Vamsi Gaddam electric bike Parliament: संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा है। बाहर ठंड है, भीतर सियासत की तपिश। और इसी तपिश के बीच एक दृश्य ऐसा उभरा जिसने कैमरों को भी ठिठका दिया और बहस को भी। कांग्रेस नेता वामसी गद्दाम संसद के मुख्य द्वार पर किसी बड़ी गाड़ी से नहीं, किसी सायरन या लालबत्ती के साथ नहीं, बल्कि एक इलेक्ट्रिक बाइक पर पहुंचे। न शोर, न तामझाम। लेकिन संदेश… बेहद शोरदार।
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लोकतंत्र में कई बार प्रतीक शब्दों से ज्यादा बोलते हैं। वामसी गद्दाम की यह एंट्री भी वैसी ही थी। एक तरफ संसद के भीतर प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जनस्वास्थ्य पर बहसें, दूसरी तरफ दिल्ली की जहरीली हवा, और तीसरी तरफ सत्ता की जिम्मेदारी से बचती राजनीति। इलेक्ट्रिक बाइक पर संसद पहुंचना सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, यह सवाल था क्या सरकार सिर्फ भाषण देगी या उदाहरण भी बनेगी?
दिल्ली की हवा आज किसी आंकड़े की मोहताज नहीं है। सांस लेना जोखिम बन चुका है। बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं सब इस अदृश्य संकट की गिरफ्त में हैं। लेकिन सत्ता पक्ष की बहसों में यह संकट अक्सर मौसम बनकर रह जाता है, नीति नहीं बन पाता। वामसी गद्दाम ने इसी बिंदु पर बीजेपी को घेरते हुए कहा कि सरकार प्रदूषण पर सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति कर रही है, समाधान की नहीं।
उनका तंज सीधा था जब नेता खुद डीज़ल और पेट्रोल की गाड़ियों के काफिले में चलते हैं, तब आम जनता से पर्यावरण बचाने की अपील खोखली लगती है। इलेक्ट्रिक बाइक पर संसद पहुंचकर उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि बदलाव की शुरुआत प्रतीकों से ही होती है। अगर जनप्रतिनिधि खुद पहल नहीं करेंगे तो नीतियां कागजों से बाहर कैसे आएंगी?

यह कोई पहला मौका नहीं है जब संसद के बाहर किसी नेता ने प्रतीकात्मक राजनीति की हो। कभी साइकिल, कभी बैलगाड़ी, कभी किसान के वेश में सांसद। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये प्रतीक सत्ता को असहज करते हैं? या फिर सत्ता इन्हें इवेंट बनाकर आगे बढ़ जाती है? वामसी गद्दाम का आरोप यही था कि बीजेपी सरकार प्रदूषण को लेकर गंभीर नहीं है। न ठोस ट्रांसपोर्ट पॉलिसी, न इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को लेकर जमीनी स्तर पर क्रांति, न पराली, न निर्माण, न उद्योग हर मोर्चे पर आधे-अधूरे समाधान।
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बीजेपी की ओर से जवाब भी आया। कहा गया कि प्रदूषण एक राष्ट्रीय समस्या है, इसके लिए राज्यों को भी जिम्मेदारी लेनी होगी। इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर सरकार सब्सिडी दे रही है, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम हो रहा है। लेकिन यहीं पर बहस ठहर जाती है। सवाल नीति का नहीं, प्राथमिकता का है। अगर प्राथमिकता होती, तो दिल्ली हर साल गैस चैंबर न बनती।
यह सिर्फ एक बाइक नहीं थी, यह एक आईना था। आईना सत्ता के सामने रखा गया। और सत्ता अक्सर आईने से नजरें चुरा लेती है। संसद के गलियारों में जब एयर प्यूरीफायर की हवा चल रही होती है, तब बाहर आम आदमी उसी हवा में सांस लेने को मजबूर होता है। यही असमानता राजनीति का असली प्रदूषण है।
वामसी गद्दाम ने यह भी कहा कि पर्यावरण कोई पार्टी लाइन नहीं है। यह जीवन रेखा है। अगर आज राजनीतिक दल इसे भी वोट और आरोप की तराजू में तौलेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। उनकी बातों में नाटकीयता नहीं थी, बल्कि एक बेचैनी थी एक युवा नेता की बेचैनी, जो देख रहा है कि विकास की रफ्तार सांसों से तेज हो चुकी है।
शीतकालीन सत्र यूं तो विधेयकों और बहसों के लिए जाना जाता है, लेकिन कई बार संसद के बाहर की घटनाएं भीतर से ज्यादा बोलती हैं। इलेक्ट्रिक बाइक से संसद पहुंचना कोई कानून नहीं बदलता, लेकिन यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या हमारे नेता खुद उस भविष्य के लिए तैयार हैं, जिसकी बात वे मंचों से करते हैं?
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आज यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल है। कल शायद कोई नई तस्वीर आ जाएगी। लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब सत्ता इस प्रतीक को नीति में बदले। जब मंत्री भी काफिले से उतरें। जब संसद सिर्फ कानून बनाने की जगह उदाहरण पेश करने की जगह बने।
क्योंकि आखिर में सवाल यह नहीं है कि कौन बाइक से आया। सवाल यह है कि देश किस दिशा में जा रहा है धुएं में या समाधान की ओर। और इस सवाल का जवाब सिर्फ विपक्ष से नहीं, सत्ता से भी चाहिए।
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