Mohan Bhagwat Vrindavan: वृंदावन के रुक्मिणी विहार में महामंडलेश्वर यतींद्र गिरि महाराज के ‘जीवदीप आश्रम’ का उद्घाटन किया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक (प्रमुख) मोहन भागवत ने दीप प्रज्वलित कर इस आश्रम को राष्ट्र को समर्पित किया। इस कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आए वरिष्ठ नेताओं, संतों और गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया। इस कार्यक्रम का घोषित उद्देश्य आध्यात्मिकता और समाज के बीच सौहार्द को मजबूत करना था।
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Mohan Bhagwat Vrindavan: संत और राजनीतिक दिग्गज एक मंच पर
वृंदावन की पावन धरा पर आयोजित इस कार्यक्रम में संघ, राजनीतिक जगत और संत समुदाय का एक भव्य संगम देखने को मिला। मुख्य अतिथि के रूप में पधारे RSS चीफ मोहन भागवत ने दीप प्रज्वलित कर औपचारिक रूप से ‘जीवदीप आश्रम’ का उद्घाटन किया।
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इसके अतिरिक्त, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और यूपी सरकार के मंत्री चौधरी लक्ष्मी नारायण भी मंच पर उपस्थित थे। दूसरी ओर, जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि और साध्वी ऋतंभरा की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को एक विशिष्ट आध्यात्मिक आयाम प्रदान किया।
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पुस्तकों का विमोचन, ज्ञान और परंपरा का संदेश
इसी क्रम में, कार्यक्रम के दौरान यतींद्र गिरि महाराज द्वारा रचित हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं की पुस्तकों का विमोचन किया गया। इस पहल को आश्रम को केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में ही नहीं, बल्कि एक ज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इस आश्रम को आधुनिक सुविधाओं और पारंपरिक मूल्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के उद्देश्य से डिज़ाइन किया गया है, जिससे यहां आने वाले आगंतुकों को आध्यात्मिक और बौद्धिक, दोनों ही प्रकार का मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।
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भागवत ने आश्रमों की भूमिका पर ज़ोर दिया
Mohan Bhagwat Vrindavan में जनसभा को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि ‘आश्रम’ भारतीय संस्कृति की एक अद्वितीय संस्था है एक ऐसी संस्था जिसका कोई सटीक भाषाई अनुवाद वास्तव में संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आश्रम केवल एक धार्मिक स्थल मात्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा ‘विद्यालय’ है जहां किसी भी व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होता है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि आज के दौर में, जब समाज तेज़ी से भौतिकवाद की ओर बढ़ रहा है, तब आश्रमों की भूमिका और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। यह जगह लोगों को संतुलन, अनुशासन और मूल्यों पर आधारित जीवन जीने के सबक सिखाती है।
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सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर व्यक्त विचार (Mohan Bhagwat Vrindavan)
इसके अलावा, अपने संबोधन में भागवत ने कई सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपने विचार रखे। बढ़ती घुसपैठ पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि देश में बिना अनुमति के घुसे लोगों की पहचान करना और उन्हें बाहर निकालना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत ज़रूरी है।
दूसरी ओर, उन्होंने जनसंख्या संतुलन के बारे में भी अपनी राय दी। उनके अनुसार, माता-पिता के स्वास्थ्य और समाज के संतुलन को ध्यान में रखते हुए, तीन बच्चे पैदा करने के विचार को सही माना जा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यह व्यक्तिगत और सामाजिक, दोनों ही स्तरों पर संतुलन बनाए रखने का मामला है।
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आध्यात्मिकता को मानवता की नींव बताया गया
इस संदर्भ में, भागवत ने कहा कि आज दुनिया भौतिकवाद से पैदा हुई कई चुनौतियों से जूझ रही है। इस स्थिति को जड़वाद (भौतिकवादी जुनून) बताते हुए, उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि केवल आध्यात्मिकता ही मानवता को सही दिशा दिखा सकती है।
इसके अलावा, संत समाज (साधु-संतों का समुदाय) की अहम भूमिका पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि इन आश्रमों जैसी संस्थाएं समाज को सही रास्ते पर ले जाने का काम करती हैं। वृंदावन जैसे आध्यात्मिक केंद्रों में होने वाले इस तरह के कार्यक्रम सामाजिक एकता को बढ़ावा देने और लोगों में जागरूकता फैलाने का माध्यम बनते हैं।
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आध्यात्मिकता और समाज का मिलन
वृंदावन में आयोजित यह कार्यक्रम सिर्फ़ एक आश्रम का उद्घाटन भर नहीं था यह आध्यात्मिकता और समाज के बीच संवाद का प्रतीक बन गया। साधु-संतों, राजनेताओं और आम लोगों की भागीदारी ने इसे एक व्यापक सामाजिक समागम में बदल दिया। खास बात यह है कि इस तरह के कार्यक्रम भारतीय संस्कृति के मूल मूल्यों सद्भाव और संतुलन को मज़बूत करने में बहुत मददगार साबित होते हैं। Mohan Bhagwat Vrindavan
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