रिसर्च सिर्फ साइंस का डेटा नहीं है, बाल्की एक वॉर्निंग
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