उज्जैन की सुबह हमेशा की तरह धूप, धुएं और देवत्व के मिश्रण से भरी हुई थी। लेकिन आज महाकाल की नगरी में कुछ अलग था। महाकालेश्वर मंदिर परिसर में एक साधारण-सी वर्दी रहित शख़्स दाख़िल हुआ लेकिन उसकी चाल, उसकी आंखों की थकान और कंधों पर दिखता अदृश्य बोझ बता रहा था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि करगिल युद्ध का वीर दीपचंद है। वह वही युद्ध, जिसकी बर्फ़ीली चोटियों पर जवानों ने सिर्फ गोलियां ही नहीं झेली थीं, बल्कि देश के भरोसे और अपनी कसमों को भी निभाया था।
महाकाल के दरबार में पहुंचते ही दीपचंद की आंखों में एक चमक उभरी। यह चमक सिर्फ श्रद्धा की नहीं थी, बल्कि उस अदम्य साहस की थी जो कारगिल की चोटियों पर 1999 में भारतीय सेना ने दुनिया के सामने दिखाया था। महाकाल की नगरी में यह एक सैनिक का आना उस याद दिलाने जैसा था कि मंदिरों की शांति, आरती की गूंज और भक्तों की भीड़… इन सबके पीछे कहीं न कहीं उन असंख्य सैनिकों की कुर्बानियां हैं, जिनके कारण देश में यह सुरक्षा और सुकून संभव है।
दीपचंद का यह दौरा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक है। जब एक सैनिक मंदिर आता है, तो वह सिर्फ पूजा करने नहीं आता वह देश के नागरिकों को याद दिलाने आता है कि उसके संघर्ष की कहानी अब भी पूरी नहीं हुई है।करगिल के बाद भारत ने देशभक्ति पर कई भाषण दिए, राजनीतिक मंचों पर तिरंगे खूब लहराए गए। लेकिन वही सैनिक जब अपने गाँव लौटता है, तो उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वही संघर्ष दोबारा झेलना पड़ता है सरकारी फाइलों में चक्कर, पेंशन की देरी, इलाज की कमी और सम्मान के नाम पर जश्न से ज़्यादा औपचारिकताएं। क्या देश सैनिकों से सिर्फ युद्ध जीतने की उम्मीद रखता है, या युद्ध के बाद उनके जीवन को आसान बनाने की भी कोई जिम्मेदारी लेता है?
मंदिर प्रशासन ने दीपचंद के दर्शन की तस्वीरें और वीडियो जारी किए। यह कदम अच्छी पहल मानी जा सकती है, लेकिन यहीं बात एक और सवाल खड़ा करती है सैनिकों को अगर सचमुच सम्मान देना है, तो यह मंदिरों, कार्यक्रमों और विजुअल्स से आगे बढ़कर होना चाहिए। यह तब होगा जब सैनिकों और उनके परिवारों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर वास्तविक कदम लिए जाएं। महाकाल के समक्ष दीपचंद ने सिर्फ माथा नहीं टेका, बल्कि शायद वह उन साथियों को भी याद कर रहे होंगे, जो हिमालय की चोटियों पर देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए।
उनकी उपस्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि, क्या हम उन सैनिकों के सपनों वाला देश बना पाए हैं, जिनके बलिदान पर आज भी हम गर्व करते हैं?, महाकाल की नगरी में उनका यह दर्शन देश की चेतना को झकझोरने के लिए काफी है कि सुरक्षा सिर्फ सीमाओं पर नहीं, समाज की सोच में भी होनी चाहिए।
