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INDIAN ARMY NEWSNational

Kishtwar Encounter: ऑपरेशन त्राशी बना जैश के आतंकियों का काल, जंगल में बने बंकरनुमा ठिकाने तबाह जानिये पूरा मामला

किश्तवाड़ मुठभेड़ में ऑपरेशन त्राशी जारी

KARTIK SHARMA
Last updated: जनवरी 19, 2026 10:27 अपराह्न
KARTIK SHARMA - Sub Editor Published जनवरी 20, 2026
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Kishtwar Anti Terror Operation Trashi
किश्तवाड़ के जंगलों में ऑपरेशन त्राशी के दौरान सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़।Edited by: Tv Today Bharat Desk
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Highlights
  • जैश आतंकियों के बंकरनुमा ठिकाने ध्वस्त
  • ऑपरेशन त्राशी में एक जवान वीरगति को प्राप्त
  • किश्तवाड़ के जंगलों में बड़ा आतंकरोधी अभियान
  • पाकिस्तानी आतंकियों की मौजूदगी से बढ़ी चुनौती
  • जम्मू क्षेत्र में सुरक्षा बलों की सख्त घेराबंदी

Kishtwar Encounter Operation Trashi: जम्मू-कश्मीर का पहाड़ी जिला किश्तवाड़ एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से सुर्खियों में है। वजह न तो दुनिया के सबसे महंगे मसालों में शामिल केसर की पैदावार है और न ही यहां की जलविद्युत परियोजनाएं, बल्कि सुरक्षाबलों द्वारा चलाया गया ऑपरेशन त्राशी है। यह अभियान उन आतंकियों के खिलाफ शुरू किया गया, जो किश्तवाड़ के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों को अपना नया ठिकाना बनाने की कोशिश कर रहे थे।

किश्तवाड़ के जंगलों में ऑपरेशन त्राशी के दौरान सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़।

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ऑपरेशन त्राशी के दौरान जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने घात लगाकर हमला किया, जिसमें एक सैन्यकर्मी वीरगति को प्राप्त हुआ। सुरक्षाबलों ने आतंकियों के बंकरनुमा ठिकाने को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया, हालांकि आतंकी फिलहाल घेराबंदी तोड़कर भागने में सफल रहे। यह मौजूदा वर्ष में किश्तवाड़ में आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच पहली मुठभेड़ मानी जा रही है।

ऑपरेशन त्राशी में जैश आतंकियों का ठिकाना तबाह, तलाशी अभियान जारी।

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क्या है ऑपरेशन त्राशी

ऑपरेशन त्राशी दरअसल एक व्यापक आतंकरोधी अभियान है, जिसे किश्तवाड़ और उसके आसपास के जंगलों में सक्रिय आतंकियों को खोजकर खत्म करने के उद्देश्य से शुरू किया गया। इस ऑपरेशन में थलसेना, विशेष बल और खुफिया एजेंसियों का समन्वय है। इसका मकसद सिर्फ आतंकियों को मार गिराना नहीं, बल्कि उनके नेटवर्क, ठिकानों और सप्लाई चैन को पूरी तरह तोड़ना है।

बंकर जैसा ठिकाना, जिसने चौंकाया

इस अभियान में सबसे चौंकाने वाली बात आतंकियों का ठिकाना रहा। यह कोई साधारण अस्थायी ठिकाना नहीं था, बल्कि एक छोटे बंकर जैसा निर्माण था। पेड़ों के बीच पहाड़ी ढलान पर बने इस ठिकाने को इस तरह छिपाया गया था कि पहली नज़र में किसी को इसकी भनक तक न लगे।
यहां आतंकियों ने लगभग छह महीने का राशन, गोला-बारूद और दैनिक उपयोग का सामान जमा कर रखा था। संरचना इतनी मजबूत थी कि यह अग्रिम इलाकों में सेना द्वारा बनाए गए निगरानी मोर्चों जैसी प्रतीत होती थी।

ऑपरेशन त्राशी में जैश आतंकियों का ठिकाना तबाह, तलाशी अभियान जारी।

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किश्तवाड़ में फिर क्यों सक्रिय हो रहे आतंकी

करीब 15 साल पहले तक किश्तवाड़ को लगभग आतंकवाद मुक्त माना जा रहा था, लेकिन बीते आठ वर्षों में हालात बदले हैं। जिले की भौगोलिक बनावट, घने जंगल, ऊंची पहाड़ियां और सीमित आबादी वाले क्षेत्र आतंकियों के लिए अनुकूल साबित हो रहे हैं। सूत्रों के अनुसार किश्तवाड़ में सक्रिय आतंकियों में कुछ स्थानीय चेहरे भी शामिल हैं, जबकि बड़ी संख्या में पाकिस्तानी आतंकी इस क्षेत्र में घुसपैठ कर चुके हैं या सक्रिय हैं।

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पाकिस्तानी आतंकियों की मौजूदगी

सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि किश्तवाड़ में सक्रिय अधिकतर आतंकी पाकिस्तानी मूल के हैं। ये आतंकी न केवल इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों से भली-भांति परिचित हैं, बल्कि जंगल वारफेयर, माउंटेन वारफेयर और गुरिल्ला तकनीकों में भी पूरी तरह प्रशिक्षित हैं।
स्थानीय ओवरग्राउंड वर्करों (OGWs) के जरिए इन्हें समय-समय पर रसद और सूचनाएं मिलती रहती हैं।

हैंडलरों से कैसे रखते हैं संपर्क

आतंकी आम नागरिकों के संपर्क में तभी आते हैं, जब उन्हें किसी विशेष जरूरत की पूर्ति करनी होती है। सीमा पार बैठे अपने हैंडलरों से ये कुछ खास एन्क्रिप्टेड मोबाइल ऐप्स के जरिए संपर्क करते हैं। ये एक ही ओवरग्राउंड वर्कर पर निर्भर नहीं रहते और किसी बाहरी व्यक्ति को अपने ठिकाने तक पहुंचने नहीं देते, ताकि सुरक्षा एजेंसियों तक कोई सुराग न पहुंचे।

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जंगलों में ही जीवन, समूह में मूवमेंट

किश्तवाड़ से लेकर कठुआ तक सक्रिय आतंकियों की एक समान रणनीति है जंगलों में ही रहना। जहां प्राकृतिक गुफाएं मिलती हैं, उनका इस्तेमाल किया जाता है, और जहां नहीं मिलतीं, वहां जमीन खोदकर पत्थरों से अस्थायी लेकिन सुरक्षित ठिकाने बना लिए जाते हैं।
ये आतंकी आमतौर पर दो से चार के समूह में चलते हैं और सुरक्षाबलों की गतिविधियों पर लगातार नज़र रखते हैं। उन्हें यह तक अंदाजा होता है कि किसी ग्रामीण से संपर्क के बाद सुरक्षाबल कितनी देर में उस इलाके तक पहुंच सकते हैं।

स्थानीय नेटवर्क और भौगोलिक कॉरिडोर

किश्तवाड़ की भौगोलिक स्थिति आतंकियों के लिए एक कॉरिडोर की तरह काम करती है। यह जिला डोडा, उधमपुर, कठुआ और कश्मीर घाटी के अनंतनाग से कई प्राकृतिक रास्तों के जरिए जुड़ा हुआ है। ऊपरी इलाकों में मौजूद चरागाहें, जो सर्दियों में खाली रहती हैं, आतंकियों के लिए अस्थायी ठिकानों के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं। पाकिस्तान में बैठे आतंकियों का स्थानीय नेटवर्क यहां आंख, नाक और कान का काम करता है।

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बीते वर्ष किश्तवाड़ में हुई प्रमुख मुठभेड़ें

  • 12 अप्रैल 2025: छातरु के ऊपरी हिस्से में तीन आतंकी मारे गए
  • 22 मई 2025: सिंगपोरा में मुठभेड़, दो आतंकी ढेर, एक जवान शहीद
  • 2 जुलाई 2025: छातरु के जंगल में आतंकी दल बच निकला
  • 11 अगस्त 2025: दुल किश्तवाड़ में आतंकी घेराबंदी तोड़कर फरार
  • 13 सितंबर 2025: नायदग्राम छातर में हमले में एक जेसीओ समेत दो जवान शहीद
  • 21 सितंबर 2025: छातरु में आतंकी दल भागने में सफल
  • 4 नवंबर 2025: छातरु में फिर घेराबंदी तोड़कर आतंकी फरार

आगे की राह

ऑपरेशन त्राशी अभी खत्म नहीं हुआ है। सुरक्षाबलों की कोशिश है कि फरार आतंकियों को जल्द से जल्द ढूंढकर निष्क्रिय किया जाए। बंकरनुमा ठिकाने का ध्वस्त होना आतंकियों के मनोबल पर बड़ा प्रहार है, लेकिन यह भी साफ है कि किश्तवाड़ जैसे दुर्गम इलाकों में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लंबी और चुनौतीपूर्ण बनी रहेगी।

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