Devkinandan Thakur KKR Bangladesh Controversy: देश की सियासत, आस्था और खेल तीनों के चौराहे पर खड़ा यह सवाल आज पूरे देश में गूंज रहा है। कथामंच से लेकर सोशल मीडिया और टीवी डिबेट तक एक ही नाम चर्चा में है देवकीनंदन ठाकुर। उन्होंने कोलकाता नाइट राइडर्स और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) को लेकर जो सवाल उठाए, उसने केवल खेल प्रशासन ही नहीं, बल्कि देश के ज़मीर को भी कटघरे में खड़ा कर दिया।
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देवकीनंदन ठाकुर का सवाल सीधा और तीखा है ‘क्या बांग्लादेश के बिना क्रिकेट नहीं होगा?’ और इससे भी बड़ा सवाल ‘क्या बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार होता ही रहेगा और भारत आंख मूंदे बैठा रहेगा?’ यह कोई साधारण बयान नहीं था। यह उस आक्रोश की अभिव्यक्ति थी, जो उन खबरों से जन्मा है जिनमें बताया गया कि बांग्लादेश में हालिया समय में करीब 13 हिंदुओं की दर्दनाक हत्या की गई। मंदिरों पर हमले, घरों को जलाया जाना, महिलाओं के साथ बर्बरता ये सब किसी एक घटना का हिस्सा नहीं, बल्कि एक लम्बे और भयावह सिलसिले की कड़ियां हैं।
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धर्म, राष्ट्र और खेल: टकराव की असहज सच्चाई
देवकीनंदन ठाकुर ने कथामंच से यह सवाल उठाकर उस असहज सच्चाई को सामने रखा, जिससे अक्सर बचा जाता रहा है। उनका कहना है कि जब एक ओर बांग्लादेश में हिंदू असुरक्षित हैं, तब दूसरी ओर उसी देश के खिलाड़ियों को करोड़ों रुपये देकर भारतीय फ्रेंचाइज़ियां खरीद रही हैं। यह केवल क्रिकेट का मसला नहीं है, यह राष्ट्रीय संवेदनशीलता और सांस्कृतिक जिम्मेदारी का प्रश्न है। उन्होंने कहा कि यह वही देवकीनंदन ठाकुर हैं जो पहले भी बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचार के समय खुलकर सामने आए थे। तब भी उन्होंने चुप्पी नहीं साधी, और आज भी नहीं साध रहे। उनके शब्दों में, ‘मैं धर्मयोद्धा हूं, राजनीति मेरा उद्देश्य नहीं, लेकिन हिंदुओं की पीड़ा पर मौन रहना पाप है।‘
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BCCI की चुप्पी पर सवाल
देवकीनंदन ठाकुर का सबसे बड़ा हमला BCCI की कथित चुप्पी पर रहा। उन्होंने पूछा- ‘जब पूरा देश सवाल कर रहा है, तब BCCI इस मामले पर संज्ञान क्यों नहीं ले रही?; यह सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि BCCI सिर्फ एक खेल संस्था नहीं, बल्कि भारत की सबसे ताकतवर और प्रभावशाली खेल संस्थाओं में से एक है। उसकी हर नीति, हर फैसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदेश देता है।
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मुस्तफिजुर रहमान और आईपीएल का फुलस्टॉप
इसी दबाव, जनाक्रोश और लगातार उठती आवाज़ों के बीच मुस्तफिजुर रहमान का आईपीएल सफर अचानक थम गया। BCCI ने KKR को साफ निर्देश दिया कि वह मुस्तफिजुर को अपने स्क्वाड से रिलीज करे। यह फैसला भले ही औपचारिक रूप से “प्रशासनिक” बताया जा रहा हो, लेकिन इसके पीछे का सामाजिक और राजनीतिक दबाव अब किसी से छिपा नहीं है।
यह वही मुस्तफिजुर रहमान हैं जिन्हें आईपीएल ऑक्शन में खरीदे जाने के बाद से ही विवादों ने घेर लिया था। देवकीनंदन ठाकुर के सवालों ने उस विवाद को राष्ट्रीय विमर्श में बदल दिया। सोशल मीडिया पर #BoycottBangladeshPlayers से लेकर टीवी चैनलों की बहसों तक, हर जगह यही सवाल क्या व्यापार और मनोरंजन, मानवाधिकार से ऊपर हैं?
कुछ गद्दार” और राष्ट्रवादी तेवर
देवकीनंदन ठाकुर ने अपने भाषण में उन लोगों पर भी निशाना साधा, जो उनके अनुसार “पाकिस्तान को चंदा देने” या बांग्लादेश के प्रति अति-प्रेम दिखाने में लगे हैं। यह बयान भले ही तीखा हो, लेकिन यह उस गुस्से को दर्शाता है जो आम हिंदू समाज में उबाल मार रहा है। उनके समर्थकों का कहना है कि यह समय तटस्थता का नहीं, बल्कि स्पष्ट पक्ष लेने का है।
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क्या यह सिर्फ खेल का मामला है?
इस पूरे प्रकरण ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है क्या खेल को राजनीति और धर्म से पूरी तरह अलग रखा जा सकता है? देवकीनंदन ठाकुर का जवाब है नहीं, जब बात मानवाधिकारों और धार्मिक उत्पीड़न की हो। उनका तर्क है कि क्रिकेट जैसे मंचों का इस्तेमाल संदेश देने के लिए भी होता है, और भारत जैसे देश से निकला संदेश पूरी दुनिया सुनती है।
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जनभावना बनाम कॉर्पोरेट क्रिकेट
आईपीएल आज एक अरबों का उद्योग है। फ्रेंचाइज़ियां, स्पॉन्सर, ब्रॉडकास्टिंग सब कुछ कॉर्पोरेट गणित से चलता है। लेकिन देवकीनंदन ठाकुर ने इस गणित के सामने जनभावना को खड़ा कर दिया है। उनका कहना है कि अगर राष्ट्र और धर्म की पीड़ा को नजरअंदाज कर दिया गया, तो यह क्रिकेट की आत्मा पर सवाल होगा।
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दबाव बना रहेगा
मुस्तफिजुर रहमान का रिलीज होना भले ही एक तात्कालिक फैसला हो, लेकिन देवकीनंदन ठाकुर की आवाज़ यहीं थमने वाली नहीं है। उन्होंने साफ कहा है कि जब तक बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती और भारतीय संस्थाएं इस पर स्पष्ट रुख नहीं अपनातीं, तब तक सवाल उठते रहेंगे। यह सिर्फ एक खिलाड़ी या एक टीम का मुद्दा नहीं रहा। यह उस नैतिक दबाव की कहानी है, जिसमें कथामंच से उठी आवाज़ ने देश की सबसे ताकतवर क्रिकेट संस्था को भी फैसले लेने पर मजबूर कर दिया। और शायद यही देवकीनंदन ठाकुर की सबसे बड़ी ताकत है वे सवाल पूछते हैं, और सवालों को अनसुना करना आसान नहीं रहने देते।
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