Ghazwa-e-Hind Nahi Bhagwa-e-Hind: कोलकाता में आयोजित सनातन संस्कृति संसद इस बार आध्यात्मिक ऊर्जा, सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्रधर्म के संदेश से सराबोर रही। इस ऐतिहासिक आयोजन में बागेश्वर धाम सरकार के मुखिया धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की उपस्थिति ने कार्यक्रम को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। मंच पर पहुंचते ही उनका एक सशक्त संदेश गूंजा ‘Ghazwa-e-Hind Nahi, Bhagwa-e-Hind’, जिसने सभा के माहौल को जोश, उत्साह और गौरव से भर दिया। यह वाक्य न केवल सनातन संस्कृति की रक्षा का प्रतीक बना बल्कि भारत की आध्यात्मिक पहचान और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का उद्घोष भी साबित हुआ।
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धीरेंद्र शास्त्री का कोलकाता में प्रखर सांस्कृतिक संदेश
कोलकाता की यह भूमि, जो सदियों से आध्यात्मिकता, भक्ति, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की धुरी रही है, वहाँ धीरेंद्र शास्त्री का आगमन अपने आप में एक संदेश माना गया कि राष्ट्रधर्म और संस्कारों की चेतना अब पूरे देश में एकजुट हो रही है। सनातन संस्कृति संसद में हजारों लोग जुटे थे, जिनमें युवा, बुजुर्ग, महिला-पुरुष सभी शामिल थे। हर किसी के मन में उत्सुकता थी कि बागेश्वर धाम सरकार भारत की वर्तमान सांस्कृतिक परिस्थितियों और चुनौतियों पर क्या दृष्टिकोण साझा करेंगे।
अपने संबोधन में शास्त्री ने स्पष्ट कहा कि भारत की आत्मा सनातन धर्म में बसती है और इस धर्म का आधार प्रेम, शांति, करुणा और सत्य है। लेकिन जब कभी सनातन पर संकट आता है, तो संत समाज, समाज की शक्ति और राष्ट्र की सामूहिक चेतना इसे बचाने के लिए आगे आती है। इसी संदर्भ में उन्होंने जोर देकर कहा, जो लोग भारत में Ghazwa-e-Hind का भ्रम फैलाते हैं, वे इतिहास नहीं समझते। भारत किसी आक्रमण का केंद्र नहीं, बल्कि आध्यात्मिक नेतृत्व का ध्रुव तारा है। हमारे लिए Ghazwa-e-Hind नहीं, Bhagwa-e-Hind सत्य है।‘
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Ghazwa-e-Hind Nahi, Bhagwa-e-Hind
यह संदेश केवल किसी विचारधारा का प्रचार नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस आत्मशक्ति की याद दिलाता है, जिसने अनेकों सभ्यताओं को मार्ग दिखाया है। भगवा ध्वज यहां किसी संप्रदाय नहीं, बल्कि साहस, ज्ञान और त्याग का प्रतीक है। शास्त्री के इस वाक्य ने युवाओं में विशेष उत्साह पैदा किया और सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।
कार्यक्रम में धीरेंद्र शास्त्री ने समान नागरिक संहिता, धार्मिक सद्भाव, शिक्षण-संस्कार और सनातन संस्कृति की अनिवार्यता जैसे मुद्दों पर भी सारगर्भित दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि भारत को मजबूत बनाने के लिए सबसे ज़रूरी है सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक चेतना का जागरण। जब देश का युवा अपने धर्म, अपनी विरासत और अपनी मातृभूमि पर गर्व महसूस करेगा, तभी राष्ट्र जगत में नेतृत्व कर सकेगा।
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सनातन संस्कृति संसद में उमड़ी भक्तों और युवाओं की भीड़
सभा के अंत में उन्होंने बंगाल की जनता की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह भूमि रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ टैगोर जैसी विभूतियों की भूमि है, जिसने सदियों से भारत को नई दिशा दी है। ऐसे प्रदेश में सनातन संस्कृति संसद का आयोजन होना अपने आप में एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत है।
धीरेंद्र शास्त्री का यह संदेश ‘Ghazwa-e-Hind Nahi, Bhagwa-e-Hind’ अब एक राष्ट्रीय भाव बन चुका है। यह केवल राजनीतिक कथन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के उस मूल सत्य का उद्घोष है कि भारत की पहचान आक्रमण से नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता और मानव कल्याण से है। यही कारण है कि उनका यह बयान भारत की संस्कृति, राष्ट्रधर्म और भविष्य की चेतना को एक नई दिशा देता है।
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यह आयोजन न केवल सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बना, बल्कि यह भी साबित कर गया कि भारत का सनातन समाज एकजुट है, जागरूक है और अपने धर्म, राष्ट्रऔर संस्कृति की रक्षा के लिए दृढ़प्रतिज्ञ है। इसीलिए धीरेंद्र शास्त्री का यह नारा आज करोड़ों लोगों के मन में गर्व का भाव जगाता है. ‘Ghazwa-e-Hind नहीं… Bhagwa-e-Hind!’
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