Bhagwant Mann SGPC Akali Dal Controversy: पंजाब की राजनीति में धर्म और सत्ता का संबंध हमेशा संवेदनशील रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री भगवंत मान का ताज़ा बयान इस बहस को एक नए और निर्णायक मोड़ पर ले आता है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और शिरोमणि अकाली दल पर सीधे-सीधे आरोप लगाकर मान ने न सिर्फ सियासी समीकरणों को चुनौती दी है, बल्कि सिख पंथ की मर्यादा और संस्थागत जवाबदेही के प्रश्न को भी केंद्र में ला खड़ा किया है।
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अकाल तख्त और पंथ: ढाल या मार्गदर्शक?
मुख्यमंत्री का सबसे तीखा हमला इस आरोप पर है कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और अकाली दल, श्री अकाल तख्त साहिब और “पंथ” की अवधारणा को अपने कुकर्मों की ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। मान का तर्क सीधा है अकाल तख्त किसी भी राजनीतिक दल के लिए सुरक्षा कवच नहीं, बल्कि सिख मर्यादा और न्याय का सर्वोच्च प्रतीक है। यदि वही प्रतीक जवाबदेही से बचने का माध्यम बने, तो यह संस्थाओं की आत्मा पर चोट है।
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328 स्वरूपों का सवाल: आस्था, पीड़ा और जवाबदेही
इस पूरे विवाद का केंद्र गुरु ग्रंथ साहिब के 328 स्वरूपों के लापता होने का मामला है। यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सिख संगत की आस्था से जुड़ा गहरा प्रश्न है। मुख्यमंत्री का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर स्वरूपों का गायब होना और वर्षों तक ठोस कार्रवाई न होना, इस बात की ओर इशारा करता है कि कहीं न कहीं प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश हुई है। यह आरोप साधारण नहीं है क्योंकि इसमें धार्मिक भावनाओं, संस्थागत विफलता और राजनीतिक संरक्षण, तीनों एक साथ जुड़ते हैं।
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SGPC की भूमिका पर सीधा प्रहार
मान का दावा है कि SGPC अपने “प्रभावशाली आकाओं” और धनाढ्य वर्ग को बचाने के लिए धार्मिक भावनाओं का सहारा ले रही है। यह बयान SGPC की उस ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल खड़ा करता है, जिसे सिख संस्थाओं की संरक्षक माना जाता रहा है। सवाल यह है कि क्या धार्मिक संस्था का दायित्व केवल प्रबंधन तक सीमित है, या फिर पारदर्शिता और नैतिक जवाबदेही भी उतनी ही अनिवार्य है?
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अकाली दल की राजनीति बनाम आप सरकार की रणनीति
राजनीतिक दृष्टि से यह टकराव केवल धर्म तक सीमित नहीं। यह आम आदमी पार्टी सरकार और अकाली दल के बीच सत्ता, नैरेटिव और नैतिक श्रेष्ठता की लड़ाई भी है।
- अकाली दल के लिए यह चुनौती है कि वह खुद को “पंथ रक्षक” की छवि में बनाए रखे।
- वहीं आप सरकार के लिए यह अवसर है कि वह खुद को जवाबदेही और पारदर्शिता की राजनीति का प्रतीक साबित करे।
क्या धर्म और राजनीति की रेखा खिंचेगी?
मुख्यमंत्री का यह कहना कि “गुरु साहिब से जुड़े मामलों पर राजनीति करना सबसे बड़ा अपराध है” अपने आप में एक बड़ा नैरेटिव है। असल सवाल यही है क्या यह बयान वास्तव में धर्म और राजनीति के बीच स्पष्ट रेखा खींचेगा, या फिर यह भी आने वाले चुनावी संघर्ष का हिस्सा बन जाएगा?
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आगे क्या?
अब पंजाब की राजनीति तीन अहम सवालों के इर्द-गिर्द घूम रही है,
- क्या 328 स्वरूपों के मामले में निष्पक्ष और समयबद्ध जांच होगी?
- क्या SGPC और अकाली दल अपने ऊपर लगे आरोपों का ठोस जवाब देंगे?
- और सबसे बड़ा सवाल क्या सिख पंथ की पवित्र संस्थाओं को राजनीतिक स्वार्थ से अलग रखा जा सकेगा?
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फिलहाल इतना तय है कि भगवंत मान का यह हमला केवल एक बयान नहीं, बल्कि पंजाब की राजनीति में धर्म, सत्ता और जवाबदेही के रिश्ते को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश है। आने वाले दिनों में यही मुद्दा तय करेगा कि यह टकराव सुधार की शुरुआत बनेगा या फिर सियासी ध्रुवीकरण को और गहरा करेगा।
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