Lucknow Mayor Sushma Kharakwal: लखनऊ की मेयर सुषमा खड़खड़वाल एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। इस बार मामला झुग्गी-बस्तियों में कथित “अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या” लोगों की तलाश को लेकर है। हाल ही में उनके द्वारा किए गए निरीक्षणों ने न सिर्फ विपक्ष को आक्रामक कर दिया, बल्कि नगर निगम और उनकी अपनी पार्टी भाजपा के भीतर भी बहस छेड़ दी है। लगभग दो साल के कार्यकाल में सुषमा खड़खड़वाल लगातार सुर्खियों में रही हैं और उनके काम करने के तरीके को लेकर राय बंटी हुई है।
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सुषमा खड़खड़वाल ने हाल के दिनों में लखनऊ की कई झुग्गी-बस्तियों का दौरा किया और दावा किया कि वहां बड़ी संख्या में अवैध रूप से रह रहे लोग मौजूद हैं, जिनमें बांग्लादेशी नागरिक और रोहिंग्या भी शामिल हैं। विपक्ष ने इसे डर फैलाने और एक खास समुदाय को निशाना बनाने की कोशिश बताया। इससे पहले भी वह इसी तरह के दावे कर चुकी हैं। इस साल की शुरुआत में उन्होंने कथित सर्वे के आधार पर कहा था कि लखनऊ में दो लाख से ज्यादा अवैध बांग्लादेशी नागरिक रह रहे हैं, लेकिन नगर निगम ने उनके इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया था। निगम अधिकारियों ने साफ कहा था कि इस तरह का कोई आधिकारिक सर्वे नहीं हुआ है।
इन आलोचनाओं के बावजूद सुषमा खड़खड़वाल अपने रुख पर कायम हैं। उनका कहना है कि वह जनता द्वारा ऐतिहासिक बहुमत से चुनी गई हैं और लोगों की सुरक्षा उनके लिए सबसे ऊपर है। उन्होंने यह भी दावा किया कि लगभग 160 ऐसे लोग, जो सफाईकर्मी के रूप में काम कर रहे थे और जिन पर अवैध होने का संदेह था, अब अपने काम छोड़कर जा चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगला अभियान अवैध बिजली कनेक्शनों के खिलाफ होगा और झुग्गी-बस्तियों में दिए गए ऐसे कनेक्शन काटे जाएंगे। साथ ही उन्होंने लोगों से अपील की कि वे ऐसे संदिग्ध लोगों को अपने यहां काम पर न रखें, क्योंकि यह देश और नागरिकों की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है।
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सुषमा खड़खड़वाल का राजनीतिक सफर भी दिलचस्प है। जब भाजपा ने 2023 में उन्हें लखनऊ का मेयर उम्मीदवार घोषित किया, तो यह फैसला कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था। उस समय पार्टी ने मौजूदा मेयर संयुक्ता भाटिया को टिकट नहीं दिया और एक ऐसे चेहरे को आगे किया, जिसका कोई बड़ा चुनावी रिकॉर्ड नहीं था। सुषमा खड़खड़वाल को एक जमीनी कार्यकर्ता के रूप में पेश किया गया। उन्होंने भाजपा संगठन में तीन दशकों से ज्यादा समय तक काम किया है और महिला मोर्चा सहित कई जिम्मेदार पद संभाले हैं, खासकर अवध क्षेत्र में।
उत्तराखंड मूल की ब्राह्मण नेता होने के कारण उन्हें लखनऊ में ब्राह्मण और पहाड़ी वोटों को साधने की रणनीति के तहत भी देखा गया। उनके पति पूर्व सैनिक हैं, जिसे पार्टी ने उनके पक्ष में एक सकारात्मक पहलू के रूप में प्रचारित किया। भाजपा ने उन्हें किसी राजनीतिक परिवार से नहीं, बल्कि संगठन की मेहनत से निकली नेता के तौर पर पेश किया।
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हालांकि, मेयर बनने के बाद उनका प्रशासनिक तरीका लगातार विवादों में रहा है। कई पार्षदों का आरोप है कि वह बिना चर्चा के फैसले थोपने की कोशिश करती हैं और निगम को ‘तानाशाही’ अंदाज में चलाती हैं। इस वजह से नगर निगम के कामकाज में बार-बार रुकावटें आई हैं। हालात इतने बिगड़ गए थे कि एक समय उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक को मेयर और तत्कालीन नगर आयुक्त इंद्रजीत सिंह के बीच मध्यस्थता करनी पड़ी थी।
हाल ही में मौजूदा नगर आयुक्त गौरव कुमार के साथ भी उनका टकराव सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक इस टकराव की वजह से कई अहम नागरिक परियोजनाओं में देरी हुई। अक्टूबर में नगर निगम की कार्यकारी समिति की एक बैठक बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म हो गई, जब सुषमा खड़खड़वाल ने सार्वजनिक रूप से अधिकारियों पर सहयोग न करने का आरोप लगाया। बताया जाता है कि इस खींचतान के चलते कई विकास कार्य अटक गए थे और अंततः वरिष्ठ भाजपा नेताओं को हस्तक्षेप कर हालात संभालने पड़े।
यह असंतोष सिर्फ विपक्ष या अधिकारियों तक सीमित नहीं है। भाजपा के भीतर भी कुछ पार्षद खुलकर उनके काम करने के तरीके की आलोचना कर चुके हैं। उनका कहना है कि मेयर सामूहिक नेतृत्व की बजाय एकतरफा फैसले लेना चाहती हैं, जिससे पार्टी और निगम दोनों को नुकसान हो रहा है।
वहीं, सुषमा खड़खड़वाल के करीबी लोग इन आरोपों को अलग नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि वह एक जमीनी कार्यकर्ता रही हैं और उनकी कार्यशैली भी उसी तरह की है। वह अचानक निरीक्षण करती हैं, दफ्तरों में जाकर कर्मचारियों की मौजूदगी जांचती हैं और खुद मौके पर जाकर हालात देखती हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि इसी वजह से कुछ अधिकारी और नेता असहज महसूस करते हैं, क्योंकि पहले ऐसा सख्त और सक्रिय रवैया नहीं देखा गया था।
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कुल मिलाकर, सुषमा खड़खड़वाल एक ऐसी नेता के रूप में उभरी हैं, जिनका नाम लगातार विवादों से जुड़ा रहता है। उनके समर्थक उन्हें जनता की सुरक्षा और जवाबदेही पर जोर देने वाली मजबूत मेयर मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें विभाजनकारी राजनीति और प्रशासनिक टकराव का प्रतीक बताते हैं। झुग्गी-बस्तियों में अवैध प्रवासियों की तलाश वाला ताजा मामला इस लंबे विवादास्पद सफर की एक और कड़ी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि उनकी यह आक्रामक कार्यशैली उन्हें राजनीतिक रूप से मजबूत बनाती है या फिर पार्टी और प्रशासन के भीतर विरोध को और गहरा कर देती है।
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