Doctor Fees Regulation India: देश में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत एक बार फिर चर्चा में है। इलाज का खर्च आम लोगों की जेब पर भारी पड़ रहा है। इसी बीच डॉक्टरों की फीस को लेकर नई मांग सामने आई है। मांग है कि फीस डॉक्टर की डिग्री और योग्यता के अनुसार तय हो। दूसरी ओर देश के व्यापारी भी बजट से बड़ी उम्मीद लगाए बैठे हैं। व्यापारियों ने सरकार से कई अहम राहतों की मांग रखी है। इन दोनों मुद्दों का सीधा असर आम नागरिक पर पड़ता है।
सरकार के लिए संतुलन बनाना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
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डॉक्टरों की फीस पर क्यों उठ रहा सवाल
पिछले कुछ वर्षों में निजी इलाज काफी महंगा हुआ है। एक ही बीमारी के इलाज की फीस अलग-अलग डॉक्टरों में बदल जाती है। मरीजों के लिए यह अंतर समझना आसान नहीं होता। इसी वजह से फीस तय करने की मांग तेज हुई है। मरीज संगठनों का कहना है कि कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। एमबीबीएस, एमडी और सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की फीस अलग-अलग होती है। लेकिन इसके पीछे कोई तय मापदंड नहीं दिखता।
कई बार मरीज बिना जानकारी के ज्यादा भुगतान कर देता है। यदि फीस का ढांचा बने, तो भ्रम कम हो सकता है। मरीज इलाज से पहले खर्च का अंदाजा लगा सकेगा। इससे स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी।
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फीस निर्धारण से मरीजों को क्या लाभ होगा
डिग्री के अनुसार फीस तय होने से सीधा फायदा मरीजों को होगा। इलाज को लेकर भरोसा मजबूत होगा। मरीज जान सकेगा कि वह किस स्तर के डॉक्टर से इलाज करा रहा है। ग्रामीण और छोटे शहरों में यह व्यवस्था ज्यादा असरदार हो सकती है। वहां लोग अक्सर महंगे निजी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं। एमबीबीएस डॉक्टरों की भूमिका वहां अहम हो सकती है। किफायती इलाज लोगों को स्थानीय स्तर पर मिल सकेगा। स्वास्थ्य सेवाओं पर अनावश्यक खर्च भी घटेगा। मरीज बिना डर इलाज कराने आगे आएगा। समय पर इलाज मिलने से गंभीर बीमारियां भी कम होंगी।
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डॉक्टर समुदाय की चिंताएं और तर्क
हालांकि डॉक्टरों का एक वर्ग इस प्रस्ताव को लेकर अपनी चिंताएं भी जता रहा है। उनका कहना है कि केवल डिग्री के आधार पर फीस तय करना व्यावहारिक नहीं है। अनुभव, इलाज की जटिलता, अस्पताल का इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक तकनीक जैसे कई अन्य कारक भी फीस को प्रभावित करते हैं।
डॉक्टर संगठनों का तर्क है कि मेडिकल शिक्षा बेहद महंगी है और वर्षों की मेहनत के बाद डॉक्टर बनते हैं। ऐसे में यदि फीस पर सख्त नियंत्रण लगाया गया, तो निजी प्रैक्टिस और निवेश पर असर पड़ सकता है। उनका सुझाव है कि सरकार यदि कोई ढांचा बनाती है, तो उसमें डॉक्टरों से भी संवाद किया जाए और सभी पक्षों की राय शामिल की जाए।
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बजट को लेकर व्यापारियों की प्रमुख मांगें
स्वास्थ्य के साथ-साथ देश का व्यापार जगत भी आगामी बजट पर टकटकी लगाए बैठा है। व्यापारियों ने सरकार से टैक्स में राहत, आसान ऋण और व्यापार-अनुकूल नीतियों की मांग की है। खासतौर पर छोटे और मध्यम व्यापारियों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और ब्याज दरों के चलते उनका मुनाफा घट रहा है।
व्यापारी संगठनों का सुझाव है कि जीएसटी की दरों को और सरल बनाया जाए, अनुपालन प्रक्रिया आसान हो और छोटे कारोबारियों को तकनीकी सहायता दी जाए। इसके अलावा, डिजिटल भुगतान और ई-कॉमर्स से जुड़े नियमों में भी स्पष्टता की मांग की जा रही है, ताकि पारंपरिक और ऑनलाइन व्यापार के बीच संतुलन बना रहे।
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संतुलन बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती
डॉक्टरों की फीस निर्धारण और व्यापारियों की बजट मांगें दोनों ही सरकार के लिए संतुलन की परीक्षा हैं। एक ओर स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और किफायती बनाना जरूरी है, तो दूसरी ओर व्यापार और उद्योग को बढ़ावा देना भी उतना ही अहम है।
नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार चरणबद्ध तरीके से सुधार लागू करे, तो बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। डॉक्टरों की फीस के लिए दिशानिर्देश बनाए जा सकते हैं, न कि सख्त नियंत्रण। वहीं बजट में व्यापारियों को राहत देकर रोजगार सृजन और आर्थिक विकास को गति दी जा सकती है।
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इन दोनों मांगों का उद्देश्य एक ही है आम नागरिक का जीवन आसान बनाना और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना। यदि सरकार इन सुझावों को गंभीरता से लेकर संतुलित निर्णय लेती है, तो स्वास्थ्य और व्यापार दोनों क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है।
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