Mussoorie Forest Boundary Pillars Missing Case: मसूरी वन प्रभाग में 7,375 बाउंड्री पिलर गायब मामला उत्तराखंड में वन संरक्षण से जुड़े अब तक के सबसे बड़े और गंभीर प्रकरणों में शामिल हो गया है। यह मामला अब सीधे उत्तराखंड हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां अदालत ने इसे केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संभावित संगठित साजिश मानते हुए सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद वन विभाग, शासन और केंद्र सरकार तक हलचल मच गई है।
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24 दिसंबर 2025 को नैनीताल में हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मनोज तिवारी की खंडपीठ ने केंद्र सरकार, उत्तराखंड सरकार, केंद्रीय जांच ब्यूरो, भारतीय सर्वेक्षण विभाग और सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय सशक्त समिति को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में जवाब मांगा। अदालत ने स्पष्ट कहा कि हजारों बाउंड्री पिलरों का गायब होना सीधे तौर पर वन भूमि की सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर हमला है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
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यह पूरा मामला एक जनहित याचिका (PIL) के जरिए सामने आया, जिसे पर्यावरण कार्यकर्ता नरेश चौधरी ने दायर किया। याचिका में आरोप लगाया गया कि मसूरी वन प्रभाग के हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र की सीमाएं जानबूझकर कमजोर की गईं, जिससे अवैध निर्माण, रिसॉर्ट, होटल और निजी परियोजनाओं को बढ़ावा मिला। याचिकाकर्ता ने वैज्ञानिक और जियो-रेफरेंसिंग सर्वे की मांग की है ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
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इस घोटाले की जड़ें वर्ष 2023 से जुड़ी हैं, जब तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक (वर्किंग प्लान) संजीव चतुर्वेदी के निर्देश पर भौतिक सत्यापन कराया गया। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि कुल 12,321 बाउंड्री पिलरों में से 7,375 पिलर मौके से गायब थे, यानी करीब 60 प्रतिशत से अधिक। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि करीब 80 प्रतिशत पिलर मसूरी और राजपुर जैसे हाई-रियल एस्टेट क्षेत्रों में गायब पाए गए, जहां भूमि की कीमतें करोड़ों में हैं।
रिपोर्ट के अनुसार भद्रीगाड़, जौनपुर, देवलसारी, कैंपटी, मसूरी और रायपुर रेंज में सबसे ज्यादा पिलर लापता हैं। यही वे इलाके हैं जहां अवैध निर्माण और भूमि उपयोग में तेजी से बदलाव देखा गया। संजीव चतुर्वेदी द्वारा तैयार की गई 300 पन्नों की रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी गई, जिस पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भी मामले को बेहद गंभीर माना।
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इसके बाद जून और अगस्त 2025 में CBI और प्रवर्तन निदेशालय से जांच की मांग उठी। आरोप है कि कुछ अधिकारियों की संपत्तियों में असामान्य वृद्धि हुई है, जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। राज्य सरकार द्वारा बनाई गई नई समिति पर भी सवाल खड़े हुए हैं, जिसे तथ्यों को कमजोर करने की आशंका जताई गई है।
बाउंड्री पिलर वन भूमि की पहचान और सुरक्षा की पहली दीवार होते हैं। इनके बिना वन क्षेत्र अतिक्रमण के लिए खुला मैदान बन जाता है। यही कारण है कि हाईकोर्ट की सख्ती को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में निर्णायक कदम माना जा रहा है। अब 11 फरवरी 2026 की अगली सुनवाई यह तय करेगी कि दोषियों पर कार्रवाई होगी या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।
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