School Children: देश में शिक्षा को हर School Children का अधिकार माना जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 सत्र में करीब 11 लाख 70 हजार बच्चे ऐसे मिले जो स्कूल ही नहीं जा रहे। वहीं 2020 से 2025 के बीच 65 लाख 70 हजार से ज्यादा बच्चों ने बीच में पढ़ाई छोड़ दी। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि उन सपनों की कहानी है जो गरीबी और मजबूरी के बोझ तले दब गए। इतनी बड़ी संख्या में School Children का शिक्षा से दूर होना देश के सामाजिक और आर्थिक भविष्य के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है।
उत्तर प्रदेश सबसे आगे, झारखंड और असम भी पीछे नहीं
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो स्कूल न जाने वाले School Children की सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश में है। यहां लगभग 7 लाख 84 हजार बच्चे शिक्षा से बाहर हैं। इसके बाद झारखंड में करीब 65 हजार और असम में 63 हजार School Children स्कूल से दूर बताए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी आबादी, गरीबी, पलायन और जागरूकता की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। कई इलाकों में आज भी स्कूलों की दूरी इतनी ज्यादा है कि छोटे बच्चों के लिए रोजाना जाना संभव नहीं हो पाता।
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बेटियों की पढ़ाई पर सबसे गहरी मार
लड़कियों के स्कूल छोड़ने के आंकड़े और भी डराने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार ड्रॉपआउट करने वालों में करीब 45 फीसदी लड़कियां हैं। महाराष्ट्र में स्थिति सबसे खराब है, जहां 66 फीसदी लड़कियां समय से पहले पढ़ाई छोड़ देती हैं। इसके बाद हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, जम्मू-कश्मीर और ओडिशा का नंबर आता है। कम उम्र में शादी, घरेलू कामकाज का बोझ, सुरक्षा की चिंता और सामाजिक सोच बेटियों की शिक्षा में सबसे बड़ी रुकावट बन रही है।
आर्थिक तंगी बनी पढ़ाई की सबसे बड़ी दुश्मन
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 साफ बताता है कि स्कूल ड्रॉपआउट का सबसे बड़ा कारण परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति है। गरीब परिवारों में बच्चों को कम उम्र में ही काम पर लगना पड़ता है। कहीं बच्चे खेतों में मजदूरी करते हैं तो कहीं छोटे-मोटे कामों से घर का खर्च चलाते हैं। कोरोना के बाद लाखों परिवारों की आय घट गई, जिसका सीधा असर School Children की पढ़ाई पर पड़ा। जब पेट भरने की चुनौती सामने हो तो शिक्षा पीछे छूट जाती है।
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ऑनलाइन पढ़ाई ने बढ़ाई डिजिटल खाई
सरकार ने डिजिटल एजुकेशन को बढ़ावा दिया, लेकिन इसका फायदा सभी तक नहीं पहुंच सका। ग्रामीण और गरीब परिवारों के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। नतीजा यह हुआ कि ऑनलाइन क्लास के दौर में लाखों School Children पढ़ाई की मुख्यधारा से बाहर हो गए। शहरी बच्चों ने तो किसी तरह पढ़ाई जारी रखी, लेकिन गांवों में एक बड़ी पीढ़ी शिक्षा से कट गई। यह डिजिटल असमानता अब नई चुनौती बन चुकी है।
सरकारी स्कूलों की बदहाल तस्वीर
कई सरकारी स्कूल आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। कहीं पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, कहीं कक्षाओं की हालत जर्जर है। शौचालय, पेयजल और सुरक्षित माहौल न होने से खासकर लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। मिड-डे मील, मुफ्त किताबें और वर्दी जैसी योजनाएं जरूर चल रही हैं, लेकिन गुणवत्ता वाली पढ़ाई का अभाव अभिभावकों का भरोसा कमजोर कर देता है। इसी वजह से कई माता-पिता बच्चों को काम सिखाना ज्यादा सही समझते हैं।
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स्किल एजुकेशन और सामाजिक भागीदारी ही रास्ता
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल किताबी पढ़ाई से समस्या हल नहीं होगी। स्कूलों में कौशल आधारित शिक्षा और रोजगार से जुड़ी ट्रेनिंग जरूरी है, ताकि School Children को पढ़ाई का सीधा फायदा दिखे। साथ ही समाज और अभिभावकों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। शिक्षा को बोझ नहीं, अवसर के रूप में देखना होगा। सरकार, शिक्षक और समाज मिलकर काम करें तभी हर School Children स्कूल तक पहुंच पाएगा। वरना देश का एक बड़ा हिस्सा अज्ञानता और गरीबी के चक्र में फंसा रह जाएगा।
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