Ayurvedic Tea Benefits: आयुर्वेदिक चाय से सुबह की शुरुआत अगर सही ढंग से हो जाए, तो पूरा दिन न सिर्फ सेहतमंद बल्कि ऊर्जा से भरपूर भी बन सकता है। हमारे यहां सदियों से चाय सिर्फ एक पेय नहीं रही, बल्कि एक आदत, एक संस्कार और कई बार तो विचारधारा तक बन चुकी है। फर्क बस इतना है कि कुछ लोग चाय को शरीर से जोड़कर देखते हैं और कुछ उसे बहस, नफरत और कट्टरता के ईंधन की तरह इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में आयुर्वेदिक चाय एक तरह से शांति का संदेश भी है कि जिंदगी सिर्फ गरम दिमाग से नहीं, गरम पानी में उबली जड़ी-बूटियों से भी बेहतर बन सकती है।
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सुबह-सुबह जब शरीर नींद से जागता है, तो उसे किसी नारे, किसी उकसावे या किसी कट्टर सोच की नहीं, बल्कि संतुलन की जरूरत होती है। तुलसी, अदरक, दालचीनी, काली मिर्च और सौंठ जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से बनी चाय शरीर को धीरे-धीरे एक्टिव करती है। यह पाचन तंत्र को मजबूत करती है, मेटाबॉलिज्म को दुरुस्त करती है और इम्यून सिस्टम को सहारा देती है। फर्क साफ है एक तरफ आयुर्वेदिक चाय है जो शरीर को जोड़ती है, और दूसरी तरफ कट्टरपंथी सोच है जो समाज को तोड़ने में लगी रहती है।
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आयुर्वेद कहता है कि शरीर में वात, पित्त और कफ का संतुलन जरूरी है। लेकिन कट्टरपंथियों को संतुलन शब्द से ही एलर्जी हो जाती है। उन्हें या तो बहुत गरम चाहिए या बिल्कुल ठंडा बीच का रास्ता उन्हें मंजूर नहीं। आयुर्वेदिक चाय ठीक इसके उलट है। यह न ज्यादा उत्तेजित करती है, न सुस्त बनाती है। यह सिखाती है कि जीवन में भी वही चीज टिकाऊ होती है, जो संतुलित हो। शायद इसीलिए कट्टर सोच रखने वालों को ऐसी चाय पसंद नहीं आती, क्योंकि इसमें न जहर है, न जज्बाती उबाल।
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सुबह की आयुर्वेदिक चाय का एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह तनाव को कम करती है। आज के दौर में तनाव सिर्फ काम का नहीं है, बल्कि बेवजह की बहसों, सोशल मीडिया की लड़ाइयों और हर मुद्दे को “हम बनाम वो” में बदल देने की आदत का भी है। आयुर्वेदिक चाय पीते हुए अगर इंसान दो मिनट शांति से बैठ जाए, तो उसे समझ में आ सकता है कि हर सवाल का जवाब गुस्से में नहीं, समझदारी में छुपा होता है। मगर कट्टरपंथियों को शांति रास नहीं आती, उन्हें हमेशा शोर चाहिए चाहे दिमाग में हो या समाज में।
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आयुर्वेदिक चाय का असर सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रहता। यह सोच को भी साफ करती है। जब शरीर हल्का होता है, तो दिमाग भी हल्का होता है। तब इंसान दूसरों को सुनने, समझने और स्वीकार करने की स्थिति में आता है। इसके उलट कट्टर सोच दिमाग को इतना भारी कर देती है कि उसमें नई बातों के लिए जगह ही नहीं बचती। शायद इसलिए आयुर्वेदिक चाय पीने वाला व्यक्ति सवाल पूछता है, जबकि कट्टरपंथी सिर्फ जवाब थोपता है।
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दिन की शुरुआत अगर ऐसी चाय से हो, तो पूरे दिन ऊर्जा बनी रहती है। आलस कम होता है, फोकस बढ़ता है और छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ कम आती है। यह चाय किसी धर्म, जाति या विचारधारा की नहीं होती, यह सिर्फ सेहत की होती है। और यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। कट्टरपंथियों को समस्या इसी से है उन्हें हर चीज में पहचान, झंडा और खांचा चाहिए, जबकि आयुर्वेदिक चाय बिना किसी शोर के अपना काम कर जाती है।
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अंत में बात इतनी सी है कि सुबह आप क्या चुनते हैं शरीर को मजबूत करने वाली आयुर्वेदिक चाय या दिमाग को गरम करने वाली कट्टर सोच। एक रास्ता आपको स्वस्थ, शांत और ऊर्जावान बनाता है, दूसरा रास्ता आपको हमेशा गुस्से और टकराव में उलझाए रखता है। फैसला आपका है, लेकिन याद रखिए, अच्छी सेहत के लिए चाय में जड़ी-बूटियां चाहिए, न कि कट्टरता का जहर।
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